बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

रचना समय अक्तूबर 2015 - संपादकीय

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यह अंक

सुरजीत पातर पंजाबी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। जीवन की पाठशाला में पैठकर कवित्त की प्रविधियों को रूप देने वाले सुरजीत पातर ने गीत-ग़ज़ल हो या छंदमुक्त काव्य, प्रतिबद्धता के बावजूद वैचारिकता के अतिरेक से अपने को दूर रखा। यही वजह है कि उनके लेखन में जीवन-सत्य दिखलाई पड़ता है जो पंजाब के जन-जीवन की ऊष्मा से अटा-पड़ा है। सुरजीत पातर सामान्य जन-जीवन की तह में जाकर उस सत्य को उद्घाटित करते हैं जो इंसान को निर्मित कर रहा है। वैज्ञानिक सोच और दृष्टि का ही प्रतिफल है कि सुरजीत पातर इंसान के अंदर बैठे इंसान को, उसके सुख-दुःख, दैन्य हताशा-निराशा, आशा और कुत्सित भाव को बहुत ही सहज ढंग से व्यक्त करते हैं जो निश्चय ही उस असमानता पर आधारित समाज व्यवस्था की देन है। सुरजीत पातर जातीय परम्परा के रचनाकार हैं जिनमें पंजाबी लोक-धारा की सलिला प्रवाहित है- यही वजह है कि उनमें गुरबानी और सूफ़ी कलाम की अनुगूँज दीखती है जो हमें सतत् जगाये रखती है...

बहरहाल ‘रचना समय’ का यह अंक सुरजीत पातर पर केन्द्रित है जिसमें हमें पंजाबी काव्य-परम्परा के रंग में रंगे कवि के उस सच को देखने को मिलेगा जिसके स्वप्न में इंसान की हदबंदी बेमानी है।

भले ही कहीं जा के हम बिंध जाएं

बहें हमारी काया से रक्त के फुहारे

भले ही कहीं जा के हम झुलस जाएँ

जलें अपने पंखों के टसरी किनारे

बस अब जाने दे तू

कहीं भी किधर भी

तेरी क़ैद से तो वो बेहतर ही होंगे

शिकारी निर्दई माँसखोरे कसाई

रिहाई

रिहाई

रिहाई

रिहाई

यह रिहाई रूसो की उस जंजीर को तोड़ती है जिसमें वह कहता है-

Man is born free but
everywhere he is in chains.

*

हम शीघ्र ही पंजाबी कविता के प्रमुख कवि सुखचैन मिस्त्री के कवित्त को प्रस्तुत करेंगे साथ ही उन कहानीकार को जिनके बिना पंजाबी साहित्य अधूरा है।

- हरि भटनागर

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