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सर्वश्रेष्ठ होता है अपना सृजन

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

  दुनिया में हर इंसान को भगवान ने बौद्धिक और शारीरिक परिपूर्णता के साथ भेजा है। हममें से प्रत्येक इंसान हर प्रकार के मौलिक सृजन में समर्थ है। जो पूरी की पूरी पीढ़ी को पैदा करने का सामर्थ्य रखता है वह दुनिया में किसी भी प्रकार का सृजन दिखा सकता है। 

इस मामले में पूरे विश्व का हर मनुष्य अपने आप में अन्यतम है। जैसा एक है वैसा कोई दूसरा देखने में नहीं आता। शक्ल और सूरत से भले ही मेल दिख जाए मगर कोई न कोई अंतर जरूर रहता है। हम सभी को ईश्वर का अंश माना जाता है और इस कारण से हमारे भीतर सामर्थ्य की कोई कमी न कभी रही है, न रहेगी।

हम अपने आप ही स्वयं को छोटा और हीन समझने लगते हैं और यही आत्महीनता हमारे विकास और हर प्रकार की तरक्की में बाधक है। अपने आपको अहंकार से मुक्त रखें, सरल और सहज रहें, बच्चों की तरह निष्कपट व्यवहार रखें, स्वाभिमान को न भुलायें लेकिन अपने आपको छोटा और हीन कभी न समझें।

ऎसा करना ईश्वर का अपमान तो है ही, हमारे माता-पिता, गुरुओं और पूर्वजों की पूरी की पूरी परंपरा का अपमान है जिन्होंने पीढ़ियों और सूरज-चाँद के रहने तक वंश चलने-चलाने के लिए क्या कुछ नहीं किया।

आत्महीनता कोई अस्तित्व नहीं रखती। यह सिर्फ अपने आप का वो वहम है जो हमारे जीवन में हर बार स्पीड ब्रेकर पैदा करता हुआ आगे बढ़ने से रोकता है। हालांकि ये सारे अवरोध आभासी ही होते हैं, जो इनके चक्कर में आ गया वो जिन्दगी भर घनचक्कर बना रहता है। न कुछ उपलब्धियां हासिल कर पाता है, न आगे बढ़ पाता है। दूसरों का सहारा ले लेकर उसकी जिन्दगी की गाड़ी घिसटती रहती है। 

इस ओढ़ी हुई आत्महीनता का ही परिणाम है कि हममें से बहुत सारे लोग सभी प्रकार की मेधा-प्रज्ञा और बहुआयामी प्रतिभा, सम सामयिक हुनरों और दैवीय अनुकंपा होने के बावजूद वहीं के वहीं ठहरे हुए हैं जहाँ बरसों पहले थे।

हमसे कई गुना निचले पायदान पर रहने वाले, भौंदू, खुदगर्ज, आलसी, दरिद्री, प्रतिभाहीन लोग किसी न किसी का सहारा लेकर वहाँ जा पहुँचे हैं जहाँ पहुँचने की उनमें कोई मौलिक प्रतिभा न पहले थी, न अब भी देखी जा सकती है।

बहुत सारे प्रतिभाशाली और हुनरमंद लोगों के जीवन में असफलता और निराशा का यही एकमेव कारण है जिसे दूर करने की आवश्यकता है। हम सभी लोग कुछ न कुछ करने में सक्षम हैं। यह निश्चित मानकर चलना होगा कि हर प्राणी जो भी सृजन करता है चाहे वह वैचारिक और सूक्ष्म हो अथवा कोई स्थूल जीवन्त या जड़ सृजन, वह अपने आप में अन्यतम ही होता है और इस मौलिक सृजन के लिए उस व्यक्ति की सराहना की जानी चाहिए।

हम सभी लोग रोजमर्रा की जिन्दगी में कई नवीन आयामों को लेकर सृजन करते हैं और जमाने के सामने प्रकट करते हैं। समझदार और कद्रदान लोगों से तारीफ मिलती है, नासमझों और छिद्रान्वेषियों से तिरस्कार।  इसका यह अर्थ नहीं कि हमारा सृजन काबिल नहीं है। 

हमारे अपने सृजन को सराहा जाए अथवा उपेक्षा की जाए, दोनों ही स्थितियों में हमें यह मानकर संतुष्ट और खुश होना चाहिए कि लोग इसे स्वीकारते हैं, अस्वीकार कोई नहीं कर रहा। शाश्वत सत्य, तथ्य और यथार्थ यह भी है कि अपना कोई सा सृजन हो, वह सर्वश्रेष्ठ होता है, चाहे उसे दुनिया वाले स्वीकारें या न स्वीकारें।

हम केवल उसके प्रति उत्तरदायी हैं जिसने हमें पैदा किया और धरती पर भेजा है। बाकी जो लोग इस संसार के प्लेटफॉर्म पर मिले हैं, यह जरूरी नहीं कि वे किसी मंजिल पर जाने के लिए हमार हमसफर हों। बहुत से लोग होते हैं जिनके लिए कोई न कोई प्लेटफॉर्म या स्थान विशेष ही जीवन भर के लिए अपनी मंजिल होकर रह जाता है।

ऎसे में इन लोगों को प्रगतिगामी, लक्ष्योन्मुख या यायावर मानना हमारी सबसे बड़ी भूल नहीं तो और क्या है। सृजन के बारे में किसी माँ को पूछें कि उसकी संतान कैसी है, किसी चित्रकार से पूछें कि उसकी कृति कैसी है, किसी लेखक को पूछें या किसी न किसी रचनात्मक कर्मयोगी से पूछ लें। इनमें से कोई भी ऎसा नहीं मिलेगा जो अपनी रचना को खराब या हीन बताए।

पर हममें से खूब लोग ऎसे हैं जो समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में फन आजमा रहे हैं और उनमें बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो कि अपने ही सृजन को लेकर आत्महीनता में जी रहे हैं जबकि उनका सृजन ऎसा है कि जिसका कोई मुकाबला नहीं।

हमारे काम-धंधों या अन्य प्रकार के कर्मयोग से जुड़े बहुत सारे काम ऎसे होते हैं  जिन्हें करते हुए हम हिचकते हैं और हमें सदैव यह आशंका बनी रहती है कि हमारे काम में परफेक्शन नहीं आ पाता। इस वजह से आत्महीन होकर हम छोटे-छोटे कामों में भी दूसरे लोगों पर आश्रित करते हुए जीने लगते हैं।

इससे हमारी रही-सही प्रतिभा भी कुण्ठित हो जाती है और अपने पल्ले कुछ नहीं पड़ता। कालान्तर में ऎसे लोगों पर विद्या-बुद्धि और हुनर की दैवी सरस्वती और दूसरे सारे देवी-देवता नाराज होकर साथ छोड़ देते हैं क्योंकि जो व्यक्ति अपनी क्षमताओं पर भरोसा नहीं करता, अपने हुनर का इस्तेमाल करने में हिचकता है, अपनी शक्तियों का प्रयोग करने की बजाय औरों पर निर्भर हो जाता है, उसे भगवदीय शक्तियां कभी पसंद नहीं करती।

जिन लोगों में इस प्रकार की आत्महीनता है वे लोग सर्वगुण सम्पन्न और मेधावी होने के बावजूद तरक्की नहीं कर पाते हैं।  इस आत्महीनता का मूल कारण संकल्प की दृढ़ता में कमी और हमारी सोच में नकारात्मकता है। इस स्थिति से हम उबर जाएँ तो दुनिया में नाम कमा सकने का सारा माद्दा हममें पूरा-पूरा भरा हुआ है।

दुनिया में कुछ नया, श्रेयदायी और स्थायी करना चाहें तो हर बार कुछ नया कहें, नया लिखें और नये काम करें। पुरानी लीक और नकल करने या औरों से  काम करवाने, लिखवाने आदि का मोह त्यागें। जो कुछ करें, खुद के बूते करें चाहे वह छोटा सा सृजन ही क्यों न हो।

खासकर पत्रकारिता और लेखन क्षेत्र से जुड़े लोगों को चाहिए कि वे अपने सृजन को महत्त्व दें, किसी का मार्गदर्शन पाना अच्छी बात है लेकिन रोजाना की गतिविधियों और लेखन के मामले में पूरी तरह दूसरों पर पराश्रित रहना और अपने सृजन कर्म को हीन मानते हुए दूसरों के सहयोग से आकार देना स्वयं की आत्मा का अपमान है वहीं ईश्वर भी उन लोगों से नाराज रहता है।

अपने हर सृजन को सम्मान दें, सर्वश्रेष्ठ मानें और अपने आपको ईश्वर की सर्वोत्तम कृति अनुभवित करें। आशातीत सफलताओं की हर चाभी अपने पास है, इसका इस्तेमाल करना आना चाहिए बस।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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