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हास्य- व्यंग्य - सत्यवान पति की तलाश

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हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन

नारद जी का धरती भ्रमण , अनंतकाल से चल रहा है। ये वायरस की तरह , कहीं भी , कभी भी घुस जाते हैं , अंतर केवल इतना कि , ये किसी के दुख के निवारण का उपाय बताते हैं , किसी के दुख का कारण नहीं बनते। एक बार , एक रोती बिलखती दुखी महिला के घर जा धमके। परंतु बहुत कुरेदने पर भी उस भारतीय नारी ने , अपने दुख का कारण नहीं बताया। योग विद्या से कारण जान , नारद जी ने सत्यवान सावित्री की कथा सुनाते हुए , सत्यवान की पुन: प्राप्ति के लिए उस महिला को , सावन के महीने में , बरगद वृक्ष में विराजित शिव की पूजा करने की सलाह देते हुए , सत्यवान की प्राप्ति का उपाय बताया।

कुछ अरसे बाद , हलाकान परेशान उसी औरत से , नारद जी फिर मिल गए हैं आज। नारद जी ने झट पहचान लिया। तुम ठीक तो हो , तुम्हारे सत्यवान कैसे हैं ? प्रश्नों की झड़ी लग गई। आप भी अच्छा मजाक करते हो नारद जी , सत्यवान को ढ़ूंढना मतलब , अपने क्षेत्र के विधायक को तलाशने से अधिक दुष्कर है। विधायक तो फिर भी पांच साल में लौटेगा ही , पर सत्यवान को खोजते खोजते मेरे सिर्फ चप्पल ही नहीं , बल्कि एड़ी भी , सरकारी नौकरी की तलाश की तरह घिस चुकी। पर , वह मिला नहीं। नारद जी हैरान हो गए। कहां कहां तलाश किया तुमने ? जल में , थल में , नभ में भी , और कहां ? लगता है , गूगल और रडार की पहुंच से भी दूर निकल चुका है वह। क्या तुम्हारा सत्यवान इस दुनिया में नहीं है ? ओह ! मुझे लगता है , तुमने ठीक से व्रत का पालन नहीं किया , तभी उसे यमदूत उठाकर कहीं ऐसी जगह ले गए हैं , जो किसी भी खोजी उपग्रह के रेंज से बाहर हो चुका है। थोड़ा ध्यान कर नारदजी ने कहा – पर बेटी , तुम्हारा सत्यवान तो यहीं है। जरूरत है उसे जगाने की ।

क्या ? सत्यवान यहीं है। कहीं आप उस इंजीनियर सत्यवान की बात तो नहीं कर रहे हैं , जो ईंट , पत्थर , चूना , रेती , सीमेंट छड खाता है , कभी कभी पूरा सड़क , घर , कुआं भी खा लेता है और पचा भी लेता है , परंतु पूछने पर दाल चावल रोटी ही खाना बताता है।

उसके पास तो सबसे पहले गयी थी मैं।

अच्छा ....... , आप डाक्टर सत्यवान की बात कर रहे होंगे , जो साधारण सी सर्दी बुखार को बढाकर , निमोनिया टी.बी. तक ले जाकर ही दम लेता है। यही वह आदमी है , जो मरने का भय दिखाकर , जीने की तकलीफें परोसता है।

यह भी मेरा सत्यवान नहीं हो सकता।

ओहो ......, शायद आप , अधिकारी सत्यवान की बात कर रहे होंगे। बड़ा काबिल व्यक्ति है वह – धीरे से नारद जी ने कहा। कोई भी काम के लिए चौखट रगड़वाने का धंधा करने वाला , बिना हरी नोटों के बात तक नहीं सुनने वाले से अधिक काबिल कोई हो सकता है क्या ? पर यह काबिलियत सत्यवान होने के लिए शर्म की बात थी। पर बेटे मैं जिस सत्यवान की बात कर रहा हूं.......

मैं जानती हूं नारदजी आप किस सत्यवान की बात कर रहे हो , आप सत्यवान दरोगा की बात कर रहे हो न। वहां तक भी पहुंच गई थी मैं , पर मैंने उसके चाल और चरित्र को उसके कार्य के ठीक विपरीत पाया। देश सेवा के लिए नियुक्त दरोगा , जुंए के अड्डे में वसूली करता है , दारू की भट्टियों से अपना घर परिवार चलाता है , यह कैसा सत्यवान है ? मैं ....

नारद की बात शुरू नहीं हो पाती , वह औरत बोलना प्रारम्भ कर देती ‌। नारद ने उस औरत को बोलने की , अब पूरी छूट दे दी।

वह बोलने लगी - मैंने एक खादी वरदी वाले सत्यवान को भी परख लिया , देश को किस्त किस्त में , टुकड़े टुकड़े में नीलाम कर रहा , यह खद्दर धारी प्रत्येक पांच बछर में बरसाती मेंढक की तरह सिर्फ टर्राता है। वह आता है सपने दिखाता है , कुर्सी पाकर , इन सब्जबागों को , लावारिस शव की तरह दफन कर , भूल जाने का बढ़िया नाटक भी कर जाता है। मैं सत्यवान को तलाशते तलाशते बहुत निराश हो चुकी थी। एक जगह आशा की किरण दिखाई दी। यह सत्यवान बाबा का आश्रम था। बहुत भव्य भवन में , अपना दुखड़ा सुनाने वालों की भीड़। मैं भी लग गई कतार में। बहुत प्यार से अपने समीप बिठाया मुझे। पूरी बात भी सुनी। एकबारगी , मुझे लगा कि , सत्यवान की तलाश पूरी हो ही गयी। परंतु कुछ ही दिनों में यहां भी धोखा ही मिला। यहां बंधक की तरह , शारीरिक और मानसिक शोषण का शिकार होती , अनेक महिलाओं को देखकर , बड़ी मुश्किल से जान छुड़ाकर भागी हूं मैं।

मैंने शिकायत के लिए अदालत की शरण ली। न्याय के मंदिर में भी एक सत्यवान मिल गया , जो अमीरों के लिए बेल और गरीबों को जेल भिजवाने में माहिर था। डाका डालने वाला इनकी नजर में निरापराधी था , और , माचिस की तीली , मजबूरी में चुराने वाला , सलाखों के पीछे , वर्षों से , दंड भुगत रहा है।

अंत में एक और सत्यवान को परखा मैंने – वह कलम की ताकत से सभी को डराता था। चोर के माल को , चांडाल की तरह चुपके से हजम करने में , इसका कोई सानी नहीं था। गली गली बिकने वाले सभी सत्यवानों से धोखा खा चुकने के बाद भी , आप मुझे दिलासा दे रहें हैं कि , मेरा सत्यवान यहीं है। क्या मैंने इसी सत्यवान की कामना की थी ?

महिला बोलते बोलते चुप हो गयी।

अब नारद की बारी थी। तुमने महलों में , ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं में , मठों मंदिरों में रहने वालों को सत्यवान समझ लिया। सत्यवान का ठिकाना , सीधी सपाट चिकनी चुपड़ी सड़कों से नहीं बल्कि , ऊबड़ खाबड़ , कंकड़ पत्थरों से भरे पगडंडी से चलकर , किसी झोपड़ी में होता है। इसका मतलब क्या सत्यवान गरीब होता है ? महिला ने प्रतिप्रश्न किया। वह केवल गरीब ही नहीं बल्कि भूखा और नंगा भी होता है। परंतु वह पैसे का गरीब है , पेट का भूखा है और तन का नंगा है , इन बाकी सत्यवानों की तरह , दिल का गरीब नहीं होता है वह , पैसे की भूख नहीं है उसे , न ही वह मन का नंगा है।

पर नारद जी , आपने बताया था कि , वह किसी राजा का बेटा था। हां बेटा , वह राजा का ही बेटा था , और सारी सुख सुविधाओं का उपभोक्ता भी , पर एक बार राजा अपने किसी दुष्कर्म के फलस्वरूप अंधा हो गया , तब से राजकुमार सत्यवान भी राजा से रंक बन गया। आज भी इन्हीं अंधे राजाओं के कारण , बेटा सत्यवान (प्रजा) , गरीब मजदूर जैसा जीवन जीने को मजबूर हैं। और अल्पायु में ही , मृत्यु का शिकार हो रहे हैं। पर एक बात है बेटा , सत्यवान जितने दिन भी जिंदा रहता है अपनी सावित्री की झोली को खुशियों से भर देता है , क्योंकि वह जो कमाता है उसमें किसी के खून का गंध नहीं , पसीने की सोंधी महक होती है , जो खिलाता है उसमें किसी बेईमानी या घोटाले का कड़ुआ कौर नहीं , ईमानदारी और मेहनत का मिठास होता है , जिस घर पर सुलाता है वहां , दुष्कर्म के गंदी नालियों के सड़न की बदबू नहीं , पवित्र प्रेम के फूलों का वास होता है , पहनने को जो देता है , वह किसी के चीरहरण का वस्त्र नहीं , मां के आशीर्वाद का आंचल होता है। मैंने तुम्हें सुख की कामना के लिए विकल देखा , इसलिए सत्यवान की प्राप्ति के लिए उपाय बताया था।

वह औरत समझ गयी और फिर निकलने लगी , सत्यवान की तलाश में। तब नारद जी ने टोका। तुम्हें कहीं और , सत्यवान की तलाश की आवश्यकता नहीं है। परंतु नारद जी , सुख की कल्पना को साकार करने , सत्यवान को तलाशना पड़ेगा ही। न बेटा , मैंने पहले भी तुम्हें बताने की कोशिश की , परंतु तुमने मेरी बात ठीक से नहीं सुनी। तुम्हारा पति ही तो तुम्हारा सत्यवान है। दरअसल , उसके भीतर सोये सत्यवान को जगाने के लिए ही , विधि ने बरगद वृक्ष में विराजित शिव की पूजा का , विधान बनाया है। कोई भी महिला पूर्ण विधिविधान से पूजा करे , भगवान शिव , प्रसन्न होकर उसके पति को सत्यवान की तरह बना देंगे। औरत फिर चौंकी , मैं समझी नहीं , इसका मतलब पूजा के बाद , हमारा पति गरीब मजदूर हो जायेगा। नहीं बेटा , तुम्हारी पूजा से - तुम्हारे संकल्प से , तुम्हारा पति जागेगा , सच ही बोलेगा , फिर यही सत्यवान , सच की ताकत से , राजा के अंधेपन को दूर करेगा। फिर , वह न सिर्फ तुम्हें सुख देगा बल्कि , देश का भी राजा बनकर सभी को सुख देगा। तब से आज तलक जारी है , सावन में शिव पूजा का अनवरत क्रम। कौन जाने ? किसकी पूजा स्वीकर हो जाए , शिव जी प्रसन्न हो जायें , और अंधे राजा को रोशनी मिल जाए , और , सुख की बाट जोहती नारी को , उसका खोया हुआ सत्यवान प्राप्त हो सके।

लेखक – हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा

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