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प्राची - सितम्बर 2015 - सूर्यकांत नागर की लघुकथा - लघुता

लघुता

सूर्यकांत नागर

मैं समय बिताने के लिए पड़ोसी खन्ना साहब के यहां बैठा था. तभी उनका बेटा विमल स्कूल से लौटा.

‘‘कैसा रहा तुम्हारा पर्चा?’’ खन्ना साहब ने पूछा.

‘‘पापा, अच्छा रहा.’’ बेटे ने कहा. उसकी खुशी समा नहीं रही थी.

‘‘पापा, आज एक मजेदार घटना हुई. हमारे सर जब पेपर के बंडल लेकर जा रहे थे तो उनमें से एक पेपर खिसककर फर्श पर गिर पड़ा. सर को पता ही नहीं चला. मैं उनके पीछे-पीछे जा रहा था. मैंने पर्चा उठाकर देखा तो वह हमारी कल होनेवाली परीक्षा का पर्चा था. मैं कुछ क्षण के लिए ठिठका-सा खड़ा रहा, फिर दौड़कर मास्टरजी के पास गया, कहा, ‘‘सर, यह पर्चा यहां गिर पड़ा था.’’

‘‘पर्चा देखकर सर घबरा से गए. ‘तुमने इसे पढ़ा तो नहीं?’ उन्होंने पूछा. ‘नहीं, बिलकुल नहीं.’ मैंने कहा तो उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई और चल दिए.’’ कहते हुए विमल एक बार फिर प्रसन्नता से भर आया. मगर मैंने देखा, खन्ना जी के चेहरे का रंग बदल गया है. अफसोस की रेखा उनके चेहरे पर खिंच गई, जैसे कोई सुनहरा अवसर विमल के हाथ से छूट गया. ‘‘बूद्धू है,’’ वे बुदबुदाए.

‘‘हां, सचमुच बुद्ध है. बच्चा था इसलिए खुद अपनी आंखों में धूल झोंक ली. बड़ा होता तो टीचर की आंखों में धूल झोंक आता.’’ मैंने कहा.

सम्पर्कः 81, बैराठी कॉलोनी नं. 2, इन्दौर-14 (म.प्र.)

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