बुधवार, 28 अक्तूबर 2015

प्राची - सितम्बर 2015 - पूजाश्री का आलेख : भाषा राष्ट्र की संजीवनी

भाषा राष्ट्र की संजीवनी

पूजाश्री

जादी के अड़सठ-बरस बाद भी, देश ने हिंदी को हृदय से राष्ट्र-भाषा स्वीकार नहीं किया है.

उच्च स्तर पर साधन-सम्पन्न लोग, अक्सर ही अंग्रेजी माध्यम से ही अपने बच्चों को शिक्षा दिलाते हैं. उनके बच्चों को हिन्दी के साधारण व्यवहार में आने वाले शब्दों का अर्थ भी मालूम नहीं होता है. कुछ लोग तो अंग्रेजी के इतने दास हैं कि यदि उनके पास-पड़ोस में हिन्दी बोलने वाले कोई रहने को आ जाएं, तब वे अजीबो-गरीब ढंग से उन पर नाक-भौंह सिकोड़ने लगते हैं. इसका कारण है, राजनेताओं द्वारा राष्ट्र-भाषा को उलझाए हुए रखना.

किसी भी राष्ट्र में, राष्ट्र की सर्वाधिक उन्नति और आपसी आत्मीयता, एकता के लिये, एक भाषा ही, उस राष्ट्र के लिए संजीवनी का काम करती है.

देश के दुश्मनों या देश में ही छिपे देश-द्रोहियों ने, राष्ट्र भाषा की अवहेलना करने का षड्यंत्र किया है और करते रहते हैं, जबकि हमारे देश में सिद्धनाथ पंथी साधुओं, सूफी-संतों, महाराष्ट्र और गुजरात के भक्तों, बंगाल और असम के वैष्ण संतों ने अपने विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम हिन्दी को ही बनाया था. जिस समय हमारे देश का राजनीतिक स्तर एक नहीं था, तब उससे भी पहले ‘पद्मरचित’ लिखा गया था.

पश्चिम से आए मुस्लिम लेखक अब्दुल रहमान ने ‘संदेशरासक’ मोहम्मद जाससी के द्वारा रचित ‘पद्मावत’ को कौन नहीं जानता?

तुलसीदास जी द्वारा रचित ‘रामचरित मानस’ जनता तक पहुंचाने के लिए हिन्दी का ही सहारा लिया गया था.

आज भी हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने के लिए कई तरह की गलत धारणाएं फैलायी जाती रही हैं.

जैसे कि हिन्दी संबंधी-अध्याय, हिन्दी समर्थकों के आग्रह पर संविधान में जोड़ा गया था. समय-समय पर इस झूठ का प्रचार, विभिन्न दलों के धड़ल्ले से किया जबकि संविधान निर्माण के लिए जो मसौदा-समिति बनी थी, उसमें डॉ. अम्बेडकर सर-अल्लाड़ी कृष्णा स्वामी अय्यर, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, गोपाल स्वामी अय्यंगार. एन. माधव राव, सैय्यद मुहम्मद और सर बिजेन्द्रलाल मित्तल जैसे महानुभाव थे.

इनमें से एक भी हिन्दी भाषी नहीं था, किन्तु सभी हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के पक्ष में थे. यहां तक कि संविधान सभा के सभी अहिन्दी भाषी नेताओं ने भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने में अपनी सहमति, सहज रूप से दी. बस, उनका सिर्फ इतना ही आग्रह था कि प्रांतीय भाषाओं के ऊपर हिंदी रखकर, अंग्रेजी हटाने के लिए कानून बनाने का बंधन नहीं लगाना चाहिए.

महात्मा गांधी सौराष्ट्र में जन्में, ब्रिटेन में पढ़े तथा कार्य भूमि दक्षिण अफ्रीका को बनाया, किन्तु जब से भारत आए, तब उन्होंने जनता को प्रोत्साहित करने के लिए हिन्दी को ही कांग्रेस की भाषा बनायी और हिन्दी भाषा को रचनात्मक कार्यों से जोड़ा.

कहने का अर्थ है, हमारे देश के महान विभिन्न भाषाओं के विद्वानों ने हिन्दी को देश की सर्वेसर्वा भाषा के रूप में स्वीकार किया है.

आज हमें यह याद रखना चाहिए कि पूरे देश की एकता-प्रतिबद्धता आत्मीयता के सूत्र को जोड़ने के लिये अपनी एक भाषा हमें प्राणों से भी प्यारी होनी चाहिए.

जिस दिन एक भाषा के सूत्र में, हृदय से बंध जायेंगे, उसी दिन से, देश की एकता का गुलशन महक उठेगा.

 

संपर्कः बंगला नं. 1, इन्द्रलोक, स्वामी समर्थ नगर,

लोखण्डवाला, अन्धेरी पश्चिम, मुम्बई-400053

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