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रचना समय - जुलाई-अगस्त 2015 : संपादकीय

रचना समय - जुलाई अगस्त 2015

यह अंक

अरबी और फारसी दुनिया की प्राचीन भाषाओं में गिनी जाती हैं। इन्हीं अर्थों में इन भाषाओं के साहित्य ने दुनिया की तकरीबन सभी भाषाओं और संस्कृतियों को प्रभावित किया। यही नहीं, अरब दार्शनिक कवियों एवं रचनाकारों ने कलात्मक अनुशासनों के विभिन्न माध्यमों से अपनी भाषा को काफी हद तक सम्पन्न किया। इस दृष्टि से देखें तो पंचतंत्र का पहला अरबी अनुवाद तीसरी और चौथी सदी में हो गया था और उसमें वर्णित कर्टक और दमनक की कथा के अरबी रूपांतर कलीला-ओ दिमना से अरबी कथा साहित्य की शुरुआत हुई। अरबों के रास्ते ही यह कथा स्पेन पहुँची और वहाँ भी इसने कथा साहित्य का सूत्रपात किया।

19वीं सदी में अरबी दास्तानों के संग्रह ‘अल्फ लैला-ओ लैला’ का अंग्रेजी रूपांतर ‘अरेबियन नाइट्स’ दुनिया भर में मशहूर हुआ। फारसी भाषा का विस्तार यद्यपि ईरान तक ही सीमित है किन्तु इसकी प्राचीनता वैदिक संस्कृत तक जाती है और भारत के साथ उसके संबंध ईसा पूर्व छठी सदी तक जाते हैं। दारा प्रथम के पुरालेख से ही जाति और सभ्यता के अर्थ में हिन्दू शब्द हमारे यहाँ प्रचलन में आया और मध्यकाल में फारसी हमारे यहाँ राज-काज की भाषा बनी। मात्र साहित्य की दृष्टि से ही देखें तो 1000 ईसवीं से ही रूमी, उमर खैय्याम, फिरदौसी, हाफिज आदि फारसी के महाकवि अपने कृतित्व से विश्व साहित्य को समृद्ध करने लगे थे। हिन्दी खड़ी बोली कविता के सूत्रधार अमीर खुसरो मूलतः फारसीभाषी और फारसी साहित्यकार थे। इस तरह अरबी और फारसी से हमारा और दुनिया भर का सांस्कृतिक आदान-प्रदान हज़ारों साल से है।

इन्हीं अर्थों में रचना समय के प्रस्तुत अंक में समकालीन अरबी-फारसी कथा और काव्य साहित्य की एक झलक प्रस्तुत करने की भावना को ग्रहण किया जाना चाहिए। अरबी भाषा का विस्तार बड़ा है। वह पश्चिमी एशिया और मध्यपूर्व तथा उत्तरी अफ्रीका के कई देशों में बोली जाती है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद की नई विश्व व्यवस्था में विशेषकर यहूदी राष्ट्र के रूप में इजराइल के अस्तित्व में आने के बाद से अरबी अस्मिता का प्रश्न इस समूचे क्षेत्र में अभिव्यक्ति का प्रमुख विषय बना। फिलिस्तीन के वजूद का प्रश्न और उसमें अमरीकी राजनीति के हस्तक्षेप ने समूचे क्षेत्र के साहित्य को एक नया प्रतिरोधी स्वर दिया। सीरियाई मूल के लेबनानवासी अरबी कवि अदूनीस और फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश की कविताओं में यह स्वर प्रमुखता से सुना जा सकता है। सीरियाई कथाकार ज़करिया तमेर, सूडानी कथाकार तैयब साले’ह और ईराकी कथाकार जाफ़र अल-ख़लीली की कहानियाँ भी विचार और कथा- भाषा का एक विशिष्ट आयाम खोलती हैं। मिस्र की बिल्कुल नई पीढ़ी की कविताएँ वहाँ के मौजूदा राजनीतिक- सामाजिक संकट की अभिव्यक्ति हैं।

फारसी साहित्य में भी विगत 50-60 सालों के दौरान परम्परा से हट कर सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक प्रश्नों पर नए ढंग से सोचने का सिलसिला ग़ौर किया जाता रहा है। वहाँ के आधुनिक कवि-कथाकार नए विचारों और नए दृष्टिकोणों से अपने को अभिव्यक्त करते रहे हैं। यहाँ प्रस्तुत उनकी रचनाएँ इसकी पुष्टि करती हैं। रचना समय के इस अंक में प्रस्तुत सभी अरबी-फारसी के साहित्यकार आधुनिक पीढ़ी के हैं जो 1930-1960 के दरम्यान पैदा हुए।

प्रस्तुत कवियों-कथाकारों की रचनाओं का हिन्दी अनुवाद सुपरिचित रचनाकार सुरेश सलिल ने किया है। गणेश शंकर विद्यार्थी के विचारों पर विशेषज्ञता रखने वाले सुरेश सलिल के पाँच काव्य संग्रह प्रकाशित हैं। 20वीं सदी की दुनिया की कविता का एक वृहद संचयन ‘रोशनी की खिड़कियाँ’ और पाब्लो नेरूदा, नाजी हिकमत और लोर्का की कविताओं के स्वतंत्र पुस्तकाकार अनुवाद सलिल ने किये हैं। सलिल सादतपुर, दिल्ली में रहते हैं। विश्वास है, पाठकों को प्रस्तुत रचनाएँ पसंद आएँगी।

- हरि भटनागर

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