मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

कामिनी कामायनी की 5 ताज़ा ग़ज़लें

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   1

आसमां कहने लगा है ,….

आसमां कहने लगा है ,रात है

छोड़ो सब ,बस ,कल सुबह की बात है

 

क्यों अँधेरों से डरे हो  इस कदर ,

वो दरकता अब फ़लक पर रात है ।

 

सब पुरानी ,सब ,गई ,बीती रही ,

क्या करें कुछ भी कहाँ नई बात है ।

 

हम तो समझे थे वहाँ मुजरिम है एक ,

पर नहीं ,सारा ही कुनबा साथ है ।

 

अब भला अकुलाएगा मन क्यों तेरा ,

आशियाना जब तुम्हारे पास है ।

 

  2

मेरी जिंदगी ,मेरी जुस्तजू ,मेरी आबरू आ रु बरु ,

मैं माँगू क्या नसीब से ,कुछ सूझता नहीं और है ।

 

हम चले कहाँ ?बहके कदम ,ठिठकी नज़र ,उखड़ी हवा

हर गाँव शहर परख लिया चाहा नहीं कहीं ठौर है ।

 

वो कारवां जो गुजर रहा जाएगा दरिया पार जब

जो लोग इंतज़ार में,पददलित नहीं ,सिर मौर हैं ।

 

तौलोगे क्या ? टूटी तुला ,सौदागर भी कुछ मौन है ,

सहते चलो ,खुद मौज़ में ,बदला हुआ ये दौर है ।

 

बदली है जब से अपनी नज़र ,अपना ख़याल अपना सफर

कुछ भी सिफ़र लगता नहीं ,सांवला भी गौर है ।

 

3

क्यों फरियाद करते हो ,क्यों दरियाफ्त करते हो

मुकम्मल तुम कितने हो ये तुम जाने ,खुदा जाने ।

 

संभल जाओ यहाँ का दौर दामन दाग करता है ,

जो चमके दिखते साहिल पर , हजारों उनके अफसाने ।

 

कहावत लोग कहते है ,सच हर पल अकेला है ,

मगर झूठों के सौ राहें ,क़ातिल हजार परवाने  ।

 

हवा गुमसुम सी रहती है ,सदा नजदीक पेड़ों के ,

सुनाती है बगावत की ,बनाती गुलशन  को वीराने ।

 

बड़े अचरज में रहते हैं ,जिन्हें किस्से बनाने हैं ,

है तन्हा रात दिन उनका ,कहते हैं लोग दीवाने ।

 

4

वो अजनबी, मगर  तन्हा ,मुझे रुला क्यों गया ,

हमारे दिल का कोई तार सा हिला के गया ।

 

बहुत पुकारा मगर खो गई थी मेरी सदा ,

एक अल्फ़ाज़ भी ,न होठ को हिला के गया ।

 

कहूँ तो किससे कहूँ ,कैसे इस वीराने में,

हज़ारों फूल कोई ,पुरसुकून ,खिला के गया ।

 

अभी भी गूँजती है झिलमिलाती चाँदनी में यहाँ ,

वो वादियों की हवा  जो वो खिलखिला के गया ।

 

मुड़ा तो उसने भी था ,जिस मोड का सहारा लेकर,

जगह को छुआ था ,उसे  अपने में  मिला के गया ।

 

5

वो एक सख्स मेरा चैन लूट जाएगा ,

दुबारा फिर से मुझे मीत भी बनाएगा ।

 

वो सरफरोश है ,जालिम है ,या है ,दीवाना ,

खुद अपने मुंह से जमाने को ही बताएगा ।

 

किसी कि बात पर इतना ही उलझना मत दिल ,

घड़ी घड़ी मे कितना चेहरा बदल जाएगा ।

 

पुकारतीं हैं सदाएँ जो नाम , साहिल को ,

वो खुद बख़ुद कहीं सागर पे उभर आयेगा ।

 

जो भूल कर भी याद करता नहीं धरती को ,

वो बादल ही  इसके प्यास को मिटाएगा ।

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