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गजानंद प्रसाद देवांगन की 4 कविताएँ

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बातें फिर बढ़ाइये 


अहम को परम से
आरंभ को चरम से
पहले मिलाइये -
बातें फिर बढ़ाइये

अपर को परा तक
गगन को धरा तक
प्यार से झुकाइये -
बातें फिर बढ़ाइये

अशिव में शिव का
जीव में ब्रम्ह का
दर्शन कराइये -
बातें फिर बढ़ाइये

अपूर्ण में पूर्ण का
सगुण में निर्गुण का
बोध दृढ़ कराइये -
बातें फिर बढ़ाइये

मेरे और तेरे का
सांझ और सबेरे का
अंतर मिटाइये -
बातें फिर बढ़ाइये

जीवन में मृत्यु भ्रम
अनित्य में नित्यक्रम
शाश्वत है स्वीकारिये -
बातें फिर बढ़ाइये


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राम रहीम दोनो एक

जिसे राम कहता जग सारा
वही खुदा निर्गुण निरवारा
पंडित मुल्ला चाहे जो भाखे
परम सत्य तो सबसे न्यारा
भाई रे , भीतर भी देख
राम रहीम दोनो एक


गिरजा में ईसा कहलाता
गुरूद्वारा मे नानक
महावीर गौतम भी वही है 
अखिल विश्व संचालक
नाम रूप से भले अनेक
राम‌‌‌‌‌‌‌‌ रहीम दोनो एक


मंदिर मस्जिद में मत उलझो
सत्य सामने रखकर सुलझो
जाति धर्म से राष्ट्र बड़ा है
मानव हित का प्रश्न खड़ा है
मत कर मिथ्या टेक
राम रहीम दोनो एक

 


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फसल लाशों की


साम्प्रदायिकता के बीज –
बोया है
कालकेतुओं ने ।
जिसे
सींच रहे दंगाई ,
हत्या के खून से  ।
इसमें
प्रतिवादों की उर्वरकें
डाली जा रही हैं –
रोज – ब‌‌ ‌‌- रोज ।
अंकुरित आंदोलनों की –
ये परजीवी बेलें
सत्ता की टहनियों में चढ़
फल रही है
लाश ही लाश ॥


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श्रांत नहीं हूं


श्रांत नहीं हूं
पृथ्वी की गति
सूर्य की परिक्रमा
चांद का चक्कर
मैं अनुयायी हूं इनका –
पर श्रांत नहीं हूं
नदियों का बहाव
समय का कटाव
वायु की चंचलता
इनका अनुसरण करता हूं
पर मैं अक्रांत नहीं हूं
आंखें भटकती हैं
हर दिशा और दृश्य में
शून्य ये नजरें जरूर
पर मैं भ्रांत नहीं हूं
मैं श्रांत नहीं हूं ॥


गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा

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