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प्राची - सितम्बर 2015 - श्रीलाल शुक्ल की टिप्पणी : इमेज का दुखियारा - भारतीय लेखक

इमेज का दुखियारा : भारतीय लेखक

श्रीलाल शुक्ल

भारतीय भाषाओं में जब साहित्यकार के संघर्षशील क्षणों या उसके गर्दिश के दिनों का प्रसंग आता है, तो वह प्रायः उसकी गरीबी या अभावों का प्रसंग होता है, अपने परिवेश से टकराने या रचना-प्रक्रिया के तनावों को झेलने का नहीं. संघर्षशील साहित्यकार की एक खास तस्वीर बन गयी है जिसमें वह कविता या कहानी या उपन्यास नहीं लिखता, वह साहित्य-सेवा या साहित्य-साधना करता है. गरीबी और अभाव की स्थिति उसके साहित्यिक कृतित्व को अतिरिक्त गरिमा देती जान पड़ती है. एक तरह से साहित्यकार के हक में गरीबी को एक साहित्यिक मूल्य मान लिया गया है.

साहित्यकार के प्रति स्वाभाविक सहानुभूति होने के बावजूद मुझे उसकी गरीबी का अनावश्यक गरिमा मंडन अप्रिय लगता रहा है. ‘वह तोड़ती पत्थर’ की नायिका और उसके रचयिता का अपना विशिष्ट महत्त्व मानते हुए भी मैं यह नहीं जान पाया हूं कि पत्थर तोड़ने वाली के आर्थिक संघर्ष से निराला का आर्थिक संघर्ष वस्तुतः भिन्न है या वह किसी अतिरिक्त चिंता का विषय है. बुनियादी तौर पर चिंतन का विषय अगर कोई है तो देानेां की जड़ में मौजूद वह व्यवस्था है जो शोषण के सिद्धांत पर पनप रही है.

वास्तव में भारत जैसे देश में गरीब या बेरोजगार होना बड़ी बात नहीं है. तभी जब कोई लेखनीधारी नागरिक अपनी विपन्नता के आत्मदयापूर्ण विवरण पेश करता है तो मुझे लगता है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से उन सबका अपमान कर रहा है जो उससे भी कड़े अभावों को झेल रहे हैं पर उसकी तरह आत्म-प्रकाशन नहीं कर पा रहा है.

(‘यह प्यार मेरा नहीं’ में संकलित ‘अपने बारे में’ शीर्षक टिप्पणी से साभार)

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साहित्यिक समाचार

 

काव्य गोष्ठी

मीरजापुरः 21(जून 2015) योग दिवस पर सायं शवपुरी कालोनी, (स्टेशन रोड) में लालव्रत सिंह सुगम के आवास पर काव्य गोष्ठी सम्पन्न हुई, जिसकी अध्यक्ष्ता प्रभुनारायन श्रीवास्तव ने और संचालन सुरेश चंद्र वर्मा विनीत ने किया.

आरम्भ में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की महत्ता पर वक्ताओं ने प्रकाश डाला. फिर गणेश गम्भीर, केदारनाथ सविता, भोलानाथ कुशवाहा, प्रमोद कमार सुमन, भानु कुमार मुंतजिर, शुभम् श्रीवास्तव, प्रमोद चंद्र गुप्त, श्याम अचल, पूनम केशरी आदि ने अपनी सुंदर कविताओं का पाठ किया. इस अवसर पर आनन्द केशरी, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, पीयूष दत्त सिंह, अमरनाथ सिंह आदि उपस्थित रहे.

मीरजापुरः 27 जून 2015 वासलीगंज स्थित भानु कुमार मुंतजिर के आवास पर सायं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया. इसकी अध्यक्षता प्रभुनारायण श्रीवास्तव ने और संचालन शुभम् श्रीवास्तव ने किया. गोष्ठी में केदारनाथ सविता, भोलानाथ कुशवाहा, आनन्द संधिदूत, गणेश गम्भीर, प्रमोद कुमार सुमन, भानु कुमार मुंतजिर आदि ने अपनी एक से बढ़ कर एक कविताओं को प्रस्तुत किया. गोष्ठी में भोलानाथ कुशवाहा के तीन काव्य-संग्रहों की चर्चा हुई. प्रमोद कुमार सुमन और केदारनाथ सविता के काव्य संग्रह भी इस वर्ष प्रकाशित होने जा रहे हैं. दोनों काव्य-संग्रहों की चुनिंदा रचनाओं का पाठ किया गया.

प्रस्तुतिः केदारनाथ सविता, मीरजापुर

राजस्थान का प्रथम ‘‘सम्पूर्ण सुकन्या समृद्धि योजनाग्राम’’ बना झुन्झूनू का बाय गांव

नवलगढ़ः आज का दौर बेटियों का है. बेटियां समाज में नित नये मुकाम हासिल कर रही हैं. बेटियों की समृद्धि और खुशहाली में ही समाज का भविष्य टिका हुआ है. इसीलिए बेटियों की उच्च शिक्षा और उनके विवाह में सुविधा के लिए 10 वर्ष तक की बेटियों हेतु डाकघरों में सुकन्या समृद्धि योजना आरंभ की गयी है. उक्त उद्गार राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने झुंझुनू के नवलगढ स्थित बाय गांव में सुकन्या समृद्धि योजना के लिये 7 अगस्त को आयोजित मेले में व्यक्त किये.

मुख्य अतिथि के रूप में अपने सारगर्भित सम्बोधन में राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने ‘‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’’ के अंतर्गत बालिकाओं के राष्ट्र निर्माण पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि सुकन्या समृद्धि योजना सिर्फ निवेश का एक माध्यम नहीं है, बल्कि यह बालिकाओं के उज्ज्वल व समृद्ध भविष्य से भी जुडा हुआ है. इस योजना के आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक आयाम महत्वपूर्ण हैं. इसमें जमा धनराशि पूर्णतया बेटियों के लिए ही होगी, जो उनकी शिक्षा, कैरियर एवं विवाह में उपयोगी होगी. श्री यादव ने कहा कि 21वीं सदी में बेटियों की भूमिका अहम् हो गई हैं और सुकन्या समृद्धि योजना बेटियों के सपनों को पूरा करने का सशक्त माध्यम है. उन्होंने कहा कि हर बेटी को उसके जन्म पर अभिभावकों द्वारा सुकन्या समृद्धि खाता उपहार स्वरूप देकर नई परम्परा का सूत्रपात करना चाहिये.

इस अवसर पर झुन्झूनू मण्डल के अधीक्षक डाकघर श्री के.एल. सैनी ने कहा कि यह स्कीम 10 साल तक की बच्चियों के लिए है. इसमें एक वित्तीय वर्ष में न्यूनतम 1000 और अधिकतम डेढ़ लाख रुपये तक जमा किये जा सकते हैं. इस योजना में खाता खोलने से मात्र 14 वर्ष तक धन जमा कराना होगा. ब्याज दर 9.2 प्रतिशत है और जमा धन राशि में आयकर छूट का भी प्रावधान है.

कार्यक्रम की विशिष्ठ अतिथि श्रीमती तारापूनिया, सरपंच बाय ग्राम पंचायत ने इस योजना की भूरि-भूरि प्रशंसा कर लोकप्रिय एवं कल्याणकारी योजना बताया तथा कहा कि बालिकाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में उठाया गया यह प्रयास एक मील का पत्थर साबित होगा. उन्होंने कहा कि यह अत्यन्त ही सौभाग्य की बात है कि इस गांव की 10 वर्ष तक की समस्त योग्य बालिकाओं के सुकन्या खाते खोलकर, उनका गांव राजस्थान का प्रथम ‘‘सम्पूर्ण सुकन्या समृद्धि योजना ग्राम’’ बन गया है.

इस दौरान बाय गांव की समस्त कुल 215 बालिकाओं के खाते खोले गये. इसके बाद झुंझुनू का बाय गांव राजस्थान का प्रथम सम्पूर्ण सुकन्या समृद्धि योजना गांव बन गया है. उपस्थित बच्चियों व उनके अभिवावकों को निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने पास बुकें व उपहार देकर उनके सुखी व समृद्ध भविष्य की कामना की. इस अवसर पर डाक निदेशक के. के. यादव ने सरपंच श्रीमती तारापूनिया के प्रयासों की सराहना की और आशा व्यक्त की कि बेटियों के लिए ऐसे प्रयास अन्य गांवों में भी किये जायेंगे. श्री यादव ने श्रीमती पूनिया को स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित भी किया.

स्वागत संभाषण झुन्झूनू मण्डल के अधीक्षक डाकघर श्री के.एल. सैनी द्वारा, आभार ज्ञापन सहायक अधीक्षक डाकघर श्री जी. एन. कनवाडिया द्वारा एवं कार्यक्रम का संचालन श्री एस. के. पोरवाल द्वारा किया गया. इस अवसर पर क्षेत्रीय कार्यालय जोधपुर के सहायक अधीक्षक पुखराज राठौड़, निरीक्षक डाक राजेन्द्र सिंह भाटी, नवलगढ़ उपमंडल के निरीक्षक आर. पी. कुमावत, श्री अनिल मीणा, ग्रामीण डाक सेवक शाखा डाकपाल बाय तथा डाक विभाग के तमाम अधिकारी-कर्मचारियों के साथ स्कूली बच्चे और उनके अभिभावक व अध्यापक भी शामिल हुए.

प्रस्तुतिः के. एल. सैनी, झुंझनू (राज.)

आचार्य रत्नलाल विज्ञानुग स्मृति अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता के अन्तर्गत ‘शब्द निष्ठा सम्मान’ के विजेता

प्रथम ग्यारह समूह-प्रत्येक को रु. 5000/- मानदेय व एतदर्थ प्रकाशित पुस्तक की 10 प्रतियां.

1. हैदराबाद के श्री विजय कुमार सम्पत्ति की कहानी- ‘अमृत वृद्धाश्रम’, 2. पटना के श्री अशोक कुमार प्रजापति की कहानी- ‘अपने-अपने स्वर्ग’ 3. पिलानी (राजस्थान) की श्रीमती वंदना शुक्ला की कहानी- ‘सहर होगी किसी स्याह रात के बाद’ 4. जयपुर के श्री हरदान हर्ष की कहानी- ‘पिघलते हिमखण्ड’ 5. नोहर (राजस्थान) की श्रीमती कीर्ति शर्मा की कहानी- ‘जौहरा आपा’ 6. नरसिंहपुर (म.प्र.) के राकेश माहेश्वरी की कहानी- ‘मुस्कान की करवटें’ 7. इन्दौर की डॉ. प्रेम कुमार नाहटा की कहानी- ‘अप्रासंगिक’ 8. लखनऊ की डॉ. अमिता दुबे की कहानी -‘लड़खड़ाते कदम’ 9. पुणे के श्री राजेन्द्र श्रीवास्तव की कहानी- ‘पूरी लिखी जा चुकी कविता’ 10. धार (म.प्र.) के श्री निसार अहमद की कहानी- ‘धुंधली यादें और सिसकते जख्म’ 11. जयपुर के श्री रत्न कुमार सांभरिया की कहानी-‘हिरणी’

द्वितीय समूहः प्रथम ग्यारह समूह की बेहतरीन कहानियों के करीबीः-

1. पंतनगर (उत्तराखंड) की श्रीमती किरण अग्रवाल की कहानी- ‘न हन्यते’ 2. मुंबई के श्री इश्तियाक सईद की कहानी- ‘फिरंगी’ 3. लालमादड़ी (राजस्थान) के श्री माधव नागदा की कहानी- ‘आत्मवत् सर्वभूतेशु’ 4. नई दिल्ली के श्री रणीराम गढ़वाली की कहानी- ‘घरबैंस’ 5. अहमदाबाद की श्रीमती नीलम कुलश्रेष्ठ की कहानी- ‘फतह’ 6. दिल्ली के श्री विवेक मिश्र की कहानी- ‘और गिलहरियां बैठ गईं’ 7. लखनऊ की श्रीमती अलका प्रमोद की कहानी- ‘सच क्या था’ 8. जयपुर के श्री भगवान अटलानी की कहानी- ‘हत्या’ 9. बीकानेर (राजस्थान) के श्री हरदर्शन सहगल की कहानी- ‘लुटे हुए दिन’ 10. पटना की श्रीमती विद्या लाल की कहानी- ‘बिगड़ैल लड़की’ 11. अलवर (राजस्थान) की श्रीमती राजश्री अग्रवाल की कहानी- ‘स्रावित मूल’ 12. भिलाई के श्री परदेशी लाल वर्मा की कहानी- ‘पकड़’

तृतीय समूहः उल्लेखनीय कहानियां-

1. जबलपुर के श्री राकेश भ्रमर की कहानी- ‘पटाक्षेप’ 2. भरतपुर (राजस्थान) के श्री अशोक सक्सेना की कहानी- ‘दस्तूरी’ 3. रावतभाटा (राजस्थान) के श्री श्याम कुमार पोकरा की कहानी- ‘भ्रूण हत्या’ 4. जयपुर की डॉ. रीता सोलंकी की कहानी- ‘अपराजिता’ 5. शिमला के श्री सुदर्शन वशिष्ठ की कहानी- ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि’ 6. छिन्दवाणा (म.प्र.) के श्री देवेन्द्र कुमार मिश्रा की कहानी- ‘गुमशुदगी’ 7. गाजियाबाद (उ.प्र.) के श्री मनीष कुमार सिंह की कहानी- ‘अतीतजीवी’ 8. जयपुर की श्रीमती नीलिमा टिक्कू की कहानी- ‘मिट्टी की खुशबू’ 9. पलवल (हरियाणा) के डॉ. धर्मचन्द्र विद्यालंकार की कहानी- ‘इक बंध चलै जंजीर’ 10. रायपुर (छ.ग.) की श्रीमती उर्मिला शुक्ला की कहानी- ‘फूल गोदान के’ 11. जयपुर के श्री संदीप माली की कहानी- ‘दूजी मीरा’ 12. जयपुर की डॉ. आशा शर्मा की कहानी- ‘पहचान’ 13. जयपुर की श्रीमती कमलेश माथुर की कहानी- ‘एक पल ठिठका हुआ.’ 14. गुडगांव (हरियाणा) के श्री मुकेश शर्मा की कहानी- ‘नेकी कर, दरिया में मत डाल’ 15. उज्जैन (म. प्र.) के डॉ. राम सिंह यादव की कहानी- ‘मनीषा नहीं, रेखा हूं’ 16. वाराणसी (उ. प्र.) के डॉ. अभिताभ शंकर राय चौधरी की कहानी- ‘कोसी सतलज एक्सप्रेस’ 17. बहराइच (उ. प्र.) के श्री राजेश मलिक की कहानी- ‘गांधी के आंसू’ 18. दौसा (राजस्थान) के श्री अंजीव अंजुम की कहानी- ‘अस्थि कलश’ 19. जयपुर के श्री हरिशंकर शर्मा की कहानी- ‘एक अधूरा सफर’ 20. सोहागपुर (म. प्र.) के डॉ. गोपाल नारायण आप्टे की कहानी- ‘बुद्ध रिपोर्ट’ 21. अमरावती (महाराष्ट्र) के श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’ की कहानी- ‘सांप’ 22. जोधपुर (राजस्थान) के श्री मुरलीधर वैष्णव की कहानी- ‘तीसरा वज्रपात’ 23. मंडी (हि. प्र.) के श्री मुरारी शर्मा की कहानी- ‘ढोल नगाड़ा’ 24. लखनऊ के श्री नवनीत मिश्र की कहानी- ‘झूठी सच्ची हथेलियां’ 25. यमुनानगर के श्री ब्रह्मदत्त शर्मा की कहानी- ‘अपना अपना डर’ 26. जोधपुर के श्री कन्हैयालाल देव की कहानी- ‘दामिनी’ 27. अजमेर की डॉ. शमा खान की कहानी- ‘कान्हा’ 28. जोधपुर की डॉ. जेबा रशीद की कहानी- ‘चिड़िया एक मां’.

उक्त तीनों समूहों के सभी 51 कथाकारों को एक-एक श्रेष्ठ कथा शिल्पी का प्रमाण-पत्र व सभी 84 प्रतिभागियों को पुस्तक दीपावली से पूर्व रजिस्टर्ड डाक से प्रेषित कर दी जाएगी.

प्रस्तुतिः- डॉ. अखिलेश पालरिया, सरवाड़ (राज.)

 

 

डाककर्मी के पुत्र मुंशी प्रेमचंद ने लिखी साहित्य की नई इबारत-डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव

जोधपुरः हिन्दी साहित्य के इतिहास में उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी पहचान बना चुके मुंशी प्रेमचंद के पिता अजायब राय श्रीवास्तव डाकमुंशी के रूप में कार्य करते थे. ऐसे में प्रेमचंद का डाक-परिवार से अटूट सम्बन्ध था. पोस्टमास्टर जनरल कार्यालय में प्रेमचंद की जयंती पर आयोजित एक समारोह में उक्त उद्गार राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं और हिंदी साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने व्यक्त किये. डाक निदेशक श्री यादव ने कहा कि डाककर्मी के पुत्र मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य की नई इबारत लिखी. जब प्रेमचंद के पिता गोरखपुर में डाक मुंशी के पद पर कार्य कर रहे थे, उसी समय गोरखपुर में रहते हुए ही उन्होंने अपनी पहली रचना लिखी.

निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि प्रेमचंद से पहले हिंदी साहित्य राजा-रानी के किस्सों, रहस्य-रोमांच में उलझा हुआ था. प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के

धरातल पर उतारा. प्रेमचन्द के साहित्यिक और सामाजिक विमर्श आज भूमंडलीकरण के दौर में भी उतने ही प्रासंगिक हैं और उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज में कहीं न कहीं जिन्दा हैं. प्रेमचन्द जब अपनी रचनाओं में समाज के उपेक्षित व शो-िात वर्ग को प्रतिनिधित्व देते हैं तो निश्चिततः इस माध्यम से वे एक युद्ध लड़ते हैं और गहरी नींद सोये इस वर्ग को जगाने का उपक्रम करते हैं. उनका साहित्य शाश्वत है और यथार्थ के करीब रहकर वह समय से होड़ लेता नजर आता है.

श्री यादव ने कहा कि प्रेमचन्द ने अपने को किसी वाद से जोड़ने की बजाय तत्कालीन समाज में व्याप्त ज्वलंत मुद्दों से जोड़ा. राष्ट्र आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है जिन्हें प्रेमचन्द ने काफी पहले रेखांकित कर दिया था, चाहं वह जातिवाद या साम्प्रदायिकता का जहर हो, चाहे कर्ज की गिरफ्त में आकर आत्महत्या करता किसान हो, चाहे नारी की पीड़ा हो, चाहे शोषण और समाजिक भेद-भाव हो. कृष्ण कुमार यादव ने जोर देकर कहा कि आज प्रेमचन्द की प्रासंगिकता इसलिये और भी बढ़ जाती है कि आधुनिक साहित्य के स्थापित नारी-विमर्श एवं दलित-विमर्श जैसे तकिया-कलामों के बाद भी अन्ततः लोग इनके सूत्र किसी न किसी रूप में प्रेमचन्द की रचनाओं में ढूंढ़ते नजर आते हैं.

इस दौरान डाक विभाग के तमाम अधिकारीगण, कर्मचारी, साहित्यकार मौजूद थे.

प्रस्तुतिः तरुण कुमार शर्मा, जोधपुर

प्रेमचंद जयंती पर बृज मोहन का एकल कथा पाठ

झांसीः मुंशी प्रेमचंद की 135वीं जयंती पर बुन्देलखण्ड साहित्य कला अकादमी ने वरिष्ठ साहित्यकार वल्लभ सिद्धार्थ के मुख्य आतिथ्य तथा वरिष्ठ कवि डॉ. रामशंकर भारती की अध्यक्षता में एकल कथा पाठ का आयोजन किया. जिसमें सुपरिचित कथाकार बृज मोहन ने कहानी ‘चंगुल में तीमारदार’ का पाठ किया. मुख्य अतिथि वल्लभ सिद्धार्थ ने कहा कि प्रेमचंद के बाद कहानी में विषय की विविधता तथा दृष्टि का विकास तो भरपूर हुआ, किंतु किस्सागोई निरन्तर गायब होती गई. खासतौर से इधर एक ढर्रे की कथाएं निजी प्रतिबद्धता से लिखी जाने लगी हैं. चिंता की बात यह है कि इनमें हाशिये पर खड़ा आदमी कहीं दिखाई नहीं देता. इस मामले में बृज मोहन की कथा का पात्र और तानाबाना हमें आश्वस्त करता है. श्री सिद्धार्थ ने कथा में भाषा-शिल्प तथा संप्रेषण को दुरुस्त बताते हुये कहा-कि कथा कल्पना या फन्तासी के भ्रम से पाठकों को दूर ले जाती है. उन्होंने यह भी कहा कि प्रेमचंद का समय लौटकर नहीं आयेगा, किन्तु वैसी किस्सागोई अवश्य आ सकती है, बशर्ते कथाकार अपने दृष्टिकोण कोे हाशिये से ओझल पात्रों पर केन्द्रित कर लें. ऐसे पात्र शहर, गांव और महानगरों में बिखरे पड़े हैं. चर्चा में वरिष्ठ कथाकार अशोक पाण्डेय, प्रसन्नकुमार नायक, ब्रह्मादीन ‘बन्धु’, साकेत सुमन चतुर्वेदी, अजयकुमार दुबे आदि ने भाग लिया. प्रतिभागी रचनाकारों ने कहानी की बहुकोणीय जांच-परख करते हुये आमन्त्रित कथाकार को सुझाव भी दिये. कथा पर उठाये गये प्रश्नों तथा सुझावों को लेकर कथाकार ने अपना पक्ष स्पष्ट किया. संस्था की ओर से अतिथि कथाकार बृज मोहन को मुंशी प्रेमचंद सम्मान से अलंकृत किया गया. इस अवसर पर संस्था ने मुख्य अतिथि व अध्यक्ष को भी शॉल एवं स्मृतिचिन्ह्व भेंट कर सम्मानित किया.

इसके पूर्व अतिथियों ने दीप प्रज्जवलित कर मुंशी प्रेमचंद के चित्र पर माल्यार्पण किया. संस्था अध्यक्ष कवयित्री कुन्ती हरीराम ने अतिथियों का स्वागत किया तथा कार्यक्रम के औचित्य पर पत्रकार वाई. के. शर्मा ने संक्षिप्त प्रकाश डाला. अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. रामशंकर भारती ने कहा कि गोष्ठी में प्रस्तुत कथा मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘मंत्र’ के डॉ. चषा के निर्मम बर्ताव की याद दिलाती है. प्रेमचंद व बृज मोहन की कथा में वर्णित पात्र गांव से ही आते हैं. दोनों में चिकित्सा पेशे की अमानवीयता उपस्थित है. इन अर्थों में यह आयोजन सार्थक परिणति तक पहुंचता है. गोष्ठी में प्रख्यात चित्रकार कामिनी बघेल, जनकवि नाथूराम साहू ‘कक्का’, सलीम शेख, अलख प्रकाश साहू, अंकित अग्रवाल आदि उपस्थित थे. कार्यक्रम का संचालन दायित्व प्रेमकुमार गौतम ने निर्वाह किया. आभार ज्ञापन संस्था के सचिव एस.पी. सिंह ‘सत्यार्थी’ ने किया।

प्रस्तुतिः प्रेमकुमार गौतम (झांसी)

वरिष्ठ कवि मनोज शुक्ल मनोज का सुयश

कनाडाः कनाडा के टोरेन्टो शहर में विगत दिनों विश्व हिन्दी संस्थान के तत्वाधान में अन्तर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका प्रयास के प्रधान संपादक वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. सर सरन घई जी के 65वें जन्म दिवस एवं सेवानिवृत्ति पर रिद्धि-सिद्धि मंदिर में एक भव्य कार्यक्रम के अंतर्गत कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया. काव्य पाठ में बॉलीवुड के श्री संदीप नागपाल बाम्बे, मनोज शुक्ल ‘मनोज’ जबलपुर (म. प्र.) सरन घई, भारतेन्दु, देवेन्द्र मिश्र, कैलाश भटनागर असर अकबर कुरैशी इलाहाबादी, सविता अग्रवाल, भगवत शरण

अध्यक्ष हिन्दी साहित्य सभा, कुलदीप, सुधा मिश्र, राजेश माहेश्वरी, निर्मल लाल, सुरेन्द्र पाठक, अजय पराशर गौड़, मीना चोपड़ा सरोजनी जौहर राजकुमारी शर्मा आदि ने भाग लिया

साहनी को बड़े परिदृश्य में देखने की जरूरत : कल्पना

नई दिल्लीः पिता जी को बड़े परिदृश्य में देखने की जरूरत है. भले ही हम अपने माता-पिता को उस समय नहीं समझ पाए हों. लेकिन, जब उन्हें व्यापक नजरिये से देखा तो पाया कि उनकी सोच में सादगी थी. उनकी सोच में आम आदमी के प्रति गहरा लगाव भी था. यह उनकी रचनाओं में भी देखने को मिलता है.

भीष्म साहनी शतवार्षिकी समारोह के दूसरे दिन यह बातें उनकी पुत्री कल्पना साहनी ने कहीं. वह रविवार को साहित्य अकादमी में पहले सत्र के विष्य ‘भीष्म साहनी : यादों के झरोखे से ’ में अपनी यादों को साझा कर रही थीं. कल्पना साहनी ने उनके जीवन से जुड़े दुर्लभ चित्रों के साथ स्मृतियों को भी साझा किया. जबकि उनकी भतीजी हर्षी आनंद ने भीष्म साहनी की एक चिट्ठी को पढ़कर सुनाया.

हर्षी आनंद ने बताया कि इसमें भीष्म साहनी ने अपनी एक रचना का उनके द्वारा विरोध करने पर अपनी सफाई पेश की थी. यह बहुत ही मार्मिक थी और साथ ही उनकी रचना प्रक्रिया को भी रेखांकित करती थी. कार्यक्रम के दूसरे सत्र में विषय ‘नई कहानी-आंदोलन और भीष्म साहनी’ था. इसकी अध्यक्षता प्रो. नित्यानंद तिवारी ने की और अब्दुल बिस्मिल्लाह, रविभूषण और अजय तिवारी ने अपने-अपने आलेख पढ़े.

कई कहानियों का किया जिक्र

सत्र को संबोधित करते हुए प्रो. नित्यानंद तिवारी ने भीष्म साहनी की कई कहानियों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि उनकी कहानियों में इतिहास को देखते हुए वर्तमान में आगे जाने के रास्ते दिखते हैं. भीष्म जी जैसे बहुत कम रचनाकार देखने को मिलते हैं. तीसरे सत्र का विषय ‘भीष्म साहनी के उपन्यासः सांप्रदायिकता, विभाजन और रूढ़ियों का प्रतिरोध’ था. इसमें असगर वजाहत, प्रो. गोपेश्वर सिंह और रवींद्र त्रिपाठी ने विचार रखे. असगर वजाहत ने भीष्म साहनी के लेखन की चर्चा करते हुए कहा कि साहनी ने प्रगतिशील लेखक संघ की चुनौतियों को स्वीकार किया.

नाटकों का मंचन भी

जबकि रवींद्र त्रिपाठी ने भीष्म साहनी के लेखन के विभिन्न आयामों पर आलेख पढ़ा. रविवार को भीष्म साहनी के उपन्यास लीला नंदलाल की और सोमवार को चीफ की दावत एवं अन्य कहानियों का मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सभागार में किया जाएगा.

जन्म शतवार्षिकी समारोह के अंतिम दिन चार सत्र में संगोष्ठी का आयोजन किया. इसके विषय थे- भीष्म साहनीः नाटक, रंगमंच और फिल्म, प्रगतिशील आंदोलन और भीष्म साहनी और भारतीय भाषाओं में भीष्म साहनी. पहले सत्र में प्रख्यात फिल्मकार गोविंद निहलानी, देवेन्द्र राज अंकुर और नरेंद्र मोहन के अलावा कुछ अन्य शख्सियतों ने भी शिरकत की.

प्रस्तुतिः किरण वर्मा

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