बुधवार, 2 सितंबर 2015

शिष्यों को उचित सांचे में ढालने वाला कुम्हार है शिक्षक

शिक्षक दिवस निबंध डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन Educationist Dr. Sarvepalli Radhakrishnan

05 सितंबर शिक्षक दिवस पर.....

 

नागरिक निर्माण में सबसे बड़ा सहयोगी है - शिक्षक ....

 

-डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

माता-पिता और गुरु भारतीय संस्कृति में त्रि-देव की उपमा से सम्मानित किये गये हैं। माता बच्चे को जन्म देने के साथ उसे इस संसार के दर्शन कराती है। पिता बच्चों का पालन-पोषण कर उन्हें इस दुनिया में आने वाली चुनौतियों का सामना करना सिखाता है। गुरु की स्थिति इस पंक्ति में सबसे अहम् और ऊपर मानी गयी है। कारण यह कि गुरु ही एक बच्चे को शिक्षा-दीक्षा से परिपूरित कर मानवों में श्रेष्ठ बनाते हुए भगवान तुल्य स्थान दिला सकता है। एक शिक्षक को कालान्तर से मिल रहे सम्मान को बनाये रखने के लिए अपना स्तर एक ऐसे ढांचे के अनुसार प्रस्तुत करना चाहिए, जिसके संपर्क में आने पर कच्ची मिट्टी के सदृश्य बच्चों का चरित्र एक सुन्दर और आकर्षक दिखने वाले ढांचे का स्वरूप प्राप्त कर माता-पिता के साथ ही समाज के लिए गौरव की प्रतिष्ठा सिद्ध हो सके। शिक्षा की महत्ता और गरिमा, उपयोगिता और आवश्यकता का वर्णन अनादिकाल से अब तक किया जा रहा है। मानवीय समाज में गुरु अथवा शिक्षक ही ऐसे सम्मानजनक पद पर आसीन है, जो परिस्थितियों से अकेला जूझता हुआ ज्ञान का संचार करता रहता है। ईश्वर ने एक शिक्षक को वह सामर्थ्य प्रदान की है, जिससे समाज सुसंस्कृत, चरित्रवान और विकास के पथ पर अग्रसर हो सकता है।

गुरु गरिमा का बयान चंद शब्दों में कर पाना बड़ा ही कठिन काम है। दिन-रात के चौबीस घण्टों में एक विद्यार्थी सबसे ज्यादा समय अपने शिक्षकों के साथ ही बिताता है। विद्यालयों में अपने शिक्षकों के प्रति उनकी श्रद्धा एवं कृतज्ञता भी स्पष्ट दिखायी पड़ती है। समाज का कोई भी वर्ग इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि एक बालक अथवा बालिका को भावी जीवन में सुयोग्य, संपन्न बनाने में अभूतपूर्व भूमिका एक शिक्षक ही निभाता है। अध्यापकों का अनुशासन भी सहज और स्वाभाविक उस समय दिखायी पड़ता है जब कक्षा में प्रवेश करते ही स्तब्धता छा जाती है। जो बच्चे घर पर उदण्ड व्यवहार करते हैं वे भी शाला के अनुशासन में बंध जाते हैं। इसके लिए दण्ड देना ही अंतिम उपाय नहीं है। यदि एक शिक्षक का निजी जीवन चरित्र उच्च स्तरीय होने के साथ व्यवहार शालीनता से परिपूर्ण हो तो ऐसा कोई कारण नहीं कि छात्र उसका अनुशासन न मानें। वर्तमान की विपरीत परिस्थितियों ने छात्रों में उच्चश्रृंखलता का बीजा रोपण किया है, वे उदण्ड हुए हैं, किन्तु इससे एक शिक्षक को निराश नहीं होना चाहिए। जब हिंसक पशु भी एक प्रशिक्षक के सान्निध्य में रहते हुए वश में हो जाते हैं और सरकस में लोगों का मनोरंजन महज इशारों की भाषा समझकर करने लगते हैं, तब गुरु गरिमा अपने चारित्रिक ताकत पर एक उदण्ड छात्र को सही मार्ग पर कैसे नहीं ला पायेगी? इसमें कोई संदेह नहीं।

एक शिक्षक से सारा समाज यही उम्मीद करता है कि वह उसके बच्चे को सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति होने का गौरव अवश्य दिलायेगा। यहां तक की सरकार भी कुछ ऐसी ही कल्पना अपने अध्यापकों से करती है। सवाल यह उठता है कि नयी पौध को सहीं दिशा देने वाले शिक्षक की दशा हमारे देश में कैसी है? शिक्षा की जिम्मेदारी का वहन करने वाले उच्च शिक्षित लोगों को एक कर्मी से अधिक कुछ न मानने वाली सरकारों ने कभी सबसे अहम् स्थान रखने वाले वर्ग के लिए क्या सोचा और क्या दिया? इस पर मनन-चिन्तन की कोशिश क्यों नहीं की? इस संबंध में हमें विश्व के अति-विकसित देशों से प्रेरणा लेने की जरूरत है। अमेरिका एक ऐसा देश है जहाँ सिर्फ दो तरह के लोगों को वी.आई.पी. माना जाता है और सम्मान दिया जाता है वे हैं - वैज्ञानिक और शिक्षक। फ्रांस के न्यायालय में यह व्यवस्था है कि वहां लगी कुर्सियों पर केवल शिक्षक ही बैठ सकते हैं। जापान में यह कानून है कि यदि किसी शिक्षक के खिलाफ कोई शिकायत की गयी हो और उसकी गिरफ्तारी जरूरी हो तो जापान की पुलिस को शिक्षक की गिरफ्तारी के लिए सरकार से विशेष अनुमति लेनी होती है। इस मामले में कोरिया इन सबसे आगे है, वहां की सरकार शिक्षकों को वे सारे अधिकार देती है जो हमारे देश में एक मंत्री को प्राप्त है। साथ ही अमेरिकन सहित यूरोपीय देशों में प्राथमिक शाला में अध्यापन कराने वाले शिक्षक को सबसे अधिक वेतन दिया जाता है। कारण यह कि वे ही कच्ची मिट्टी को आकार देने का काम करते हैं। दूसरी ओर हमारे देश में यदि शिक्षक अपने सम्मान के लिए आवाज उठाये तो पुलिस प्रशासन डण्डा चलाने से नहीं चूकती और शिक्षा विभाग निलंबन जैसी कार्रवाई से नहीं हिचकता है। इन विपरीत परिस्थितियों में एक शिक्षक से उम्मीदों की आस लगाना कितना उचित है?

एक गुरु की गंभीरता और उसके तर्क को समझ पाना भी सामान्य व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता है। इस संबंध में प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात और उनके शिष्य का वार्तालाप लेख के दृष्टिकोण से यहां बताना उचित हो सकता है। दार्शनिक सुकरात दिखने में बड़े ही कुरूप थे। एक बार वे बैठे किसी चिन्तन में उलझे थे तभी उनका एक शिष्य आ धमका और सुकरात को आईना देखते मुस्कराने लगा। उसके मन्तव्य को भांपकर सुकरात बोल पड़े कि तुम्हें आश्चर्य हो रहा है कि मुझ जैसा कुरूप व्यक्ति आईना क्यों देख रहा है। शिष्य का सिर शर्म से झुक गया। सुकरात ने उसे समझाते हुए कहा कि मैं आईना इसलिए देखता हूँ ताकि मेरी कुरूपता का मान मुझे होता रहे, और इतने अच्छे काम करूँ ताकि मेरी कुरूपता ढंक जाये। शिष्य को यह बात सहीं लगी किन्तु उसकी जिजिविषा शांत न हुई और उसने अगली शंका जाहिर करते हुए प्रश्न किया कि फिर सुन्दर लोगों को आईना नहीं देखना चाहिए? उसके गुरु सुकरात ने पुनः स्पष्ट करते हुए कहा कि सुन्दर लोगों को आईना अवश्य देखना चाहिए ताकि उन्हें ध्यान रहे कि कोई ऐसे काम न करें जिससे उनकी सुन्दरता ढंक जाए गुरु के इस प्रकार के स्पष्टीकरण से शिष्य संतुष्ट होकर नत-मस्तक हो गया।

यह जानने और समझने वाली बात है कि एक अध्यापक का समाज में अपना विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान होता है। पुरानी और नयी पीढ़ी के बीच वह न केवल एक सेतु का कार्य करता है वरन् आने वाली पीढ़ी को कल के समाज का नेतृत्व करने की कला भी सिखाता है। भारत वर्ष की चिंतना तथा देशना ने गुरु को परमात्मा कहा और अनुभव भी किया। उसे ब्रम्ह का साकार स्वरूप कहा गया है। इसका कारण सिर्फ यह है कि एक सच्चे गुरु ने अपनी अस्मिता मिटा दी, अपना अहंकार गिरा दिया, इसीलिए वह श्रेष्ठ हो गया

 

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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