विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

प्राची - सितम्बर 2015 - राजीव आनंद का आलेख : भीष्म साहनी : मासूम इंसानियत के लेखक

आलेख

शताब्दी वर्ष पर विशेष

भीष्म साहनी : मासूम इंसानियत के लेखक

राजीव आनन्द

भीष्म साहनी के लेखन, अभिनय और जीवन से ‘मासूम इंसानियत’ पर अडिग विश्वास मजबूत होता है, जो उनकी संपूर्ण रचनाकर्म की विशेषता भी है और ताकत भी. भीष्म साहनी की रचनाएं आमजन के साथ किए जा रहे भेदभाव, शोषण और षड्यंत्र की यथार्थ बयान करते दस्तावेज हैं. उन्होंने देश की राजनीति, सामाजिक, आर्थिक कुरूपताओं तथा साम्प्रदायिकता की सड़ांध पर प्रखरता और गहराई से लिखा. राजनीति और धर्म की जुगलबंदी की त्रासदी को उन्होंने आंखों से देखा था और विभाजन की गहरी साजिश को पहचाना, जिसे हम ‘तमस’ में पढ़

सकते हैं.

उन्होंने नाटक की नई परम्परा शुरू की, जिसके तहत वे नाटक के अंशों को लिखकर अपने साथियों को सुनाते व राय लेते थे फिर आगे का अंश लिखते थे. देवताओं का मानवीकरण तथा देवताओं के कार्यों की मनुष्यों द्वारा समीक्षा, इसी मूलभूत ढांचे पर भीष्म साहनी ने अपना प्रसिद्ध नाटक ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ लिखा था. उन्होंने सहज मानवीय अनुभूतियों और तत्कालीन जीवन के अर्न्तद्वंद को अपनी रचना का विषय बनाया. जनता की पीड़ा भीष्म साहनी की लेखकीय संवेदना का आधार बनी. जनता को समर्पित भीष्म साहनी का लेखन यथार्थ की ठोस जमीन पर अवलम्बित है. उनकी साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें सामाजिक विषमता व विड़म्बनाओं के बंधनों को तोड़कर आगे बढ़ने का आह्वान है. मानवीय करुणा, मूल्य एवं नैतिकता उनके साहित्य में सर्वत्र विद्यमान है.

लेखन की सच्चाई को अपनी सच्चाई मानने वाले भीष्म साहनी ने जिस जीवन को जिया, जिस संघर्षों से रूबरू हुए, उसी को हर्फ-हर्फ अपनी रचनाओं में लिखा. भीष्म साहनी के उपन्यासों में हम भारत के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक यथार्थ का स्पष्ट चित्र देख सकते हैं. जनवादी कथा आंदोलन के दौरान भीष्म साहनी ने आम आदमी की आशा, दुख, पीड़ा, दर्द, अभाव, संघर्ष तथा विडम्बनाओं को अपने उपन्यासों में समेटा तथा नई कहानी में उन्होंने कथा साहित्य की जड़ता को तोड़कर उसे ठोस सामाजिक आधार दिया. विभाजन के दुर्भाग्यपूर्ण खूनी इतिहास को भीष्म साहनी ने व्यक्तिगत तौर पर सहा और भोगा जिसकी मार्मिक अभिव्यक्ति हम ‘तमस’ में देख सकते हैं.

प्रेमचंद तथा यशपाल से प्रभावित भीष्म साहनी कई अर्थों में प्रेमचंद और यशपाल से कहीं आगे निकल गए. भीष्म साहनी की रचनाओं में सामाजिक अन्तर्विरोध पूरी तरह उभर कर सामने आता है. भारतीय राजनीति में निरंतर बढ़ते भ्रष्टाचार, नेताओं की पाखंडी प्रवृत्ति, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, वंशवाद, शोषण की षड्यंत्रकारी प्रवृत्तियां तथा राजनैतिक आदर्शों के खोखलेपन का चित्रण अपनी रचनाओं में बड़ी तटस्थता व प्राथमिकता के साथ किया है.

भीष्म साहनी का सांस्कृतिक दृष्टिकोण काफी वैज्ञानिक और व्यावहारिक रहा, जो निरंतर परिष्करण, परिशोधन एवं परिवर्धन की प्रक्रिया से गुजरता रहा. पूंजीवाद के द्वारा अपनी बुर्जुआ संस्कृति से लोकप्रिय हुई निम्नकोटि के बुर्जुआ संस्कारों पर कुठाराघात करते भीष्म साहनी प्रेमचंद की परम्परा को आगे बढ़ाते चलते हैं. वे पूंजीवादी आधुनिकताबोध और यथार्थवादी विचारधारा के अन्तर्विरोधों का पर्दाफाश करते हैं और आधुनिकताबोध की विसंगतियों और अजनबीपन के विरुद्ध लड़ते भी हैं. उन्होंने अपनी रचनाओं में रूढ़ियों, अंधविश्वासों वाली धार्मिक कुरीतियों पर जम कर प्रहार किया है.

भीष्म साहनी शोषणविहीन, समतामूलक प्रगतिशील समाज की स्थापना के पक्षधर रहे, इसलिए उनके उपन्यासों में समाज में व्याप्त आर्थिक विसंगतियों के त्रासद परिणाम, धर्म की विद्रुपता व खोखलेपन उद्घाटित हुए हैं. अपने उपन्यासों ‘बंसती, झरोखे, तमस, मायादास की माड़ी तथा कड़ियां’ में उन्होंने आर्थिक विषमता और उसके दुखद परिणामों को बड़ी मार्मिकता से उद्घाटित किया है.

रावलपिंडी में 8 अगस्त 1915 को जन्में भीष्म साहनी का साहित्यिक सफर उनकी पहली कहानी ‘अबला’ से प्रारंभ हुआ, दूसरी कहानी ‘नीली आंखें’ थी जो उस समय प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय के द्वारा निकाली जा रही पत्रिका ‘हंस’ में छपी थी. उन्होंने ‘झरोखे, कड़ियां, तमस, मायादास की माड़ी, कुंतों, नीलू नीलिमा निलोफर’ नामक उपन्यासों के अलावा ‘निशाचर, पाली, शोभायात्रा, भाग्यरेखा, पटरियां, पहला पाठ, भटकती राख, वाङचू आदि कहानियों का सृजन किया. उन्होंने कई प्रसिद्ध नाटक यथा, ‘हानूश, कबिरा खड़ा बाजार में, माधवी, मुआवजे आदि लिखे. उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘आज के अतीत’ के नाम से लिखी तथा अपने बड़े भाई बलराज साहनी की भी कथा, ‘मेरे भाई बलराज’ लिखा. बाल साहित्य के अंतर्गत उन्होंने ‘गुलेल का खेल’ और ‘वापसी’ का सृजन किया. इस तरह भीष्म साहनी ने साहित्य की लगभग हर विद्या पर अपनी कलम चलाई.

बहुमुखी प्रतिभा के धनी भीष्म साहनी ने कई फिल्मों जैसे ‘मोहन जोशी हाजिर हो’, तमस, कस्बा, लिटिल बुद्धा तथा मिस्टर एंड मिसेज अय्यर’ में बतौर कलाकार भूमिका भी निभायी थी. हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द्र को स्थापित करने हेतु उन्होंने थियेटर कलाकार सफदर हासमी की याद में ‘सहमत’ नामक संस्था की स्थापना की तथा उसके अध्यक्ष भी रहे.

11 जुलाई 2003 को दिल्ली में 87 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हुआ. अपनी कालजयी रचनाओं के कारण भीष्म साहनी हिन्दी साहित्य में युगान्तकारी रचनाकार के रूप में सदा स्मरणीय रहेंगे. उनकी स्मृति को हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि.

 

संपर्कः प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंडा,

गिरिडीह-815301, (झारखंड)

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget