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डिजिटल क्रांति पर निर्भरता सर्वथा उचित नहीं

डिजिटल क्रांति डिजिटल इंडिया

 

परिणाम् आधारित उपयोग पर ध्यान जरूरी....

डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

इक्कीसवीं सदी में अब हमारा देश एक नई क्रांति की ओर निहार रहा है। यह क्रांति किसी वर्ग विशेष के लाभार्थ न होकर गरीब से गरीब तबके और खरबपतियों को समान रूप से उपलब्ध कराये जाने की तैयारी में है। हम बात कर रहे है इस युग के डिजिटल क्रांति की। पहले तो यह समझ लें कि यह क्रांति कोई बुरी नहीं है, बल्कि बढ़ते प्रदूषण को कम करने में सहायक है, घटते वनों को संरक्षित करने में लाभकारी हो सकती है, ऊँच-नीच के भेदभाव पर समानता का संदेश दे सकती है। किसी भी काम में लगने वाली कागजी कार्रवाई को डिजिटल क्रांति समाप्त करने प्रयासरत है। जब कागज का उपयोग नहीं होगा तो हमारे जंगल भी हरे-भरे रह सकें गे। दुनिया भर के काम-काज को पेपरलेस बनाने की कोशिश और छोटे से छोटे तथा बड़े से बड़े काम को कम्प्यूटर के जरिये संपन्नता देना ही डिजिटल क्रांति है। भू-मण्डलीकरण सशक्तिकरण, सद्भाव एवं विकेन्द्रीकरण से सु-सज्जित डिजिटल क्रांति ने अपनी उपयोगिता सिद्ध कर दिखायी है।

वर्तमान में वैश्विक स्तर पर चल रही डिजिटल क्रांति ने अखण्ड विश्व के चरित्र और चेहरे को काफी तेजी से बदलना शुरू कर रखा है। इस नई इलेक्ट्रानिक के जन्म ने विकास को अमलीजामा पहनाया है। शिक्षण-प्रशिक्षण के क्षेत्र को समृद्धता के दायरे से जोड़ा है। यही कारण है कि दुनिया के हर कोने में डिजिटल तकनीक को विस्तार देने का काम गंभीरता के साथ किया जा रहा है। भारत वर्ष भी ऐसे ही देशों में शामिल होकर नई टेक्नॉलाजी के साथ चलने और बढ़ने के लिए कोशिशें कर रहा है। भारतवर्ष गरीबों और अनपढ़ अथवा कम पढ़े-लिखे किसानों का देश है, इसलिए यह माना जा सकता है कि हमारा देश बहुत जल्द डिजिटल-प्रणाली के आधार पर ही काम करने वााला देश नहीं बन पायेगा। दूसरा कारण यह भी है कि जिम्मेदार विभागों के बीच तालमेल की कमी भी इस युग के सूत्रपात में रोड़ा बन सकते है। जिस चीज को जिस स्थान पर होना चाहिए। वह नहीं है, किन्तु हम उम्मीद कर सकते है कि आज नहीं तो कल हम टेक्नालॉजी की माँग के अनुरूप खुद को समायोजित कर डिजिटल क्रांति को पूर्ण रूप से अंगिकार कर लेंगे। भारत वर्ष की विशेषता है कि यहां के लोग किसी भी चीज को सीखने से पूर्व गलतियों पर गलतियाँ करते है, किन्तु एक दिन वे उस काम में माहिर अवश्य हो जाते हैं। हम इस बात पर विश्वास कर सकते है अथवा पूरी दुनिया को विश्वास दिला सकते हैं कि आने वाले 10 अथवा 15 वर्षो में हम अपनी डिजिटल पीढ़ी का दर्शन दुनिया को अवश्य करा सकेंगे।

भारतवर्ष के संदर्भ में डिजिटल क्रांति एक महति जरूरत के रूप में दिखायी पड़ रही है। भारत में बढ़ रहा भ्रष्टाचार डिजिटल क्रांति के माध्यम् से समाप्त नहीं तो नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है, किन्तु हम इस भय से भी इंकार नहीं कर सकते कि इस इलेक्ट्रानिक तकनीक को भी भ्रष्ट करने हमारे अधिकारी उपाय न ढूंढ लें। हमारे देश में बात-बात पर लगने वाले जन्म प्रमाण-पत्र से लेकर, जाति प्रमाण पत्र, राशन कार्ड और पहचान पत्र को बनवाने शासकीय तय शुल्क से अधिक लेना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। बनाने वाला अधिक रूपये माँगता है और बनवाने वाला बड़े स्नेह से दे भी देता है, यही कारण है कि भ्रष्टाचार की जड़े मजबूत होती जा रही है। डिजिटल क्रांति के तहत जब हम स्वयं इन्टरनेट कनेक्शन के साथ अपने सारे दस्तावेज स्वयं प्राप्त करने में सक्षम हो जायेंगे, तब इस नई टेक्नालॉजी का असर दिखायी पड़ेगा। टेक्नालॉजी और ग्लोबल विकास एक ऐसा क्षेत्र है जिसके चलते विकासशील देशों में क्रांतिकारी बदलाव आये हैं। यदि हम सेलफोन (मोबाईल) की बात करें तो आज इसने आपसी संवाद के इतने मौके और रास्ते खोल दिये हैं कि पूरी दुनिया वास्तव में मुठ्ठी में समाकर रह गयी है। मानवीय जीवन में आया लचीलापन भी इसी व्यवस्था की देन है। हम देख रहे हैं कि टेक्नालॉजी में बदलाव बड़ी तेजी के साथ आता है, क्योंकि यह हमें सपने देखने की आजादी देती है। दूसरी विशेषता यह कि टेक्नालॉजी कभी रूकती नहीं है। एक नई इजाद के साथ दूसरे की खोज इसकी जरूरत बनी रहती है। हमने टेलीफोन को बड़ा सहारा माना था किन्तु उसके बाद उसके मोबाईल रूप ने हमें और अधिक डिजिटल बना दिया। अब आगे इसका कौन सा रूप हमारी पीढ़ी देखेगी यह अभी कह पाना संभव नहीं लगता है।

गंभीरता पूर्वक विचार किया जाये तो टेक्नालॉजी के क्षेत्र में दुनिया के सभी छोटे-बड़े देशों ने अपनी सीमा के अनुसार निवेश का ढांचा तैयार किया है, जिससे डिजिटल सशक्तिकरण का प्रभाव अब दिखायी पड़ने लगा है। इसके अंतर्गत सेलुलर मोबाईल फोन्स हों या डिजिटल टी.वी., रेडियो अथवा कम्प्यूटर के बदलते स्वरूप, सभी जगहों पर नेटवर्क कव्हरेज का दायरा लगातार बढ़ रहा है। आज बड़े पैमाने पर बेहतर उपकरण और एप्लिकेशन का इस्तेमाल हो रहा है। ज्यादा से ज्यादा लोगों तक बढ़िया और सस्ती टेक्नालॉजी आसानी से पहुंच रही है। इतना ही नहीं कंपनियाँ भी टेक्नालॉजी की नई-नई प्रणाली में निवेश करने उत्सुकता दिखा रही हैं। इस मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि उपभोक्ता भी नई टेक्नालॉजी के महत्व को स्वीकार करते हुए उसमें आने वाले खर्च को वहन करने तैयार है।

डिजिटल क्रांति के फायदे जहाँ हमें शुरूआती दौर में दिखायी पड़ रहे है, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि टेक्नालॉजी का प्रयोग हमें समस्याओं में भी उलझा सकता है। इस सिस्टम का जब आवश्यकता से अधिक उपयोग होने लगता है तो वह इंसान को अपना गुलाम बनाकर उसकी रचनात्मकता और एकाग्रता पर बुरा प्रभाव डालने लगती है। विशेषज्ञों की बातों पर विश्वास करें तो, इसके प्रयोग से लोगों की याददाश्त भी कमजोर पड़ सकती है। आने वाले दस वर्षो में जो पीढ़ी हमारे समक्ष होगी वह एक डिजिटल पीढ़ी होगी। उक्त पीढ़ी का बौद्धिक स्तर भी कमजोर होगा, तार्किक क्षमता का अभाव भी झलक दिखा सकता है। इस संभावना को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि डिजिटल पीढ़ी टेक्नालॉजी पर निर्भर होकर संवेदनहीन हो जायेगी। जानकारियों के मामले में भी वे एक एनसाइक्लोपीडिया से अधिक कुछ नहीं होंगे। सूचनाओं का भण्डार तो उस पीढ़ी के पास होगा, किन्तु वे उन सूचनाओं का भली प्रकार उपयोग नहीं कर पायेंगे। नये आविष्कार भी उनके लिए किसी बड़ी कठिनायी से कम नहीं होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटलीकरण के दुष्प्रभावों से बचते हुए इसकी खूबियों का लाभ लेना ही श्रेयस्कर हो सकता है, अन्यथा इसके दुष्परिणाम खतरनाक हो सकते है।

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(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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