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हास्य - व्यंग्य : लौट आए दिन बहार के

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बिनय कुमार शुक्ल 

      आज मेरे मुहल्ले की बकरियों के एक विशेष बैठक में शामिल होने का आमंत्रण मिला। बकरियों की नेत्री उर्री ने मुझे विशेष तौर से इस समारोह में शामिल होने का आग्रह किया था। उसने बताया कि इस समारोह में कुछ लोगों एवं उनके वर्गों को सम्मानित भी किया जाएगा इसलिए इस अवसर का लाभ अवश्य उठाया जाए। मैंने भी अपना झोला और कलाम संभाला , गंजे सिर पर यदा कदा लहलहाते बालों को सहलाते हुए इस समारोह में शामिल होने के लिए रजामंदी दे दिया। सही वक्त पर गंतव्य पर पहुँचकर कुर्सी पर विराजमान हो गया। समारोह प्रारम्भ हुआ, उनके अग्रज नेता ने अभिवादन के बाद अपना भाषण शुरू किया। बताया गया कि, एक जमाना था जब बकरी पालक को किसी भी रूप में दुग्ध विक्रेता की श्रेणी में  शामिल नहीं किया गया था। भारत में ना जाने कितने उपाय किए गए आपरेशन फ़्लड के नाम से तब जाकर दुग्ध उत्पादन बढ़ा पर इस अभियान में भी बकरी को शामिल नहीं किया गया। शायद छोटी आकृति एवं जीवन शैली के कारण इसे लोगों ने उपयुक्त नहीं समझा होगा। हाँ आजादी के पूर्व एवं बाद तक गांधी बाबा ने कई बार इस बात का जिक्र अवश्य किया था कि बकरी का दूध स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है।  उन्होंने इसका प्रयोग करके भी देखा है। गांधी बाबा के इस सत्य को धीरे धीरे हम भुला बैठे थे और इसे एवं इसके पालकों को हाशिये पर लाकर छोड़ दिया गया था।  पर अचानक मीडिया वालों को इसकी सुध हो आई। हर तरफ बकरी के दूध के बढ़ते भाव पर चिंता जताई जाने लगी। भला हो मच्छर की उन प्रजातियों का जो इंसानों का खून चूसकर डेंगू का डंक देकर उन्हें याद दिलाया कि बकरी के दूध की शक्ति को पहचाने। मीडिया द्वारा हाइलाइट किए जाने के इस ऐतिहासिक घटना के लिए अभिप्रेरक समुदाय एवं व्यक्तित्व को उनके कृत्यों के बखान के साथ विशेष सम्मान दिये जाने का भी उद्घोष हुआ। इस क्रम में पहले महिमामंडन उन महान व्यक्तित्व के धनी शहरवासियों का किया गया जो लोग लाख सूचना होने के बाद भी शहर में गंदगी करने की आदत नहीं छोड़ते है, जब मौका मिला खाली डब्बे, कनस्तर, पोलिथीन सबकुछ या तो घर के आसपास फेंक देते हैं या फिर नालियों में विसर्जित कर देते हैं। कचरों के ढेर में जल जमाव, गंदगी और बीमारी फैलाने वाले जीवाणुओं का विकास होना स्वाभाविक है। उनका यह प्रारम्भिक योगदान मच्छरों एवं बीमारियों को फैलाने वाले जीवाणुओं के अग्रज कभी भूल ही नहीं सकते है, जिनके पनपने के लिए प्रथम द्रष्ट्या अनुकूल वातावरण का निर्माण किया। उन्हें सर्वश्रेश गंदगी पोशाक के सम्मान से सम्मानित किया गया।

दूसरे स्थान पर इस अभियान में योगदान देनेवाले उन अधिकारियों एवं कर्मचारियों की बारी आई जिनकी ज़िम्मेदारी शहर के कचरे को साफ करवाना एवं उनका निर्मूलन करवाना है, परंतु अपनी ज़िम्मेदारी का सही निर्वाह ना करते हुए इन्होंने अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करवाया। इस समुदाय के लोगों को मशहूर बकरा सम्मान दिया गया। मशहूर बकरा सम्मान इसलिए कि बकरा भी अपने शरीर के गंदगी को कभी साफ नहीं करता है और सदा ही बास मारता रहता है। ये सज्जन भी उसी की श्रेणी में आते हैं इसलिए इन्हें यह सम्मान दिया गया।

      सम्मानों की परिपाटी में और भी कई नाम आए जैसे छुटभैये नेता, भ्रष्ट अधिकारी, कालाबाजारी करने वाले दावा विक्रेता, लूटने वाले अस्पताल आदि। सबसे बड़े सम्मानों  में तीसरे क्रम में उन अस्पतालों का नाम आया जो डेंगू के इलाज के लिए मरीजों एवं उनके घरवालों से अनाप शनाप रुपये वसूल रहे थे। ऐसे अस्पताल प्रबन्धकों को विशेष सम्मान के साथ प्रशस्ति पत्र भी दिया गया। भला क्यों ना दिया जाए। ऐसे प्रबन्धकों के अनमाने रुपयों की मांग को देखकर जो मरीज इलाज करवाने में सक्षम नहीं हो पाते हैं, वो ही तो बकरी के दूध के सेवन के प्रति उत्साहित होकर आगे आते हैं। अब भारत के पुरातन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में इस प्रकार के अचूक इलाज का वर्णन तो है पर ऐसे अस्पताल प्रबन्धक एवं चिकित्सक इस ज्ञान को धता बताकर धन कमाने की होड़ में लगे रहते हैं। इनके लिए तो विशेष सम्मान अपेक्षित ही था।   

      सम्मानों की प्रक्रिया समाप्ति के बाद यह विचार भी आया कि इस बार तो हमारी प्रजाति को कुछ तवज्जो तो मिल गई परंतु आने वाले समय के लिए क्या योजना बनाई जाए ताकि ससममान जीने का अवसर मिल सके। विवेचना के बाद यह निर्धारित किया गया कि अनुवर्ती माहों में देश के कई हिस्से में आम चुनाव का वातावरण आ रहा है। लगे हाथों हम अपने वर्ग के लिए ऑपरेशन फ़्लड में आरक्षण की मांग कर लेते हैं। यह प्रस्ताव सबको भा गया। इसके पीछे कारण भी था। आरक्षण की मांग वह हथियार है जिससे सरकार को झुकाकर अपनी मांगे मनवाई जा सकती है। यदि सरकार द्वारा मांगे नहीं मानी गई तो तबतक चुनाव का समय आ जाएगा और अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए चुनाव में जीतकर अपने हक की मांग कर सकते हैं। करतल ध्वनि मत से यह प्रस्ताव पारित हो गया एवं सभा विसर्जन की तरफ बढ़ चली।

      मैं भी हैरानी परेशानी का भाव लेकर इन बकरियों की दशा-मनोदशा, विचार बुद्धि की सराहना करता वहाँ से यह सोचते हुए विदा हुआ कि सबके दिन आते है , आज इनके भी बहार के दिन लौट आए हैं।     

बिनय कुमार शुक्ल

बिनय कुमार शुक्ल 

सूरत 

 

मेल - binayshukla12@gmail.com

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