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सुरभि सक्सेना की ग़ज़ल - अपना कहो मुझे और खुशियां हज़ार दो

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अपना कहो मुझे और खुशियां हज़ार दो
यूँ ही किसी गरीब की किस्मत सँवार दो दीवाना बन गया हूँ तेरी तिरछी नज़र का
पलकें झुका, झुका के, दिल को क़रार दो जीता हूँ तेरे प्यार में, खामोश हूँ मगर
कभी तो मेरे प्यार का, सदका उतार दो महका हुआ बदन तेरा, ऑंखें है मरमरी
छूकर मुझे ऐ गुलबदन, मुझको निखार दो  #Surabhi Saxena
Geetkar , Actress, poetess, Radio jockey
surabhisaxena77@gmail.com

सूबे सिंह सुजान की ग़ज़ल

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कुछ भी हो,अपने मसीहा को बड़ा रखता है
आदमी अपनी ही मर्जी का खुदा रखता है
वो सरेआम हकीकत से मुकर जायेगा
गिरगिटों जैसी बदलने की अदा रखता है
तुम गरीबी को तो इनसान का गहना समझो
जो फटेहाल है वो लब पे दुआ रखता है ।
जुल्म पर जुल्म जो करता है यहाँ दुनिया में
उसके हिस्से में भी भगवान सजा रखता है ।
मार के कुंडली,खजाने पे अकेला बैठा
हक गरीबों का यहाँ सेठ दबा रखता है
एक दिन मैं तुझे आईना दिखा दूंगा "सुजान "
मेरे बारे में जो तू ख्याल बुरा रखता है सूबे सिंह सुजान
गाँव -सुनेहडी खालसा 
डॉ -सलारपुर,
जिला कुरूक्षेत्र ,हरियाणा
मोबाइल नंबर -09416334841

राकेश अचल की व्यंग्य ग़ज़लें

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बहती गंगा में हाथों को धो लीजे
********************************
हमको भी हासिल है इतनी आजादी
इज्जत लौटाना थी,हमने लौटा दी
*
हम फ़क़ीर हैं नंगे भी रह सकते हैं
आप वजीर बने हैं,पहने अब खादी
*
बहती गंगा में हाथों को धो लीजे
लोग कहें,कहने दें हम अवसरवादी
*
हिंसा का शिकार है ,कोई बात नहीं
आधी से ज्यादा दुनिया की आबादी
*
अचल लिखोगे और तो मारे जाओगे
बात खरी भी है समझो सीधी-सादी
*
--- हम कागज के शेर, तो डरते क्यों हो बोलो कुछ शमशेर, बगरते क्यों हों *सब कुछ है मामूल तो फिर घर बैठो बेमतलब निशि-याम विचरते क्यों हो ?*यहां नहीं है वीफ,थीफ या गैया रोज गली से आप गुजरते क्यों हो ?*सांप और सीढ़ी का खेल अजब है सीढ़ी चढ़ते और उतरते क्यों हो ?*हम तो नहीं मुनव्वर राना भाई नए पैरों को रोज कतरते क्यों हो?*कोई नहीं देखने वाला तुमकोअचल व्यर्थ में आप संवारते क्यों हो ?*@राकेश अचलf/10,new park hotel,padavgwalior[m.p.]09826217795

ललित गर्ग का आलेख - रोशनी पवित्रता का जीवन रक्त है

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विद्या, बुद्धि और कला-संपन्न व्यक्ति वही होता है, जो सहनशील, नम्र और मधुर व्यवहार वाला होता है। व्यवहार रेगिस्तान में नहीं पनपता। वह तो एक फूल है,जिसे खिलने के लिये उद्यान की जरूरत होती है। लोग सोचते है कि उन्हें व्यवहार करना आता है। लेकिन उन्हें व्यवहार करना सीखना होगा। सीखने की संभावना तो हैं उनमें, पर यह संभावना इसलिये निष्क्रिय हो जाती है कि वे समझते हैं कि उन्हें व्यवहार करना पहले से ही आता है। चीजें जैसी है उन्हें सीधे-सीधे वैसा ही देखने की कोशिश करना होगा। पहली बात तो यह है कि परिस्थिति कितनी भी खराब क्यों न हो, उसके प्रति साफ तौर से सचेत और सकारात्मक होना होगा। न तो उन्हें बढ़ा-चढ़ा कर पेश की जाये और न उन्हें छिपायी जाये। अगर छिपायेंगे तो व्यवहार बाधित होगा। अपने सारे मुखौटे उतारने होंगे। ऐसा करके ही हम व्यवहार क्या होता है समझ सकेंगे और तभी इस व्यवहार से बनने वाले रिश्तों की महत्ता एवं रसपूर्णता को जी सकोगे। श्रीकृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे। मार्ग में जीवा नाम का एक भिक्षुक दिखाई दिया। अर्जुन ने उसे स्वर्ण मुद्राओं से भरी एक थैली दी। वह घर की तरफ लौट चला। किंतु राह में एक ल…

आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र की पुण्यतिथि पर सम्मान समारोह सह संगोष्ठी

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स्पष्ट अभिव्यक्ति ही सरोकार की पत्रकारिता : स्वामी निरंजनानंद
                            आनंद
बिहार के चर्चित पत्रकार आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र की पुण्यतिथि पर
लक्ष्मीकांत मिश्र मेमोरियल फाउंडेशन नई दिल्ली और पत्रकार समूह मुंगेर
द्वारा आयोजित समारोह में महात्मा गांधी और स्वामी सत्यानंद के विचारों
के परिप्रेक्ष्य में पत्रकारिता के सरोकार पर संगोष्ठी महत्वपूर्ण रही.
इस संगोष्ठी की अहमियत इसलिए है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगातार
हमले हो रहे हैं और लेखक पुरस्कार लौटा रहे हैं. बिहार का पत्रकारों के
लिए घोषित सरकारी पुरस्कार फाइलों के बस्ते में धूल फांक रहा है. वैसे
समय में एक पत्रकार की याद में विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्धि हासिल
किये. पांच लोगों को पुरस्कृत तथा सम्मानित किये जाने का भी एक मायने है.
कार्यक्रम का शुभारंभ बिहार योग  विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी
निरंजनानंद सरस्वती ने दीप प्रज्वलित कर तथा उनके चित्र पर माल्यार्पण कर
किया गया.
आरंभ में देश के चर्चित पत्रकार रामबहादुर राय के संदेश् को अजाना घोष ने
पढ़ा. रामबहादुर राय ने अपने संदेश में कहा कि यह उम्मीद पैदा करती सूचना
है कि आचार्य लक…

कृष्ण कुमार चंचल का लघु-आलेख - बिदाई

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बिदाईअपनी कोमल ऊँगलियों से पापा के कठोर हाथों को छूती उसकी हथेली, छोटे-छोटे कदमों से चलके सुबह पापा के मोज़े तलाशती उसकी मासूम निगाहें, गाड़ी की चाभी कभी, कभी पेन या रूमाल छिपा के ऑफिस न जाने देने का बहाना बनाती उसकी शरारती व निःश्चल मुस्कान।
टिफ़िन में अपने हाथों की बनी टेढ़ी-सीधी, कच्ची-पक्की रोटी रख के मम्मी के आँचल से अपना पसीना पोंछते उसके वो फरिश्ते जैसे हाथ।
ऑफिस से लौटने पर दौड़कर गोद में चढ़कर ज़ेब में टाफियों को तलाश करती नन्हीं चिड़ीया, न मिलने पर शिकायत की अदा और मिलने पर घुँघरूओँ सी छनकती हँसी।
अपनी मम्मी से हमेशा होड़ कि पापा को पानी कौन पहले ला कर देता है। पापा का टावेल लाना या अपने हाथों से पापा का शू पॉलिश करना फिर चाहे वो ब्लेक शू पर रेड पॉलिश ही क्यों न हो।
स्कूल के पिकनिक की परमिशन या कॉलेज़ के टूर पर जाने के लिए पापा के पॉकेट से पैसे निकालने की हरकत साथ ही भाई का मोबाइल रिचार्ज कराने को उसमें से हिस्सा देने की अदा। रिज़्लट बिगड़ने पर पापा के क्रोध से भाई को बचाती उसकी ढाल बन के सामने आकर खड़े होने की स्टाइल।
खाँसने की आवाज़ सुनते ही अपने हाथों से ज़बरन कड़वी गोलियाँ खिलाना। अपनी स्कू…

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - मिलहिं संत वचन दुइ कहिए, मिलहिं असंत मौन होय रहिए

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इन दिनों जितना बोला जा रहा है, उतना शायद इतिहास में कभी नहीं बोला गया. कौन बोल रहा है, क्यों बोल रहा है, क्या बोल रहा है, समझ में नहीं आ रहा. बोला जाना एक शौक में, चीख में बदल चुका है.लोग माइक में चिल्ला रहे हैं कि बोला जाना ध्वनि प्रदूषण की श्रेणी में आ गया है. कोई खास वजह नहीं है, फिर भी बोला जा रहा है. कोई सुनने वाला नहीं है,फिर भी बोला जा रहा है.शब्दों की इतनी फ़िज़ूलख़र्ची कभी नहीं की गई, जितनी आज की जा रही है. लोग अगर किसी को सुनते भी हैं तो सिर्फ सुनने के लिए नहीं बाद में बोलने के लिए सुनते हैं. बोलना एक अहम जिम्मेदारी है पर अफ़सोस कि अब वह बीमारी की शक्ल में ढल सा गया लगता है.वाणी की महिमा कौन नहीं जानता. मनुष्य के जीवन में सुख और दुख के जो प्रमुख कारण हैं, उनमें वाणी भी एक है. इसलिए वाणी की शक्ति को जानना और उसे जीवनोपयोगी बना लेना वास्तव में बड़ी बात है. संत कबीर कहते हैं- एक शब्द सुखरास है, एक शब्द दुखरासएक शब्द बंधन करै, एक शब्द गलफांस.संत कबीर ने एक पद में बताया है कि कब, किससे, क्या बोलना चाहिए- बोलत बोलत बाढ़ विकारा,सो बोलिए जो पड़े विचारा.मिलहिं संत वचन दुइ कहिए,मिलहिं असंत…

बी.के.गुप्ता की कविताएँ

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''प्रेम'' अहसास ए मुहब्बत की सदा, दिल से लीजिए।, करना है सच्चा इश्क तो फिर, दिल से कीजिए।। 1.महफिल में हो तन्हाई में हो ,जिक्र उसी का, आंखों से उसके प्यार को महसूस कीजिए। है प्रेम की बुनियाद तो विश्वास पर टिकी, गहराई इसकी रूह से महसूस कीजिए।। 2.ये प्रेम इबादत है ,फिदाई की नजर में, इकरार से इसके कभी मुकरा न कीजिए। है सबसे एक बात मुझे कहना बस यही, खेल नहीं प्यार ,बस एक बार कीजिए।। --- ''आज'' 1.आज सच्चे इंसान नहीं मिलते हैं, लोगों के दिल से दिल नहीं मिलते हैं। आज कल के इस जमाने में सच्चे आइने कहां मिलते।। 2.दिखा करके सब झूठे सपने , दिल के अरमान तोड़ देते है। मत जीना किसी के अहसानों तले, लोग मजबूरियों में वार करते हैं।। 3.धोखे खाये हैं मैंने अपनों से, मुझे अपने ही मात देते हैं। लोग छोटों पर उगलियां उठाते हैं गुनाह बड़ों के तो बेहिसाब होते हैं।। 3.वादा करके जो गया था कभी, उसका आज भी इंतजार करते हैं। वफा न मिली वफा करके , इसलिए आज भी तन्हा रहते हैं ।। -- कविता -''बेटी'' आने वाला कल है बेटी, पावन गंगा जल है बेटी। प्रेम,दया, ममता की मूरत, शुभ …

पाठकीय - बी.के.गुप्ता - ईश्वर क्या है?

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''ईश्वर क्या है''र्इ्रश्वर वह शक्ति है ,जिसके सहारे सूर्य, चन्द्रमा ,पृथ्वी घूम रहे हैं, पेड़-पौधे फल-फूल रहे हैं ,नदियाँ बह रही हैं ,हवा चल रही है, और प्राणी जीवित हैं। रामायण के अनुसार-तुलसीदास जी ने कहा है- सीय राममय सब जग जानी। करऊँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।अर्थात पृथ्वी का हर जीव चाहे वह मनुष्य हो या पशु-पक्षी या पेड़-पौधे सभी ईश्वर का ही रूप हैं। भगवद् गीता के अनुसार-गीता में कहा गया है, कि जो करता हूँ ''मैं'' करता हूँ। अर्थात ''मैं'' शब्द में ही ईश्वर छुपा हुआ है, हर व्यक्ति या जीव ईश्वर है ,जो वह खुद करता है और किये हुए कर्मों का फल उसे प्राप्त होता है। अर्थात मनुष्य की आत्मा ही ईश्वर है, जो कुछ मनुष्य बोलता है वह मनुष्य के अंदर से ईश्वर ही बोलता है। जब आत्मा रूपीईश्वर इस शरीर से निकल जाता है, तब शरीर सिर्फ चमड़े का एक खोल बचता है,जहाँ ईश्वर था। अतः ईश्वर का न तो कोई रंग है ,न ही कोई रूप है ,ईश्वर सिर्फ एक दिव्य शक्ति है। ईश्वर के जो भी रूप माने गए हैं वो सब काल्पनिक है। अतः ईश्वर अदृश्य है, जिसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है। इस दिव्य …

अंजली अग्रवाल की कविता - रेप

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रेपपानी के बुलबुले सी एक लड़की थी ॰॰॰॰ होठों पर मुस्कान लिये घर से निकली थी ॰॰॰॰ कि पड़ नजर शैतानों की॰॰॰॰ और डूब गयी नाव इंसानियत की॰॰॰॰ ओढ ली थी काली चादर आसमान ने॰॰॰॰ निर्वस्त्र कर दिया था भारत माँ को आज इस संसार ने॰॰॰॰ चीखें गूँजती रही मासूम सी जान की॰॰॰॰ बन गयी शिकार वो शैतानों के हवस की॰॰॰॰ कहर की अविरल धारा बहती रही॰॰॰॰ और वो ओस की बूंन्दो सी पिघलती रही ॰॰॰॰ जिस्म गलता रहा और तड़पती रही वो॰॰॰॰ आखिर बन ही गयी लाश वो॰॰॰॰ उसकी मृत आँखें जैसे सारा किस्सा बयां करती थी॰॰॰॰ उसके मृत होंठ सिसकते यह कहते थे कि॰॰॰॰ “ यह संसार नहीं दरिंदों का मेला है, नहीं रहना अब मुझे इस दुनिया में , यहाँ सिर्फ अपमान मेरा है ।” “आज रेप मेरा नहीं इस देश का हुआ है, क्योंकि इस देश का कानून , अंधा है।” उसकी मृत काया मानो चीख—चीख कर एक ही गुहार लगाती हो॰॰॰॰ “ कि तभी आग लगाना इस शरीर को॰॰॰॰ जब सुला दो इन लड़कियों में उन दरिंदों को और दिला न पाये इंसाफ मुझे, तो सड़ जाने देना इस शरीर को ॰॰॰॰ क्योंकि जल तो गयी थी मैं , उसी दिन को॰॰॰॰ अब क्या जलाओगे तुम इस राख को — इस राख को ”अंजली अग्रवाल

अखिलेश कुमार भारती की कविता - जीवन संघर्ष की जयगाथा

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जीवन में इस तरह उदास न होना, मिली असफलता से निराश न होना, जीवन सुख-दुःख का पहिया है, कभी किसी वक्त हताश न होना | जीवन में आए मुश्किलों से अपने को परेशान न करना, जीवन उतार-चढ़ाव का पर्याय है, कवि अपने आत्मबल को कमजोर न होने देना | यही है जीवन आनंद का अंदाज़, हर किसी के जीने का असल में, हर कोई को इस अंदाज़ को न खोने देना | पत्थरों को टूटते भी देखा, आसमां को भी रोते देखा, सूरज की पहली किरण से, जीवन आनंद विभोर होते हुए भी देखा | इंसानियत की भाषा लिए, दुनिया में शांति का आनंद भी देखा | इंसान के संघर्ष से, उसके व्यक्त्तिव की चमक भी देखा, जिससे उजाला हो, उसे जलता भी देखा, कामयाब हुए इंसान के संघर्षपथ को भी देखा, जो निरंतर परिश्रम करते हैं, उनकी कामयाबी भी देखा, जीवन में इस तरह उदास न होना, मिली असफलता से निराश न होना, जीवनपथ में संघर्ष कर अपने को सफल बनाना | --AKHILESH KUMAR BHARTI JUNIOR ENGINEER MPPKVVCL, JABALPUR

दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - मुँह दिखाई करो मस्त रहो

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कोई काम आता हो या न आता हो, किसी भी प्रकार की काबिलियत हो, न हो, मानवीय संवदनाएं, संस्कार, सिद्धान्त और आदर्श से कोसों दूर हों, न अनुशासन को अपनाने की कोई जरूरत है, न किसी प्रकार की कोई मर्यादाएं। जीवन के किसी भी क्षेत्र में हों, आजकल कर्मयोग से कहीं ज्यादा प्रभाव छोड़ती है मुँह दिखाई। किसी कोने में दुबके हुए हम कितनी ही शिद्दत और समर्पण से कितना ही बड़ा भारी काम क्यों न कर लें, इस ओर न कोई देखने वाला है, न हमारे इन कामों की पूछ करने वाला कोई है। अब काम से अधिक चेहरों का मंजर है। कुछ करो न करो, उन लोगों के आगे-पीछे लगे रहो, उन्हें बार-बार अपना चेहरा दिखाते रहो, बस यही है कर्मयोग की प्रामाणिकता और हाजरी।  आजकल सब जगह यही सब कुछ हो रहा है। काम करने वालों से ज्यादा संख्या उनकी है जो सिर्फ चेहरे दिखाकर वाहवाही लूट लिया करते हैं, बड़े-बड़ों और महानों-प्रभावशालियों के खास हो जाते हैं तथा वह सब कुछ पा लिया करते हैं जो एक मामूली इंसान पाना चाहता है। आजकल इंसानों के भीतर से कर्मनिष्ठा और समर्पण गायब होता जा रहा है और इसकी जगह ले ली है सिर्फ और सिर्फ मुँह दिखाई ने। यह मुँह दिखाई ही है जो कि औरों…

दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - त्यागें आत्मबंधन

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हम सभी के पैदा होने का उद्देश्य लोक मंगल और विश्वोत्थान के कामों को आगे बढ़ाने में भागीदार बनना और मुक्ति पाने के लिए निरन्तर प्रयासरत रहना है। जिसे मुक्ति की कामना होती है वह सारे के सारे बंधनों से परे रहता है। जीवन में सारे कर्म अनासक्त होकर करता है और वे ही काम करता है जिससे हमारी जीवन्मुक्ति का दौर बना रहे और जीवन का अंत हो जाने पर शाश्वत गति-मुक्ति हो। लेकिन यह सब कुछ केवल सोच-विचार तक ही सीमित रहता है। इसके बाद इन बातों का कोई वजूद नहीं रहता। जब तक हम शुद्ध चित्त और निर्मल शरीरी होते हैं तभी तक हमारा मस्तिष्क ऊर्वरा और सकारात्मक वैचारिक भावभूमि से परिपूर्ण बना रहता है।  जैसे ही हमारे दिल और दिमाग में संसार घुसने लगता है तभी से हमारा मन-मस्तिष्क और शरीर संसारी हो जाते हैं और असारी बातों का दामन थाम लिया करते हैं। हम सभी लोगों ने इस मामले में अपनी मौलिकता को खोकर आडम्बर और बहुविध कृत्रिमता ओढ़ ली है जहाँ हम छोटे-मोटे स्वार्थों और वासनाओं का पल्ला पकड़ कर किसी न किसी विचार, व्यक्ति या संसाधन से बंध जाते हैं। और एक बार जब कोई भी किसी भी प्रकार क बंधन से सायास या अनायास बंध जाता है त…

कैलाश प्रसाद यादव की कविताएँ - लौटा फिर से प्यार

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करवा चौथ - लौटा फिर से प्यारचंदा देख रही चंदा में, सजन की सूरत, सजन का प्यार
आज सुहागिन सजी है फिर से, फिर से किये सिंगार।
  चंदा ढ़ूंढ़ रही चंदा को, दूर गगन के पार,
  निराहार दिन भर से फिर भी, न माँगे संसार,
  लंबी उम्र सजन की माँगे, माँगे सच्चा प्यार।
  आज सुहागिन सजी है फिर से, फिर से किये सिंगार।
करवॉ चौथ, पावन गंगा सा, निर्मल जिसकी धार,
जिनके साजन रूठ गये थे, चंदा के संग वे भी लौटे,
                      लौटा फिर से प्यार।
आज सुहागिन सजी है फिर से, फिर से किये सिंगार।                        --                याद फिजा़ में रहती हैं..... आती-जाती साँसें मुझसे, चुपके से कुछ कहती हैं...
आनी-जानी काया लेकिन, याद फिजा में रहती हैं
   अंग-अंग में घाव लगे हों, पोर-पोर भी घायल हो,
   मन भारी हो धरा के जितना, फिर भी सब कुछ सहती हैं...
   आनी-जानी काया लेकिन, याद फिजा में रहती हैं
इन नयनों से जो कुछ दिखता, वो तो केवल नश्वर है...
भूख, प्यास, एहसास शाश्वत, इन्हीं की नदियां बहती हैं...
आनी-जानी काया लेकिन, याद फिजा में रहती हैं
   दूर कहीं से बिन बोले ही, बाँह पसारे आती है,
   गोद बिठाकर सबको इक दिन, दूर कहीं…

मनोज कुमार का आलेख - अखबारों में पाठकों के हिस्से की सेंधमारी

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उपभोक्ताओं को जागरूक बनाने के अनेक उपक्रम संचालित हो रहे हैं। केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों में यह अभियान चला हुआ है। करोड़ों रुपयों के विज्ञापन प्रकाशित किये और कराये जा रहे हैं। उपभोक्ताओं की श्रेणी में उन्हें रखा जा रहा है जो टीवी, फ्रिज, कूलर से लेकर दवाएं खरीदते हैं। इस श्रेणी में संभवतः पत्र-पत्रिकाएं और केबल कनेक्शन लेने वालों को शामिल नहीं किया गया है। इसका कारण शायद इनकी श्रेणी अलग है क्योंकि इन्हें उपभोक्ता न कहकर पाठक और दर्शक कहा जाता है अर्थात इनका संबंध बाजार से न होकर बौद्धिक दुनिया से है। कानून की भा में भले ही ये उपभोक्ता नहीं कहलाते हों किन्तु प्राथमिक रूप से यह उपभोक्ता की ही श्रेणी में आते हैं। पढ़ने के पहले की प्रक्रिया पत्र-पत्रिका खरीदना अथवा केबल कनेक्शन के लिये तयशुदा रकम चुकाना है, ऐसे में वे पहले उपभोक्ता होते हैं और बाद में पाठक या दर्शक। पाठक और दर्शकों के हिस्से में सेंधमारी लम्बे समय से की जा रही है, वह अन्यायपूर्ण है बल्कि ये पाठक और दर्शक तानाशाही के शिकार हो चले हैं। सीधे तौर पर पाठक और दर्शकों के हिस्से में सेंधमारी का मामला साफ नहीं होता है किन्तु…

प्राची - सितम्बर 2015 - श्रीलाल शुक्ल की टिप्पणी : इमेज का दुखियारा - भारतीय लेखक

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इमेज का दुखियारा : भारतीय लेखक श्रीलाल शुक्लभारतीय भाषाओं में जब साहित्यकार के संघर्षशील क्षणों या उसके गर्दिश के दिनों का प्रसंग आता है, तो वह प्रायः उसकी गरीबी या अभावों का प्रसंग होता है, अपने परिवेश से टकराने या रचना-प्रक्रिया के तनावों को झेलने का नहीं. संघर्षशील साहित्यकार की एक खास तस्वीर बन गयी है जिसमें वह कविता या कहानी या उपन्यास नहीं लिखता, वह साहित्य-सेवा या साहित्य-साधना करता है. गरीबी और अभाव की स्थिति उसके साहित्यिक कृतित्व को अतिरिक्त गरिमा देती जान पड़ती है. एक तरह से साहित्यकार के हक में गरीबी को एक साहित्यिक मूल्य मान लिया गया है.साहित्यकार के प्रति स्वाभाविक सहानुभूति होने के बावजूद मुझे उसकी गरीबी का अनावश्यक गरिमा मंडन अप्रिय लगता रहा है. ‘वह तोड़ती पत्थर’ की नायिका और उसके रचयिता का अपना विशिष्ट महत्त्व मानते हुए भी मैं यह नहीं जान पाया हूं कि पत्थर तोड़ने वाली के आर्थिक संघर्ष से निराला का आर्थिक संघर्ष वस्तुतः भिन्न है या वह किसी अतिरिक्त चिंता का विषय है. बुनियादी तौर पर चिंतन का विषय अगर कोई है तो देानेां की जड़ में मौजूद वह व्यवस्था है जो शोषण के सिद्धांत पर प…

प्राची - सितम्बर 2015 - राजीव आनंद का आलेख : भीष्म साहनी : मासूम इंसानियत के लेखक

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आलेख शताब्दी वर्ष पर विशेषभीष्म साहनी : मासूम इंसानियत के लेखकराजीव आनन्द भीष्म साहनी के लेखन, अभिनय और जीवन से ‘मासूम इंसानियत’ पर अडिग विश्वास मजबूत होता है, जो उनकी संपूर्ण रचनाकर्म की विशेषता भी है और ताकत भी. भीष्म साहनी की रचनाएं आमजन के साथ किए जा रहे भेदभाव, शोषण और षड्यंत्र की यथार्थ बयान करते दस्तावेज हैं. उन्होंने देश की राजनीति, सामाजिक, आर्थिक कुरूपताओं तथा साम्प्रदायिकता की सड़ांध पर प्रखरता और गहराई से लिखा. राजनीति और धर्म की जुगलबंदी की त्रासदी को उन्होंने आंखों से देखा था और विभाजन की गहरी साजिश को पहचाना, जिसे हम ‘तमस’ में पढ़ सकते हैं. उन्होंने नाटक की नई परम्परा शुरू की, जिसके तहत वे नाटक के अंशों को लिखकर अपने साथियों को सुनाते व राय लेते थे फिर आगे का अंश लिखते थे. देवताओं का मानवीकरण तथा देवताओं के कार्यों की मनुष्यों द्वारा समीक्षा, इसी मूलभूत ढांचे पर भीष्म साहनी ने अपना प्रसिद्ध नाटक ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ लिखा था. उन्होंने सहज मानवीय अनुभूतियों और तत्कालीन जीवन के अर्न्तद्वंद को अपनी रचना का विषय बनाया. जनता की पीड़ा भीष्म साहनी की लेखकीय संवेदना का आधार बनी. …

प्राची - सितम्बर 2015 - कविताएँ, ग़ज़लें और दोहे

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काव्य जगतराकेश भ्रमरतुमने मुझे छुआ कि बदन जगमगा गया. कोई जला चराग, सहन जगमगा गया. ये फूल कौन-सा तेरे माथे पे खिल गया, गुजरे इधर से तुम जो, चमन महमहा गया. इस दर पे तेरा नाम हवाओं ने लिखा था, खुशबू के बोझ से ये बदन थरथरा गया. इतनी थी आरजू कि मेरे दर पे वो रुकें, आए जो मुक़ाबिल तो कदम डगमगा गया. चलते हो धूप में कभी साए में बैठ लो, देखो तो किस तरह ये बदन तमतमा गया. हमने तो उस परी से कोई बात भी न की, किसके ये बोल थे कि बदन गुनगुना गया. -------शहर और सड़कराजेश माहेश्वरीशहर की सड़क पर उड़ते हुए धूल के गुबार ने अट्टहास करते हुए मुझसे कहा- मैं हूं तुम्हारी ही भूल का परिणाम पहले मैं दबी रहती थी तुम्हारे पैरों के नीचे सड़कों पर पर आज मुस्कुरा रही हूं तुम्हारे माथे पर बैठकर पहले तुम चला करते थे निश्चिंतता के भाव से शहर की प्यारी-प्यारी सुन्दर व स्वच्छ सड़कों पर पर आज तुम चल रहे हो गड्ढों में सड़कों को ढूंढ़ते हुए कदम-दर-कदम संभलकर तुमने भूतकाल में किया है मेरा बहुत तिरस्कार मुझ पर किए हैं अनगिनत अत्याचार अब मैं उन सबका बदला लूंगी और तुम्हारी सांसों के साथ तुम्हारे फेफड़ों में जाकर बैठूंगी तुम्हें उपहार …

प्राची - सितम्बर 2015 - पूजाश्री का आलेख : भाषा राष्ट्र की संजीवनी

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भाषा राष्ट्र की संजीवनीपूजाश्रीजादी के अड़सठ-बरस बाद भी, देश ने हिंदी को हृदय से राष्ट्र-भाषा स्वीकार नहीं किया है. उच्च स्तर पर साधन-सम्पन्न लोग, अक्सर ही अंग्रेजी माध्यम से ही अपने बच्चों को शिक्षा दिलाते हैं. उनके बच्चों को हिन्दी के साधारण व्यवहार में आने वाले शब्दों का अर्थ भी मालूम नहीं होता है. कुछ लोग तो अंग्रेजी के इतने दास हैं कि यदि उनके पास-पड़ोस में हिन्दी बोलने वाले कोई रहने को आ जाएं, तब वे अजीबो-गरीब ढंग से उन पर नाक-भौंह सिकोड़ने लगते हैं. इसका कारण है, राजनेताओं द्वारा राष्ट्र-भाषा को उलझाए हुए रखना. किसी भी राष्ट्र में, राष्ट्र की सर्वाधिक उन्नति और आपसी आत्मीयता, एकता के लिये, एक भाषा ही, उस राष्ट्र के लिए संजीवनी का काम करती है. देश के दुश्मनों या देश में ही छिपे देश-द्रोहियों ने, राष्ट्र भाषा की अवहेलना करने का षड्यंत्र किया है और करते रहते हैं, जबकि हमारे देश में सिद्धनाथ पंथी साधुओं, सूफी-संतों, महाराष्ट्र और गुजरात के भक्तों, बंगाल और असम के वैष्ण संतों ने अपने विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम हिन्दी को ही बनाया था. जिस समय हमारे देश का राजनीतिक स्तर एक नहीं था, …

प्राची - सितम्बर 2015 - प्रभु चौधरी का आलेख : राष्ट्रभाषा हिन्दी आवश्यकता हमारी है

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आलेख राष्ट्रभाषा हिन्दी आवश्यकता हमारी हैडॉ. प्रभु चौधरी डॉ. विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में सात सौ वर्षों से कायम हिन्दी नष्ट होने वाली नहीं है. हिन्दी वषरें से इस देश की सम्पर्क भाषा और धीरे-धीरे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपना स्थान सुनिश्चित कर रही है. सन् 1975 में नागपुर में हुए पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी को विदेशों में पहुंचाने की नींव रखी. हिन्दी मॉरीशस, ट्रिनीडाड तक पहुंच गई. अप्रवासी भारतीय एवं विदेशों में रहने वाले हिन्दी भाषियों के हिन्दी के प्रति गहन अवदान की वजह से हिन्दी आज विश्व भाषा बनने की तरफ अग्रसर है. 14-18 सितम्बर, 1999 में छठें विश्व हिन्दी सम्मेलन द्वारा हिन्दी लंदन पहुंच गयी. 1975 में नागपुर से शुरू की गई यात्रा में हिन्दी मॉरीशस, दिल्ली, ट्रिनीड्राड होते हुए लंदन पहुंची है. लंदन से सारे विश्व में हिन्दी को जाना है. कहने को यह यात्रा सहज नहीं रही है. आज हिन्दी को विश्व भाषा बनना है. अंग्रेजी का विकल्प बनना है. इसके लिए हिन्दी भाषा के साहित्य प्रचार-प्रसार में जुटे विद्वानों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाना पड़ेगा, तभी हिन्दी सहयोग, सहचर्य और स्नेह…

प्राची - सितम्बर 2015 - भावना शुक्ल का आलेख : हिन्दी में राष्ट्रीय चेतना का स्वर

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आलेख हिन्दी में राष्ट्रीय चेतना का स्वरडॉ. भावना शुक्लवैदिक काल से ही राष्ट्र शब्द का प्रयोग होता रहा है. राष्ट्र की परिभाषायें समय-समय पर बदलती रही हैं. किन्तु राष्ट्र और राष्ट्रीयता का भाव गुलामी के दौरान अधिक पनपा. जो साहित्य के माध्यम से हमारे समक्ष आया जिसके द्वारा राष्ट्रीय चेतना का संचार हुआ. साहित्य का मनुष्य से शाश्वत संबंध है. साहित्य सामुदायिक विकास में सहायक होता है और सामुदायिक भावना राष्ट्रीय चेतना का अंग है. समाज का राष्ट्र से बहुत गहरा और सीधा संबंध है. संस्कारित समाज की अपनी एक विशिष्ट जीवन शैली होती है. जिसका संबंध सीधा राष्ट्र से होता है जो इस रूप में सीधे समाज को प्रभावित करती है. कवियों ने राष्ट्र जागृत करने के लिये, सोये हुये राष्ट्र को अपनी कविताओं के माध्यम से संघर्ष के लिये प्रेरित किया. भक्त कवियों ने अपने अंतःकरण में बह रही राष्ट्रीय चेतना की धारा से सुप्त और निरासित समाज को नयी दिशा दी. भक्तिकाल के कवि कबीरदासजी ने निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना का आदर्श प्रस्तुत किया और इसी के माध्यम से राष्ट्रीय गरिमा में नवजीवन का संचार कर राष्ट्र को नई दिशा दी. महान …

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