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प्राची - सितम्बर 2015 - आनन्द कुमार तिवारी की लघु कथा : निरर्थक पश्चाताप

निरर्थक पश्चाताप

आनन्द कुमार तिवारी

 

नीरज का चयन आइ.ए.एस. के लिए होने पर अति प्रसन्नता और श्रद्धापूर्वक उसने अपनी विमाता के चरणों में शीश झुकाकर आशीर्वाद की अपेक्षा की, किन्तु उन्होंने मुंह बिचकाकर अपने पैर पीछे खींच लिये. आशीर्वाद देने के लिए न तो उनके हाथ उठे और न ही मुंह से कोई शब्द ही निकले, यहां तक कि उनकी आंखें भी घृणा वृष्टि करती रहीं.

बूढ़े ससुर क्रोधित होकर बड़बड़ाए-‘‘बहु शरीर के सभी अंग भगवान का वरदान हैं, इनका सदुपयोग करो. न मालूम कब वे इन्हें वापस ले लें या इनकी कार्यक्षमता कम कर दें.’’

ससुर के उपदेशों का बहू पर न तो कोई प्रभाव पड़ा और न ही उसने अपना स्वभाव बदला.

समय बीतता रहा. एक दिन नीरज की विमाता को लकवा मार गया. नीरज ने उसका बहुत इलाज करवाया, परन्तु वह ठीक न हो सकीं.

अब नीरज की लकवा पीड़ित विमाता के न तो पैर हिलते हैं और न ही हाथ. चाह कर भी उनके मुंह से कोई शब्द नहीं निकलते हैं. सक्रिय हैं तो केवल उनकी आंखें जो स्वयं की विवशता पर पश्चाताप के आंसू बहाती रहतीं हैं, लेकिन यह पश्चाताप भी अब निरर्थक है, क्योंकि इसका कोई प्रायश्चित ही नहीं है.

संपर्कः तुलसीधाम, 36 चंचल कालोनी,

लक्ष्मीनगर के पास, पिपलानी,

भोपाल (म.प्र.)

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