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प्राची - सितम्बर 2015 - प्रभु चौधरी का आलेख : राष्ट्रभाषा हिन्दी आवश्यकता हमारी है

आलेख

राष्ट्रभाषा हिन्दी आवश्यकता हमारी है

डॉ. प्रभु चौधरी

डॉ. विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में सात सौ वर्षों से कायम हिन्दी नष्ट होने वाली नहीं है. हिन्दी वषरें से इस देश की सम्पर्क भाषा और धीरे-धीरे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपना स्थान सुनिश्चित कर रही है. सन् 1975 में नागपुर में हुए पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी को विदेशों में पहुंचाने की नींव रखी. हिन्दी मॉरीशस, ट्रिनीडाड तक पहुंच गई. अप्रवासी भारतीय एवं विदेशों में रहने वाले हिन्दी भाषियों के हिन्दी के प्रति गहन अवदान की वजह से हिन्दी आज विश्व भाषा बनने की तरफ अग्रसर है.

14-18 सितम्बर, 1999 में छठें विश्व हिन्दी सम्मेलन द्वारा हिन्दी लंदन पहुंच गयी. 1975 में नागपुर से शुरू की गई यात्रा में हिन्दी मॉरीशस, दिल्ली, ट्रिनीड्राड होते हुए लंदन पहुंची है. लंदन से सारे विश्व में हिन्दी को जाना है. कहने को यह यात्रा सहज नहीं रही है. आज हिन्दी को विश्व भाषा बनना है. अंग्रेजी का विकल्प बनना है. इसके लिए हिन्दी भाषा के साहित्य प्रचार-प्रसार में जुटे विद्वानों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाना पड़ेगा, तभी हिन्दी सहयोग, सहचर्य और स्नेह की भाषा है. इसीलिए आज वह मातृभाषा का दर्जा भी पा लेगी, क्योंकि हिन्दी बोलने वालों की संख्या विश्व में तीसरे स्थान पर है. पहला स्थान अंग्रेजी एवं दूसरी चीनी बोलने वालों का है. संयुक्त राष्ट्र संघ की अन्य भाषाएं हिन्दी की तुलना में काफी पीछे हैं क्योंकि हिन्दी का प्रसार विदेशों में भी काफी है. इसका कारण यह है कि भारतीय मूल के लाखों व्यक्ति विदेशों में रह रहे हैं.

आज विश्व में मॉरीशस, श्रीलंका, ट्रिनाड्राड, मलेशिया, गयाना, ट्रिनिड्राड टोकागों, बर्मा, फीजी, कैन्या, सूरीनाम, सिंगापुर, तंजानिया, आदि देशों में भारतीय मूल के लोग काफी रहे हैं और इन लोगों में प्रायः अधिकांश लोग उत्तर भारत के हैं, जो हिन्दी बोलते हैं. इसीलिए वे लोग वहां भी हिन्दी बोलते हैं. इससे वहां भी हिन्दी का प्रचार होता है. पूरे विश्व में इस समय लगभग 125 विश्वविद्यालयों एवं संस्थाओं में हिन्दी पढ़ने की व्यवस्था है. अतः हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ एवं अन्य स्थानों में प्रशासनिक भाषा बनाया जा सकता है. आज अमेरिका के 10 एवं जर्मनी के 6 विश्वविद्यालयों में हिन्दी साहित्य पर शोध कराने में खासी लोकप्रियता पाई है.

कनाडा में 5 और इंग्लैण्ड में 35 शिक्षक संस्थाओं में हिन्दी पढ़ने-पढ़ाने की सुविधा है. विश्व में हिन्दी में अनुवाद एवं प्रकाशन होता है. रूस में हिन्दी पुस्तकों का प्रकाशन होता है. इंग्लैण्ड में त्रैमासिक पत्रिका, ‘प्रवासिनी’ का प्रकाशन होता है. तात्पर्य यह है कि विदेशों में भी हिन्दी लोकप्रियता हासिल कर रही है, लेकिन दुःख तब होता है जब अपने ही देश में हिन्दी की जगह अंग्रेजी शासन करती रहती है.

भारत को आजादी मिले 68 वर्ष से अधिक हो चुके हैं, किन्तु हिन्दी मातृभाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा बनने के बाद भी परतंत्र है. हमारी गुलाम मानसिकता की वजह से हिन्दी अंग्रेजी का पूरा विकल्प नहीं पा रही है. स्वतंत्रता पूर्व हिन्दी राष्ट्रीय आंदोलन एवं जलसों तथा जन-जन की भाषा थी. तिलक, दयानंद सरस्वती, भारती, टंडन, रवीन्द्रनाथ, सुभाष, गांधीजी की भाषा थी. राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का भाव थी. हिन्दी ने ही रामेश्वर से अमरनाथ, द्वारिका से कामाख्या, कन्याकुमारी से कश्मीर तक देश को बांधे रखा था. आजादी के बाद वही हिन्दी दीन-हीन की भाषा बनकर रह गई, अंग्रेजी ऊपर हो गयी. हिन्दी तिरस्कृत एवं आहत होती रही, लेकिन शनैः-शनैः हिन्दी की ओर ध्यान उठने लगा और उसे पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए राजभाषा तथा राष्ट्रभाषा बनाया गया. ये सच है कि हिन्दी के साथ आज भी अंग्रेजी का प्रकाशन जारी है, किन्तु आज हिन्दी और विश्व में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली तीसरे नम्बर की भाषा बन सकी है. भारत के बाहर बसे लगभग 75 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं. भारत में 14 दिसम्बर 1949 को हिन्दी राजभाषा संविधान के अनुच्छेद 343 (1) में घोषित की गई है और 26 जनवरी 1950 से लागू हो गई, किन्तु भारत में हिन्दी अभी भी पूरी तरह अंग्रेजी को विस्थापित नहीं कर पाई है एवं आज भी हिन्दी संघर्षरत है. कहने को हिन्दी दिवस, मास, वर्ष मनाये जाते हैं, पर सब औपचारिकता भाव सिद्ध होते हैं. कहने को भारत में 520 दूरदर्शन केन्द्र एवं 180 आकाशवाणी केन्द्र हैं, पर उन पर भी अंग्रेजी हावी है. अतः राजभाषा हिन्दी आज भी अंग्रेजी का विकल्प नहीं बन पा रही है. विश्वभाषा की ओर अग्रसर हिन्दी अपने ही देश में स्वयं को प्रतिष्ठित करने हेतु युद्धरत है. स्थिति चाहे जो भी हो हिन्दी नष्ट होने वाली नहीं है, न ही अंग्रेजी के सामने कमजोर पड़ने वाली है. देर-सवेर हिन्दी ही अंग्रेजी का विकल्प और विश्वभाषा बनेगी.

हिन्दी आज विश्व में बहुतायत द्वारा बोली जाने वाली भाषा बन गयी है. फीजी एवं बर्मा में भी हिन्दी बोलने वाले काफी संख्या में हैं. नेपाल में 53 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते हैं. इसके अलावा अमेरिका, रूस, यूरोप, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका आदि देशों में भी भारतीय मूल के हिन्दी बोलने वाले काफी लोग हैं. वस्तुतः इन देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीयों की भाषा हिन्दी ही है. प्रवासी भारतीयों का दल 1843 ई. में मॉरीशस, 1860 में दक्षिण अफ्रीका, 1870 में गुयाना, 1873 में सूरीनाम, 1879 में फीजी एवं 1945 में त्रिनिड्राड गये. इनमें मुख्यतः बिहार एवं उत्तरप्रदेश के लोग थे, जो अवधी, खड़ी बोली एवं भोजपुरी बोलते हैं.

धीरे-धीरे हिन्दी में वहां के स्थानीय शब्दों का समावेश हो गया. फीजी में बोली जाने वाली हिन्दी को सरनामी हिन्दी या सरनामी कहा जाता है. इसी तरह दक्षिण अफ्रीका में हिन्दी नेता की कहलाती है. कुछ भी हो, है तो हिन्दी ही. फीजी में फीजी-हिन्दी का व्याकरण बन चुका है. फीजी-हिन्दी-अंग्रेजी-फीजी हिन्दी शब्दकोष है. इसके पूर्व भी 1645 ई. में डच में हिन्दी ग्रंथ ग्रामवाटिका लिखी गई थी. तात्पर्य यह है कि हिन्दी काफी पहले से विदेशों में भी बोली लिखी जाती रही है.

हिन्दी में अध्ययन एवं अध्यापन आज विश्व में लगभग सभी देशों में हो रहा है. साथ ही विश्व में अनेक देशों में हिन्दी भाषा में साहित्य भी लिखा जा रहा है. फीजी के कमलाप्रसाद मिश्र, मॉरीशस के अभिमन्यु अनन्त, सोमदत्त, बखोरी, सूरीनाम के मुंशी रहमान खान, सूर्यप्रसाद बोरे एवं स्वीडन के ओदफोन स्मेकल का हिन्दी साहित्य में सराहनीय योगदान रहा है. फीजी टाइम्स द्वारा निकलनेवाला शांतिदूत एवं हिन्दी पत्रकारिता का रूप उजागर करता है. फीजी में इसके अलावा अनेक भारतीय कवि, लेखकों के साहित्य का विश्व में अनेक भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है. इस तरह हिन्दी विश्व में प्रतिष्ठित बनने की दिशा में संघर्षरत हैं.

संपर्कः 15 स्टेशन मार्ग, महिदपुर रोड

जिला उज्जैन, (म.प्र.)

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