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प्राची - सितम्बर 2015 - भावना शुक्ल का आलेख : हिन्दी में राष्ट्रीय चेतना का स्वर

आलेख

हिन्दी में राष्ट्रीय चेतना का स्वर

डॉ. भावना शुक्ल

वैदिक काल से ही राष्ट्र शब्द का प्रयोग होता रहा है. राष्ट्र की परिभाषायें समय-समय पर बदलती रही हैं. किन्तु राष्ट्र और राष्ट्रीयता का भाव गुलामी के दौरान अधिक पनपा. जो साहित्य के माध्यम से हमारे समक्ष आया जिसके द्वारा राष्ट्रीय चेतना का संचार हुआ.

साहित्य का मनुष्य से शाश्वत संबंध है. साहित्य सामुदायिक विकास में सहायक होता है और सामुदायिक भावना राष्ट्रीय चेतना का अंग है. समाज का राष्ट्र से बहुत गहरा और सीधा संबंध है. संस्कारित समाज की अपनी एक विशिष्ट जीवन शैली होती है. जिसका संबंध सीधा राष्ट्र से होता है जो इस रूप में सीधे समाज को प्रभावित करती है. कवियों ने राष्ट्र जागृत करने के लिये, सोये हुये राष्ट्र को अपनी कविताओं के माध्यम से संघर्ष के लिये प्रेरित किया. भक्त कवियों ने अपने अंतःकरण में बह रही राष्ट्रीय चेतना की धारा से सुप्त और निरासित समाज को नयी दिशा दी.

भक्तिकाल के कवि कबीरदासजी ने निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना का आदर्श प्रस्तुत किया और इसी के माध्यम से राष्ट्रीय गरिमा में नवजीवन का संचार कर राष्ट्र को नई दिशा दी. महान राष्ट्रवादी कवि कबीर ने राम और रहीम को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया. तुलसीदासजी राष्ट्रभक्त संत थे इन्होंने राम के समन्वयी लोकरंजक स्वरूप को स्थापित कर सांस्कृतिक एकता को शक्ति प्रदान की. सूरदास जी ने आध्यात्मिक चेतना का संचार कृष्ण की विविधता के माध्यम से किया और समाज के सत्कर्म की प्रेरणा दी.

कविवर भूषण के राष्ट्रवादी स्वरों की झंकार ने लोक चेतना में हलचल उत्पन्न कर दी.

1857 से लेकर जो मुक्ति संग्राम चला, उसमें कवियों और शायरों ने अपनी कविताओं, गीतों और गजलों के माध्यम से राष्ट्र को जागृति का संदेश दिया.

स्वतंत्रता संग्राम की धूम, देश में मच रही हलचल ने कवियों को राष्ट्रवादी काव्य की गंगा बहाने के लिये प्रेरित किया. स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा के लिए कवि व साहित्यकार राष्ट्रीय भावों के द्वारा राष्ट्रीय चेतना का संचार कर रहे थे.

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभ से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक राष्ट्रीय भावधारा लिये हुये कविताओं के गर्भ में राष्ट्रीय चेतना का विकास होता रहा. 1857 में पहला अखबार निकला ‘पयामे आजादी’.

आधुनिक काल में भारतेन्दु हरिशचन्द्र ने अपनी लेखनी के जादू से भारत दुर्दशा का चित्रंकन कर समाज को जागृति का संदेश दिया है. इसी प्रकार प्रेमधन की अरुणोदय, देशदशा,

राधाकृष्णदास की भारत की बाहरमासा के साथ राजनीतिक चेतना की धार तेज हुई. द्विवेदी युग में कविवर ‘शंकर’ ने शंकर सरोज, शंकर सर्वस्व, गर्भरण्डारहस्य के अन्तर्गत बलिदान गान में प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा’ के द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये क्रांति एवं आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा दी. ‘बज्रनाद से व्योम जगा दे देव और कुछ लगा दे’ के ओजस्वी हुंकार द्वारा भारत भारतकार, मैथिलीशरण गुप्त के द्वारा पहला राष्ट्रवादी स्वर उठा. गुप्तजी की भारतभारती पढ़कर भारत के सैकड़ों नौजवानों में राष्ट्रीय चेतना का संचार हुआ और वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े उन्होंने अंग्रेजों की दमनात्मक कार्यवाही का मुकाबला किया और जेल यात्रायें सही.

‘‘हम मौन थे क्या हो गये,

और क्या होंगे अभी

आओ विचारें बैठकर

ये समस्यायें सभी.’’

छायावादी कवियों ने राष्ट्रीयता के रागात्मक स्वरूप को ही प्रमुखता दी और उसी की परिधि में अतीत के सुंदर और प्रेरणादायी राष्ट्रवादी, मधुरगीतों व कविताओं की रचना की. निराला की ‘वर दे वीणा वादिनी’, भारती जय विजय करे, जागो फिर एक बार, शिवाजी का पत्र, प्रसाद की ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा.’ चन्द्रगुप्त नाटक में आया, ‘हिमाद्रि तुंग-श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ आदि कविताओं में कवियों में राष्ट्रीयता की भावना की प्रशस्त अभिव्यक्ति दी है.

राष्ट्रीय काव्यधारा के प्रणेता माखन लाल चतुर्वेदी ने अपने काव्य हिमकिरीटनी, हिमतरंगिनी, माता युगचरण, समर्पण, काव्य कृत्तियों की रस की धारा से राष्ट्रीयता का भाव जागृत किया. चतुर्वेदी जी ने भारत को पूर्ण स्वतंत्रतकर जनतंत्रात्मक की पद्धति की स्थापना का संकल्प किया. इनकी कविता से संघर्ष की प्रबल प्रेरणा मिलती है. जेल की हथकड़ी उनके जीवन को अलंकृत करती है.

‘क्या? देख न सकती जंजीरों का गहना

हथकड़ियां क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना

(कैदी और कोकिला)

स्वाधीनता के प्रति समर्पण भाव ने इनके जीवन को एक राष्ट्रीय सांचे में ढाल दिया.

‘उनके हृदय में चाह है अपने हृदय में आह है

कुछ भी करें तो शेष बस यह बेड़ियों की राह है.’

‘पुष्प की अभिलाषा’ शीर्षक कविता की पंक्तियां भारतीय आत्मा की पहचान कराती हैं.

‘मुझे तुम तोड़ लेना वनमाली देना उस पथ पर फेंक

मातृभूमि पर शीष चढ़ाने जिस पथ आते वीर अनेक’

राष्ट्रीय भावधारा की कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान का

‘त्रिधारा’ और ‘मुकुल’ की ‘राखी’ ‘झांसी की रानी’ वीरों का कैसा हो बसंत’ आदि कविताओं में राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति है. ‘जलियांवाला बाग में बसंत’ कविता में कवयित्री ने नृशंस हत्या पर करुणा का भाव प्रदर्शित करते हुये कहा है.

आओ प्रिय ऋतुराज, किन्तु धीरे से आना

यह है शोक स्थान, यहां मत शोर मचाना

कोमल बालक मरे यहां गोली खा-खा कर

कलियां उनके लिए चढ़ाना थोड़ी सी लाकर.

रामधारी सिंह दिनकर स्वतंत्रता पूर्व के विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुये और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रवादी कवि के रूप में जाने जाते रहे. कवि ‘दिनकर’ के काव्य ने भारतीय जनमानस को नवीन चेतना से सराबोर किया है. कुरुक्षेत्र महाकाव्य राष्ट्रीयता से परिपूर्ण है.

‘‘लड़ना उसे पड़ता मगर.

औ’ जीतने में वह देखता है सत्य को रोता हुआ,

वह सत्य है जो रो रहा, इतिहास के अध्याय में,

विजयी पुरुष के नाम पर कीचड़ नयन का डालता.’’

बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ने राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत कविताओं को रचकर राष्ट्रीयभाव जागृत किये.

‘‘कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ,

जिससे उथल-पुथल मच जाए

एक हिलोर इधर से आये,

एक हिलोर उधर से जाये.

नाश! नाश! हां महानाश! की प्रलयंकारी आंख खुल जायें.

कवि जयशंकर प्रसाद की देश को समर्पित अपनी मातृभूमि के चरणों में अर्पित ये पंक्तियां-

‘अरुण यह मधुमय देश हमारा

जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा’’

हिन्दी साहित्य के अनेक कवियों ने राष्ट्रीयता की भावभूमि पर अपना काव्य रचकर नवजागरण का संदेश दिया. यह कहा जाता है कि राष्ट्रीय भावना राष्ट्र की प्रगति का मूल मंत्र है. और सच है कि आधुनिक काव्य में राष्ट्रीयता का भाव प्रत्येक भाषा में समाविष्ट है. किसी भी राष्ट्र-रूपी वृक्ष की छाया में अनेक पंथ-

धर्म और भाषाएं पल्लवित और पुष्पित होती है. एक राष्ट्र अनेक धर्म हो सकते हैं. किन्तु व्यक्ति मूल भावना और सांस्कृतिक विरासत एक ही होगी.

सोहन लाल द्विवेदी ने अपने काव्य संग्रहों में स्वतंत्रता के आह्वान व देश-प्रेम साधना के बीच आशा और निराशा के जो स्वर का प्रस्फुरण हुआ उसका अविरल प्रवाह बहा.

मातृभूमि के प्रति करुणा का भाव-

‘कब तक क्रूर प्रहार सहोगे? कब तक अत्याचार सहोगे?

कब तक हाहाकार सहोगे? उठो राष्ट्र के हे अभिमानी

सावधान मेरे सैनानी.’

सियाराम शरण गुप्त की ‘बापू’ कविता में गांधीवाद के प्रति अटूट आस्था व अहिंसा, सत्य, करुणा, विश्वबंधुत्व शांति आदि मूल्यों का गहरा प्रभाव है. रामनरेश त्रिपाठी, गया प्रसाद शुक्ल, श्रीधर पाठक आदि कवियों ने काव्य रस के आधार पर देश के उद्धार के लिए आत्मोसर्ग की भावना उत्पन्न थी.

स्वतंत्रता के यज्ञ में कवियों ने अपनी काव्य रस की आहुति देकर राष्ट्रीय कविता के ओजस्वी स्वरों की गूंज के द्वारा देश-प्रेम की भावना उत्पन्न की.

स्वतंत्रता के यज्ञ में कवियों ने अपनी काव्य रस की आहुति देकर राष्ट्रीय कविता के ओजस्वी स्वरों की गूंज के द्वारा देश-प्रेम की भावना मजबूत हुई.

हम यह कह सकते हैं कि हर युग में जो साहित्य लिखा गया है, उसका प्रभाव साहित्य का समाज पर और समाज का साहित्य पर पड़ रहा है.

गणेशशंकर विद्यार्थी, महात्मा गांधी आदि जैसे संपादकों ने लेख और संपादकीय लिखकर लोगों को देशप्रेम की प्रेरणा दी.

राष्ट्रीयता का भाव मानव का प्रथम पायदान है. कवियों ने कविता, गीतों, गजलों, लेखों, संपादकीय आदि के माध्यम से जन-जन तक व्यक्ति के अंदर राष्ट्रीयता का संचार किया. यानी हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय चेतना की सुप्तधारा को नयी दिशा मिली और जनजागरण को नयी चेतना और जागृति मिली.

संदर्भः

1. भारत की राष्ट्रीय चेतना

2. भारत के शक्ति के स्त्रोत

3. वृहत निबंध साहित्य

4. हिन्दी की राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा.

संपर्कः डब्लू.जेड. 21, हरिसिंह पार्क, मुल्तान नगर,

पश्चिम विहार (पूर्व), नई दिल्ली-110056

मो. 9278720311

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