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प्राची - सितम्बर 2015 - पंजाबी कहानी - हमदर्दवीर नौशहरवी की कहानी - नीला तारा अस्त होने के बाद

पंजाबी कहानी

‘‘नीला तारा’’ अस्त होने के बाद

हमदर्दवीर नौशहरवी

रोटी खाने को आज मेरा मन नहीं है. हर रोज की तरह गुरुद्वारे का भाई जी खाट के सिरहाने रोटी रख गया है. पहले सोचा था कि पीछे से आवाज देकर रोकूं, पूछूं, कुछ बातें करूं. भाई जी खुद कभी कोई बात ही नहीं करता, कभी नहीं बुलाता, बस अंधेरे-

अंधेरे दबे पांव आता है, चुपचाप रोटी टिकाकर चला जाता है. तड़के मुंह अंधेरे रोटी के साथ चाय का लोटा भी होता है. सदैव मैं ही उसे रोककर पूछता हूं, ‘मेरे पास तुम्हारे सिवा कोई भी गांव वाला नहीं आता. किसी तरह यदि मैं किसी के पास पहुंच जाता हूं तो सामने वाला पीछा छुड़ाकर, दूर चला जाता है. मेरे साथ कोई बात नहीं करता.’

‘तुम्हारे साथ यदि कोई गांव वाला, कोई बात नहीं करता तो तुम्हारे में ही कोई कसूर होगा, दोष तुम्हारा ही होगा.’

‘मेरी पत्नी विमला का कहीं पता चला? मेरी बेटी गीता, मेरा एक ही बेटा सुभाष न जाने कहां चले गये?’

मेरे परिवार के बारे में भाई जी ने कभी कुछ नहीं कहा, कुछ नहीं बताया. मैं कई बार पूछ चुका हूं. जब भी पूछता हूं, भाई जी का सदा यही उत्तर होता है, ‘रोटी अभी गर्म है, जल्दी खा लेना, ठंडी हो जायेगी.’ और भाई जी जा चुका होता है.

दिन काफी चढ़ आया है. मैं चाय पी चुका हूं, लेकिन रोटी पड़ी-पड़ी ठंडी हो गई है. आज मैं रोटी नहीं खाऊंगा. इस घर में आज मेरा आखिरी दिन है. अंधेरा पसरते ही मैं यहां से चल दूंगा. रात ही रात में पांच-सात मील तो तय कर ही लूंगा. रात की रोटी तक मैं प्रतीक्षा नहीं करूंगा. रात को भाई जी ग्यारह बजे से पहले रोटी नहीं लाते और ग्यारह बजे तक मैं गांव की सीमा वाला ऊंचा टीला पार कर जाऊंगा.

मेरा गांव, कभी यह मेरा गांव ही होता था. मैं यहां जन्मा, पला, पढ़ा, जवान हुआ, यहीं से मैं बारात लेकर गया. यहीं मैं शादी करके लौटा, यहीं मैं सेना में भर्ती हो गया. धीरे-धीरे मैं अपने गांव से दूर होता गया. सेना की तेईस साल की नौकरी के दौरान मैं साल में सिर्फ एक बार ही गांव आया करता था. कुछ दिन गांव में बिताता और फिर दोस्त, मित्रों, संबंधियों से मिलने चला जाता था. गांव में मानो दिल ही नहीं लगता था. मेरे वारिस इसी गांव में जन्मे व पले थे. मेरे पिता, दादा और शायद परदादा भी इसी गांव में पैदा हुए, पलते रहे और परवान चढ़े थे. वे गांव से बाहर नहीं गये थे बस, यहीं थोड़ी-सी खेती करते रहे, मामूली-सी दुकान करते रहे. विमला भी बस इस गांव में आकर इसी गांव की हो गयी. मैं इसे कभी अपने साथ ले जा नहीं पाया. मेरी यूनिट हमेशा पहाड़ों पर ही रही है. कभी नेफा, कभी नागालैण्ड तो कभी लेह लद्दाख. अभी तो मैदान में आया था. मैं सोचता था, शायद अब कुछ साल परिवार को अपने साथ रख सकूंगा. हवलदार की प्रमोशन की भी उम्मीद थी, लेकिन...

मैंने सभी को तार दिए. ले-देकर अब दो ही निकट

सम्बन्धी बाकी थे-साला और मामा. इन्हें भी तो दो तारें दीं. दोस्त मित्र बहुत हैं, सभी को तार दिए, लिखा कि मैं बहुत बुरी हालत में मिलिटरी हस्पताल में पड़ा हूं, शायद बच पाने की भी आस न हो, जल्दी आकर मिलें. लेकिन कोई नहीं आया, यहां तक कि विमला भी नहीं आयी. लेकिन विमला थी ही कहां? मालूम नहीं इससे पहले ही वह...

मैंने सोचा था,-शायद विमला अपने भाई के पास शहर चली गयी हो. गांव में अकेले परिवार के लिए कोई सुरक्षा न थी. अस्पताल से छुट्टी पाकर मैं सीधे अपने साले के पास पहुंचा.

‘मेरे तार नहीं मिले क्या?’

‘मिले थे, लेकिन कारोबार से फुर्सत ही नहीं थी और फिर इस बिगड़े हुए माहौल में सफर करना वैसे भी खतरे से खाली नहीं.’

‘विमला और बच्चे आये होंगे?’

‘आये थे, लेकिन एक दिन रहकर चले गये. असल में विमला की कौशल्या से बन ही नहीं सकी. मैंने भी यही सलाह दी. भले ही हालात बहुत खराब हैं, फिर भी अपना घर ही अन्ततः काम आता है. कोई कितनी देर बेगाने घर में...’

‘ठीक है, तो मैं चलूं एम्बूलेंस है, गांव तक छोड़ आएगी, बाद में कठिनाई होगी.’

‘आपकी बात तो ठीक है, लेकिन आप इस हालत में...ठीक है. आपकी जैसी इच्छा, लेकिन चाय तो पी जाओ.’ मैंने कहा, ‘कौशल्या, चाय तो बनाना चार प्याले.’

कई साल पहले मेरे ससुर का असमय देहान्त हो गया था. कुछ समय बाद सास भी परलोक सिधार गयीं. मामा के घर जाने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई.

मैंने सोचा था, ‘शहर में ही रहूंगा. शहरों में हिन्दुओं के लिए फिर भी थोड़ी सुरक्षा है-गांव में क्या बचाव है? कुछ गांवों में हिन्दुओं की हत्याएं भी कर दी गयी है. कोट में तो हिन्दुओं का परिवार भी एक ही है. सिर्फ हमारा परिवार ही कई पुश्तों से वहीं रहता आया है. लेकिन परिवार भी एक का एक ही रहा. दादा भी अकेले थे, मेरे पिता भी अकेले थे, आगे मैं भी अकेला हूं. मेरे भी एक ही बेटा है. न जाने कहां है मेरा लाडला? सोचा था, साले के कारोबार में मुनीमी करने लगूंगा. दिनभर बैठा हिसाब-किताब करता रहूंगा या कहीं कोई दुकान डालकर बैठ जाऊंगा. कुछ पेंशन भी तो मिलती थी, गुजारा होता रहता.

गांव पहुंचा हूं. गांव मुझे उजड़ा-सा लगा-वीरान-सुनसान-सा. पहले तो सैनिक गाड़ी आती देखकर लोग रास्ते में ही आ मिलते थे. खेतों में काम करते किसान भी उठकर देखने लगते थे. सैनिकों की गर्वीली मुस्कान बांटते थे. बच्चे आस-पास जमा हो जाते थे.जयहिन्द कहते थे, स्त्रियां छतों पर चढ़कर देखा करती थीं. नव-वधुएं घूंघट में ही मुस्करा देती थीं. सालेक बाद जब कोई जवान छुट्टी आता तो मानो सारे गांव का चाव-सा बढ़ जाया करता था. काला ट्रंक उठाये जैसे ही कोई फौजी जवान अपने गांव की फिरनी पर चलता हुआ अपने घर की ओर मुड़ता, उसके पीछे बच्चों का एक जुलूस आ खड़ा होता-मानो यह कोई जीत का जूलूस हो. हर बच्चा बड़ा होकर सैनिक बनने की इच्छा रखता और फिर छुट्टी आया हुआ सैनिक वरदी समेत चाचों, तायों के घरों मिलने जाता-अपने यारों-दोस्तों से भी मिलता. सभी आगे आ आकर उसके साथ बैठते, युद्ध की बातें पूछते. उन्हें भी भरती करवा देने की मिन्नतें करते.

मेरे साथ भी सदा ऐसे ही होता था.

लेकिन इस बार क्या हो गया? किसी ने राम-सति नहीं पूछी. गाड़ी आते देखकर लोग राह से हट गये थे. किसी ने स्वागत में हाथ नहीं हिलाया. कोई बच्चा गाड़ी की ओर दौड़कर नहीं आया. जैसे-जैसे गांव में से होकर निकला-अपने घर की ओर बढ़ा-हर खुला दरवाजा भी बन्द हो जाता रहा. गलियां सूनी, द्वार बन्द, हरेक चेहरे की महज पीठ ही दिखाई दी.

फौजी एम्बुलेंस मेरे घर के सामने आ रुकी है. बाहर कुंडा लगा हुआ है. ड्राइवर ने उतरकर कुंडा खोला. दूसरे जवान की सहायता से उसने मुझे नीचे उतारा और आंगन में मुझे ला बैठाया. आंगन में सूखे नीम के पत्ते बिखरे हुये हैं. चूल्हे की राख पर बरसात की बूंदों के निशान पड़े हैं. कई दिन पहले कहीं से थोड़ी-सी तेज बूंदें पड़ी होंगी. रहने वाले कमरे में ताला लगा हुआ है. ‘तूड़ी वाला कोठा’ खुला पड़ा है, लेकिन उसमें तूड़ी नहीं है.

‘विमला...!’ मैं जोरा से आवाज लगाता हूं, लेकिन कोई नहीं बोला. पड़ोस में से भी किसी ने कोई सहमति नहीं प्रकट की.

फौजी एम्बूलेंस जा चुकी है.

आंगन में मेरा काला ट्रंक पड़ा है. ट्रंक पर काला किट-बैग रखा है. दोनों पर सफेद अक्षरों में मेरा सर्विस नम्बर अंकित है-6804714. साथ ही पड़ा है रस्सी से बंधा मेरा बिस्तर, जिसमें कुछ चिथड़े हैं. बस, यही है मेरी तेईस साल की कमाई. हां, चलते समय मुझे दो बैशाखियां भी दी थीं.

मैं नीचे बैठा हूं. जमीन पर पास पड़ी बैशाखियां मुझे घूर रही हैं.

कान बच गये हैं, सब कुछ सुनने के लिए-धमाका, बम, प्लास्टर, तोप-गोले-गरनेड, धम्म्-ढह्, ढेर हो गयीं इमारतें, मीनार गिरते रहे, गुम्बद टूटते रहे, हेलीकाप्टर उड़ते रहे, टैंक चलते रहे; शोर, अन्धकार, चीखें, आहें, पुकारें, गैस, धुआं, आग, मलवा और लाशें, शव-ही-शव, लहूलूहान सारी लाशें अपने लोगों की, अनाथ बच्चे, विधवा स्त्रियां, कौन करता है, कौन भरता है?

मेरी सूंघने की शक्ति समाप्त हो गई है...उमस, उमस और उमस, सीलन और सैलाव, कड़वाहट ही कड़वाहट. मैं तो कुछ भी नहीं सूंघ सकता, बदबू, खूशबू, दुर्गन्ध, सुगन्ध मेरे लिए सब समान हैं.

मेरे चलने की ताकत भी खत्म हो गई है-स्वाद, बेस्वाद का अन्तर मिट गया है. कड़वा, मीठा, नमकीन, मिर्चयी, खट्टा, कसैला, गहन, गाढ़ा, पतला, ताजा, बासी-मुझे कुछ पता नहीं रहा?

बम फटने से मेरा एक हाथ उड़ चुका है, एक टांग भी जाती रही है. पूरा शरीर कुरूप हो गया है. चेहरा न जाने कितना अपरिचित हो गया है. मैं अपना चेहरा दर्पण के सामने नहीं कर पाया. शायद कोट के लोगों ने मुझे पहचाना ही न हो. वे शायद सोचते हों-यह रूपलाल नहीं, कोई और ही है. वैसे भी मैं अब रूपलाल नहीं, कुरूपलाल हूं.

-राम के नाम पर कोई पंजी दस्सी, कर्मा वाली ईश्वर आपका भला करे-दे जाओ, कोई पंजी दस्सी, कोई पहनकर उतारा कपड़ा ही दे जाओ, सरदी है. ईश्वर कमाई में बरकत देगा. कोई आधी, चप्पा रोटी ही डाल दे गरीब की झोली में, दो दिन से भूखा हूं, ईश्वर भला करेगा.

मैं नंगी जमीन पर बैठा हुआ हूं. मेरा एक ही हाथ साबुत है, बाकी पूरे शरीर के अंग-अंग पर दाग है. जख्म है, जख्मों के अमिट चिह्न हैं. मेरा साबुत हाथ स्वयं ही फैल गया है-पसर गया है. क्या यह हाथ सिर्फ भीख मांगने के लिए ही साबुत बचा है. नहीं, मैं भीख तो नहीं मांग रहा, फिर यह झोली कैसे फैल गयी? यह हाथ कैसे पसरा हुआ है. यह भिखारी का स्वर कहां से उभरा है, यह दया की मुद्रा कैसी?

कोई मुझ पर तरस करे. यदि हमदर्दी नहीं तो तरस करे कोई क्या करे मुझ अपाहिज पर. कोई आये, कोई बुलाये, बातें करे, कुछ पूछे, कुछ बताये, कोई तो कहे कि मेरी पत्नी, मेरे बच्चे कहां चले गये? विमला कहां है, गीता कहां है? लगता है मेरा बेटा इन्हीं लोगों ने कतल किया है. मेरी पत्नी और बेटी को कहीं ले भागे होंगे. इन लोगों का अब क्या भरोसा? कहीं दूर मेरी पत्नी और बेटी बेच दी गई होंगी. गांव की बहू-बेटी अब पूरे गांव की बहू-बेटी नहीं रहीं. गांव में सिर्फ एक हमारा घर ही तो पंडितों का है. बेसहारा परिवार, इन्होंने तो लूट का माल ही समझ लिया होगा. कोई पूछने-बताने वाला भी तो नहीं था. गांव के लोगों का इसमें जरूर हाथ हेै, नहीं तो कम-से-कम आकर हमदर्दी तो दिखाते. कुछ और नहीं तो चार आंसू ही बहा जाते, दिखावे भर को ही सही. पहले तो मुझसे, जब मैं छुट्टी आता था, आधी-

आधी रात तक 1962 की लड़ाई, 65 की लड़ाई या 1971 की लड़ाई के संबंध में, बंगलादेश की स्वतंत्रता के समय की कहानियां सुनते रहते थे. अब की कोई आया ही नहीं. यहां कामरेड बाबा भी सिर्फ पहले दिन ही आया था-दो-चार बातें करके चला गया, फिर आया ही नहीं. कामरेड बाबा तो इस गांव का सींग था जैसे, जिस पर इस गांव की सारी धरती टिकी हुई थी. पूरे इलाके में वह सज्जन पुरुष और हरेक के काम आने के कारण प्रसिद्ध था. क्या उसका खून भी सफेद हो गया?

यह कैसी हवा चली है कि गांव में ‘नीले-तारे’ उग आये हैं. घर-घर में ‘ब्लू-स्टार’ उदय हो गया है. यह कैसी अंधेरी आंधी आई है कि सभी पुराने रिश्ते जैसे अस्त हो गये हैं? कभी समय था कि श्राद्ध खिलाने वाले यजमानों को हमें पंक्ति में खड़ा करना पड़ता था-फिर भी कई बार श्राद्धों के दिनों में एक ही दिन दो-दो घरों के श्राद्ध खाने पड़ते थे. गांव में एक ही तो घर हमारा, पुरोहितों का. सभी का ‘मान रखना’ जरूरी था. कोट में आधे से अधिक घरों में मेरी दादी ने और फिर बाद में हमारी मां ने, लोगों के श्राद्ध करवाये थे, सम्बन्ध जुड़वाये थे, गांव में कोई भी रिश्ता-नाता शगुन-कुड़माई-मेरी दादी-प्रसन्वी देवी की उपस्थिति के बिना पूरी नहीं हो पाती थी. हरेक गमी-खुशी की बेला में मेरी दादी सबसे पहले हाजिर रहतीं. कोट की पारपलियां थीं. ब्याह शादी के समय लेन-देन, भाई-चारा थोड़े ही घरों का आपस में होता है-लेकिन गांव में किसी के यहां भी शादी हो, हमारे घर ‘जमीन’ जरूर आता, आमन्त्रण अवश्य मिलता था. परस्पर छोटे-छोटे झगड़े होते थे-लेकिन हमारे घर के साथ सभी की सांझ सदा बनी रहती थी. अब क्या हो गया है, वे पुराने वक्त कहां गुजर गये?

मैं दरवाजे के आगे बैठा रहता हूं. सब लोग परछाईं की तरह निकल जाते हैं. सभी के मुंह मोटे हैं, सब जैसे मेरे साथ गुस्सा हों. भाई जी कहता है कि इसमें जरूर मेरा ही दोष होगा. भला मेरा दोष क्या है?

तेईस साल हो गये थे-नौकरी करते हुये. अभी सिर्फ नायक ही बना था. सोचा था, शायद हवलदार का प्रमोशन मिल जाय. बलंटीयर कर दिया. वैसे भी हुकुम कहीं किसी ‘पीस स्टेशन’ पर ही बदली हो जाये-शायद फैमिली क्वार्टर मिल जाये-विमला को अपने पास रख सकूं, सुभाष की पढ़ाई का कुछ बेहतर प्रबन्ध कर सकूं. नजदीक रहूंगा तो गीता की शादी के लिए किसी योग्य वर की तलाश सहज हो पायेगी.

लेकिन कुछ मिला क्या? यह टूटी हड्डी. ये छीजती स्मृतियां. अब मैं अपनी वीरता की कहानियां भी तो किसी को नहीं सुना सकता. किस लड़ाई की बात करूंगा? किसे दुश्मन कहूंगा? किस देश के साथ युद्ध चलाऊंगा, क्या बताऊंगा? कौन-सी सरहद, कैसी सीमा?

मेरी कोई पार्टी नहीं. मुझे चुनाव नहीं लड़ना. मैं वोट मांगने नहीं जाऊंगा. मेरा नन्हा-सा घोंसला था-वह भी टूट गया, बिखर गया, उजड़ गया. लोगों, तुम मुझसे और क्या चाहते हो?

अब मैं यहां नहीं रहना चाहता, यहां मेरा कौन है? आज अंधेरा होते ही मैं यहां से चल दूंगा. लेकिन कहां जाऊंगा, कोई ठिकाना भी तो नहीं दिखाई देता. यहां मेरा क्या हैं? कहीं अन्यत्र भी मेरा क्या है? सिर्फ मैं ही मैं हूं लेकिन मैं भी अब क्या हूं? रेंगती, चलती लाश से बढ़कर मैं अब क्या हूं? लेकिन यहां रहकर भी क्या करूंगा? दिनभर अपनी देह के जख्मों पर से मक्खियां उड़ाता हूं, अपने से कुत्तों को दूर भगाता हूं. अब तो मानो कुत्ते ही मेरे साथी हैं. भाई जी तो कुत्तों की तरह ही अंधेरा होने पर मुझे चार रोटियां फेंक जाता है. गांव में से मांगकर लाता है और उसमें से कुछ मेरे लिए छोड़ जाता है. लेकिन मैं अब कुत्तों की तरह नहीं खाऊंगा. सुबह की पीने में बंधी, पड़ी रोटियां तो अब तक अन्धे की लाठी की तरह अकड़ चुकी होंगी. लेकिन यहां पड़ी ये क्या करती हैं? दूर गली में फेंक देता हूं, किसी कुत्ते के काम तो आयेंगी.

फेंकने से पहले रोटियां खोलकर देखता हूं. मक्के की रोटियां हैं. चार चुपड़ी हुई. सूंघकर रखता हूं-लेकिन कुछ पता नहीं चलता, दुख होता है. मेरी तो घ्राणेन्द्रिय भी सूख गई है. ठीक ऐसी ही रोटियां विमला पकाया करती थी. मक्के की रोटी थापते समय वह हथेली से ही ‘र’-सा उभार लेती थी. कई बार वह रोटी को इस तरह सेंकती थी कि वह ‘र’ साफ दिखने लगता था. इस रोटी पर ‘र’-सा उभरा दिखता तो है नहीं, अब मेरी ऐसी किस्तत कहां?

अंधेरा हो रहा है. अंधेरे के अधिक गहराने की प्रतीक्षा में हूं, मैं अभी.

-ओए तेरी मां की...ओए, हमारे घरों को उजाड़ने वाले...

-पूर्व की ओर नहीं इधर तो दिल्ली है. यह पश्चिम की ओर ठीक है, इधर मुरादाबाद है. तो अब...

-ओ तेरी मां की ...ओ हमारे घर उजाड़ने वाले-तुम्हारी मां की...

मुझे मालूम ही नहीं होता कि किसी ने मुझे पकड़कर मेरा चेहरा पश्चिम की ओर कर दिया था. लेकिन फिर मैं पूर्व की ओर चेहरा घुमाकर ललकारता हूं-अपनी एक वैशाखी उभारता हूं. सहारा न होने के कारण नीचे गिर पड़ता हूं. टीले से नीचे फिसलने लगता हूं कि लगता है, जैसे कोई मुझे दबोच लेता है.

-कौन हो तुम?

-मैं हूं विलायती बाबा, जिसे तुम कामरेड बाबा भी कहते हो.

-विलायती बाबा! आप यहां कैसे?

-भाई जी, तुम्हारी ओर आ रहा था रोटी लेकर, कि उसने तुम्हें गांव से बाहर की ओर जाते देखा. उसे अजीब-सा लगा. इतनी रात गये तुम बाहर भला क्या करने जा रहे थे? उसने आकर मुझ बताया और मैं तुम्हारे पीछे-पीछे हो चला.

-आप इतने दिन कहां रहे, मैं...मैं...

-हां, हां, मुझे मालुम है, सब मालुम है. मैं यहां था. आस-पास के गांवों में था. लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हुए जा रहे हैं. अपने घर उजड़ रहे हैं, अपनी विरसा-रात्रि को भूलते जा रहे हैं. बहुत कुछ करने को है. एक काम तुम्हारा भी तो मुझे करना है.

-मेरा कौन-सा काम? मैंने तो आपको कोई काम नहीं कहा.

-वह तुम्हारा खत था न, तूने भाई जी को पोस्ट करने के लिए दिया था. खत खुला था. शायद गोंद कम लगी थी. वह चिट्ठी भाई जी ने पढ़ने के लिए दे दी. मैंने खत को गोंद लगाकर ठीक तरह बन्द कर दिया और पोस्ट करने के लिए अपनी भीतरी जेब ेमें रख लिया, लेकिन गड़बड़ी के कारण बसें बन्द हो गयीं. मुझे भी समय कुछ कम ही मिला, इसी कारण लेट हो गया हूं. अब कल मैं शहर जा रहा हूं, वहीं पोस्ट करूंगा, साथ ही अधिकारियों से मिल-मिलाकर तुम्हारी सिफारिश भी कर दूंगा. तुम्हें इनाम मिलेगा तो गांव का नाम भी तो रोशन होगा.

-कौन-सा खत? कैसी चिट्ठी? कैसा इनाम?

-वही खत जिसमें ‘नीला-तारा युद्ध’ में अपनी वीरता के जौहर दिखाने के लिए तुमने सरकार से इनाम की मांग की थी.

-कहां है वह खत? जरा दो तो.

-लो, यही है देख लो, कल जरूर पोस्ट हो जायेगा. तुम्हें रसीद भी मिल जायेगी. क्षमा करना, कुछ लेट जरूर हो गया.

मैंने वह खत फाड़ दिया है. कई पुर्जे करके मिट्टी में मिला दिया है. मुझे नहीं चाहिये यह इनाम. बहुत इनाम पहले पा चुका हूं, ये दो वैशाखियां जो इनाम में मिली हैं क्या कोई कम इनाम हैं?

-चल, घर को चलें. यूं ही व्यर्थ भटकते घूम रहे हो. सब तुम्हारी वापसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं. बाबा जी ने कसकर मुझे बांहों में भर लिया है.

-कौन-सा घर, कौन मेरी प्रतीक्षा में है? मैं सिसककर, सरककर नहीं मरना चाहता. मुझे जाने दो!

-तुम्हारी पत्नी, बच्चे तुम्हारी प्रतीक्षा में हैं.

-पत्नी, बच्चे? कहां हैं? क्या वे जीवित हैं?

-हां, बिल्कुल सकुशल हैं, पंचायत घर के एक कमरे में रहते हैं. तुम्हारे घर के एकान्त में उन्हें डर लगता था. रोटी तुम्हें हर रोज विमला की पकाई हुई ही मिलती थी.

-अच्छा! मुझे सहारा दो, मैं अभी वापिस लौटना चाहता हूं-अपने गांव की ओर अपने घर की ओर. मुझे शीघ्र ले चलो, जल्दी करो...

किरायेदार मकान खाली कर रहा था, तभी मकान मालकिन वहां आ पहुंची. आराम कुर्सी में हुए छेद को देखती हुई वह बोलीे, ‘‘देखिए, आपने इस कुर्सी में छेद कर दिया है, आपको इसकी कीमत देनी पड़ेगी.’’

किरायेदार ने कहा, ‘‘मैं इसकी कीमत नहीं दूंगा. यह छेद मैंने नहीं किया.’’

मकान मालकिन ने हैरान होते हुए कहा, ‘‘बड़े अजीब आदमी हो तुम. अब तक 16 किरायेदार इसमें रहकर जा चुके हैं. तुम पहले आदमी हो जिसने छेद का हरजाना देने से मना किया.’’

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