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प्राची - सितम्बर 2015 - पाठकों के पत्र

 

आपने कहा है

काश हम अनुशासित हो पाते

प्राची अगस्त 15 का अंक मिला. यह अति श्रेष्ठ अंक है. सम्पादकीय आलेख में धारावाहिकों में स्त्रियों के पारस्परिक वाक्युद्ध एवं घरेलू जीवन में उनके बीच चलने वाले युद्धों का तुलनात्मक विवेचन, इन धारावाहिकों से होने वाले लाभ और हानि का विस्तृत विवेचन, इनसे नेताओं को सीख लेने की प्रेरणा आदि सभी कुछ सत्य के निकट हैं. काश! धारावाहिक देखकर हम कम से कम अनुशासन ही सीख पाते. धारावाहिक की बातें तो केवल टी.वी. के सामने बैठने तक के लिये हैं. वास्तविक जीवन में उन्हें स्थान देना भला कहां संभव है

व्यंगात्मक शैली में इसके सभी पहलुओं पर सार्थक टिप्पणी की गई है. जो कि अनुकरणीय है.

कहानियां, व्यंग्य, कविता, लघुकथाओं से सुसज्जित यह पत्रिका निश्चित ही अपनी श्रेष्ठता प्रतिधारित करती है. सुश्री गीता गीत की भूकंप पर कहानी प्रेरणादायक है. श्री विजयेन्द्र स्नातक का छायावाद पर आलेख अत्यन्त श्रेष्ठ एवं पठनीय है. श्री केदारनाथ सविता की लघुकथा ‘मां की निशानी’ अत्यंत प्रेरणा दायक है. काश! सभी बेटे मां-बाप के साथ इसी प्रकार का व्यवहार करें तो वे अन्तिम समय में सुख के साथ इस संसार से विदाई ले सकें. किन्तु आज के स्वार्थपूर्ण युग में यह आदर्श कौन अपनाता है

सनातन कुमार वाजपेयी ‘‘सनातन’’

 

विचार दिशाहीन न हों

अगस्त माह 2015 का सम्पादकीय अत्यंत ही यथार्थवादी और प्रभावशाली है. सम्पादकीय में स्त्रियां जिस तन्मयता से धारावाहिक देखती हैं, उसका जो चित्रण किया गया है वह प्रशंसनीय है. धारावाहिक में स्त्री पात्र जिस शिष्टता और अनुशासनप्रियता के साथ संवाद करती हैं वह संसद के सदस्यों के लिए प्रेरणादायी है. जब एक स्त्री पात्र संवाद बोलती हैं तो धारावाहिक के अन्य पात्र चुपचाप खड़े रहते हैं. जब उसका संवाद समाप्त हो जाता है, तभी दूसरा पात्र बोलता है. यही संस्कृति यदि लोकसभा, राज्यसभा,

विधान सभा और विधान परिषद के सदस्य अपना ले तो सदनों में हंगामा न हो. हमने इंग्लैंड की संसदीय प्रणाली को अपना तो लिया है, परन्तु उनके संसदीय सदाचार को नहीं अपनाया है. इंग्लैंड में जब से संसद की स्थापना हुई है तब से आज तक दोनों सदनों की कार्रवाई किसी भी दिन स्थगित नहीं हुई है, ऐसा मैंने एक समाचार पत्र में पढ़ा था. हमारे यहां प्रायः संसद के सदनों की कार्रवाई स्थगित होना एक आम बात हो गयी है. हमारे सांसदों और विधायकों को इस बात से सीख लेना चाहिए.

डॉ. भावना शुक्ल की कविता ‘‘विचार और बूंद’’ बहुत ही प्रभावशाली और शिक्षाप्रद कविता है. ‘‘बूंद हो विचार, खतरनाक है दोनों की दिशाहीनता’’ हमें इस बात की शिक्षा देती है कि हमारे विचार दिशाहीन न हों, यदि ऐसा हुआ तो समाज का बहुत बड़ा अहित हो जाएगा. आतंकवाद, नक्सलवाद, दिशाहीन विचार के परिणाम हैं जिसे पूरा संसार भुगत रहा है. हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए अणुबम दिशाहीन विचार के परिणाम थे.

डॉ. कुवल प्र्रेमिल की कहानी ‘‘आदमी के सुखदुख में’’ बहुत ही सराहनीय है. एस.एस.एच. रिजवी की कहानी, ‘‘मुझे सस्पेंड कर दीजिए सर’’ इस बात पर प्रकाश डालती है कि हमारी शिक्षा की गुणवत्ता का सर्वनाश क्यों हुआ है. आज सरकारी स्कूलों में बहुत कम बालक प्रवेश कर रहे हं.ै उनके पीछे ऐसे ही शिक्षकों का हाथ है.

शरद चन्द्र राय श्रीवास्तव, जबलपुर

 

पत्रिका निष्पक्ष है

‘प्राची’ हमारे सिरहाने की मासिक पत्रिका है. इसे कुछ ही दिनों से प्राप्त कर पढ़ रहा हूं. सांगोपांग अध्ययन पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि पत्रिका सारगर्भित है, मितव्ययी है, सहज सुलभ है, आडम्बर रहित है, निष्पक्ष होने में प्रयासरत है और बहुआयामी सन्देश वाहक बनने का हर संभव प्रयास कर रही है.

इधर कुछ माहों से सम्पादक महोदय के स्पष्ट आग्रह के बावजूद भी सम्पादकीय की अति प्रशंसा से इस बात की शंकायें उभरने लगी हैं कि कहीं पाठकों और लेखकों में चाटुकारिता तो नहीं पनप रही है. देखा-देखी पनप रही यह प्रवृत्ति कॉलम को बोझिल न बना दे. बहरहाल इसमें कोई सन्देह नहीं है कि सम्पादकीय नूतन समस्याओं एवं विसंगतियों पर निरन्तर प्रहार करती हुई समाधान के अच्छे सुझाव भी प्रस्तुत करती है. ‘‘चलो आत्महत्या करें’’ अति प्रासंगिक है.

स्वात्रंत्योत्तर उपन्यास (श्री मधुरेश) का साहित्य और समाज में लेखकों के लिए नयी प्रेरणा प्रदान करता है, ‘‘नेता जी की चतुराई’’ (आनन्द कुमार त्रिपाठी भोपाल) नेताओं की पोल खोल रहा है तो लघुकथा ‘‘कैसी जागृति’’ लोगों के कथनी और करनी को स्पष्ट करती है. कविता में ‘‘इतिहास के पन्नों पर’’ राजीव कुमार त्रिगर्ती की कविता सबसे अच्छी लगी.

केशरी प्रसाद पाण्डेय ‘‘वृहद’’ (जबलपुर)

 

आपका तेवर दूसरों के लिए सबक है

कमनीय कलेवर में ‘प्राची’ का जुलाई अंक 2015 नसीब हुआ. मई-जून के अंक से वंचित होने का मलाल है. क्या हम आजाद हैं? संज्ञक संपादकीय के अन्तर्गत कोई भी वाजिब मुद्दा छूट नहीं सका है. यह आप की बहु-आयामी दृष्टि, साफगोई और सुविचार दृष्टि-सम्पन्नता का नमूना है. किसी भी मुद्दे पर कहने-लिखने के लिए व्यक्ति की पारदर्शी सोच और बेबाक नजरिया की दरकार होती है. यह खूबी आप के लेखकीय व्यक्तित्व में समाहित है. आपने जिन मुद्दों को सुस्पर्शित किया है उसको लिखने में लेखकों की रूह कांप जायेगी. आप अपनी कारोबारी जिन्दगी में जहां से जुड़े हैं वहां से कुछ भी बोलने का प्रयास दुश्वारीपूर्ण है. यह आप का बुनावटी तेवर दूसरों के लिए सबक है. ‘आम आदमी’ की व्यथा-कथा पर आपकी यह टिप्पणी ‘बस उसे मताधिकार में समानता प्राप्त है, परन्तु इससे उसके घर में एक जून का चूल्हा भी नहीं जलता’ आमजन की मारक दास्तान है. राजनीति की वर्तमान स्थिति यह है कि अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों की बात करके राष्ट्रीय मुद्दों को गर्त में झोंका जा रहा है. आचार्य भगवत दुबे की गजल की धार काफी तीक्ष्ण है. खास तौर पर उनकी शीर्षस्थ गजल, गजल का यह शे’र ‘मुक्तिका’, गीतिका, तेवरी कुछ कहो, आज हिन्दी में भी शीर्ष पर है गजल’ गजल की समकालीन सोच की नुमाइंदगी करती है. आज की विद्रूपता को विराट् कैनवस देती यह गजल नयी पीढ़ी के लिये, उसके लेखन के लिए दिशा-सुविधा देती है. रजनी मोरवाल के प्रकृति रागी दोहे क्या खूब हैं. अन्तर्राष्ट्रीय अदबी जमीन की सुविख्यात शाइरा किश्वर नाहिद की गजलें प्रेरित करतीं हैं. कुछ ऐसा ही हर अंक में समाहित किया जाता रहे.

डॉ. मधुर नज्मी, मुहम्मदाबाद (उ.प्र.)

 

हमारी नैतिक जवाबदारी है

जुलाई की ‘‘प्राची’’ पत्रिका आज 4 जुलाई 2015 को दोपहर की डाक से पाकर आश्चर्यमिश्रित खुशी का ठिकाना नहीं रहा. जून की प्राची 05 जून को मिली थी, साधुवाद. अप्रैल की प्राची में प्रकाशित महावीर प्रसाद द्विवेदी का ‘‘जीवन रेखा’’ लेख पढ़कर आपके संपादन को फिर एक बार सैल्यूट करना बनता है. तकरीबन साढ़े सात पृष्ठ का लेख आचार्य के जीवन की एक खुली चिट्ठी है और उनका हिन्दी के लिए प्रेम इस लेख में स्पष्ट झलकता है. जुलाई 2015 में आचार्य भगवत दुबे की गजल नये कलेवर में सामने आई है. दिनोंदिन प्राची पाठकों के मन में पैठ बना रही है. किन्तु अप्रैल की प्राची के पृष्ठ 5 पर प्रकाशित आजीवन सदस्य संरक्षक सदस्य एवं नियमित सदस्यों से सदस्यता जारी रखने हेतु शुल्क का निवेदन पढ़कर मन में टीस पैदा हुई. ये लगा कि क्या ये हमारी नैतिक जवाबदारी नहीं है कि सदस्यता की समाप्ति से पूर्व हम नवीनीकरण करा लें. एक दो किस्से ऐसे भी सुनने में आये कि कुछ सदस्य पत्रिका बंद भी नहीं कर रहे है, और शुल्क भी नहीं अदा कर रहे. आखिरकार प्रकाशक ऐसा इकतरफा प्रेम कब तक निभायेगें. हो सकता इस में मेरा कोई भाई सजातीय भी हो पर नियम तो नियम ही है. हम ऐसा कोई भी कृत्य न करें कि प्रकाशक अप्रिय कदम उठाने के लिए मजबूर हों.

दिनेश नंदन तिवारी, जबलपुर

 

कहानी का समाधान अच्छा है

हिन्दी (देवनागरी) के अलावा और भी कई भाषाएं हैं जिनका साहित्य समृद्ध है. जिनके भाषायी नियम-कायदे हिंदी जैसे ही हैं और उनके पास उनमें साहित्य का विपुल भंडार भी है.

हर एक भाषा-भाषी को अपनी मातृभाषा पर गर्व होता है. चाहे जो हो, अपनी मातृभूमि की मिट्टी की सुगंध जैसी ही भाषायी सुगंध उनके हृदय पटल में गहरे कहीं खूब गहराई में छुपी रहती है. यही कारण है कि जब भी कभी ट्रेन में, बस में, विदेश में दो, एक भाषा-भाषी मिल जाते हैं तो अपनी भाषा में बतियाते अघाते नहीं हैं. आसपास का माहौल तब उनकी दृष्टि में नगण्य हो जाता है और वे अपनी भाषा की रसधार में डूबने-उतराने लगते हैं.

यह बतियाना उनके भाई-चारे, उनकी संस्कृति, उनके सामाजिक सरोकारों का परिचायक होता है. उन्हें विशेष संतुष्टि मिलती है. वे तब अपनी भाषा के प्रिय पात्र बनकर भाषायी स्वाभिमान से भर जाते हैं.

‘प्राची’ के जुलाई अंक में यह समाचार पढ़कर मुझे अच्छा लगा कि पत्रिका भविष्य में अपना कोई अंक सिंधी कथा साहित्य पर निकालना चाहती है. मैं पत्रिका की इस योजना का हृदय से स्वागत करता हूं. प्राची के संपादक राकेश भ्रमर एवं देवी नागरानीजी को इस प्रयोजना के लिए अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं.

सिंधी कथा साहित्य की यह विशिष्ट आयोजना हमें सिंधियों की जीवन चर्चा, रहन-सहन, सामाजिक व्यवहारों, कार्य प्रणालियों, शादी-विवाह जैसे रस्मोरिवाजों से परिचित कराएगी. उनकी कर्मठ जीवन-प्रणाली हमें भी कुछ सीखने के लिए प्रेरित करेगी.

मैं इस अवसर पर मराठी मूल की लेखिका उज्ज्वला केलकर का उल्लेख जरूर करना चाहूंगा जिन्होंने अभी एक दो वर्ष पहले हिंदी के लघुकथाकारों की लघुकथाओं का मराठी में अनुवाद कर ‘थेंब-थेंब सागर’ यानी बूंद-बूंद सागर का प्रकाशन कराया. भाई श्री जगदीश जोशीला ने भी निमाड़ी में लोक (बानी) बोली में लघुकथाओं का अनुवाद कर प्रकाशन कराया. उन्होंने ‘‘निमाड़ी में हिंदी की खास नानी वारता नऽ में 42 लघुकथाकारों को चयनित किया और चर्चित हुए.

मेरी नजर में ये भाषाएं बहिनें-बहिनें हैं और यह भाषायी एकता/कौमी एकता जैसी ही गौण है. हमारे युवा भी आजकल अलग-अलग धमरें में अपने शादी-ब्याह कर इसे और मजबूती प्रदान करते दिखाई देते हैं. जहां हमारा भाषायी प्रेम एक दूसरे के प्रति समर्पित रहेगा, तभी हमारा जातीय लगाव प्रगाढ़ होगा. यह लगाव ही एक दिन देश को मजबूती प्रदान करेगा. हममें भाई-चारा विकसित करेगा. कौमी एकता को मजबूत करेगा. इतने बड़े देश को एकजुट करने के लिए ऐसे सदूकार्य होते रहने चाहिए.

जयहिन्द!

डॉ. कुंवर प्रेमिल, जबलपुर (म.प्र.)

 

संघर्ष करना चाहिए

प्राची जुलाई 2015 अंक में प्रकाशित संपादकीय ‘‘क्या हम आजाद हैं’’ बहुत कुछ सोचने के लिए विवश कर देता है. अपनी आजादी पर प्रश्न चिन्ह हमेशा से लगता रहा है. इस विषय पर चर्चा भी कई बार कई जगह हो चुकी है. ‘‘गलती’’ कहानी कुछ दिनों के अंतराल के बाद पुनः पढ़ने का जी चाहेगा. ‘‘अलाव’’ भी एक अच्छी व मर्म को छूने वाली कहानी है.

केदारनाथ सविता, मीरजापुर (उ.प्र.)

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