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श्री मणिप्रभ सागर जी के मुक्तक

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प्रस्तुति

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 


हमें पसंद नहीं है, आप विवाद मत करिए,

जितने भी विवाद हैं, उन्हें याद मत करिए। 

इसी में हमारा और आपका भला है -

समय कीमती है, इसे बरबाद मत कीजिए।। 

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शरीर को हिलने से रोकोगे तो अकड़ जाएगा,

मन को मिलने से रोकोगे तो बिगड़ जाएगा। 

क्या फूल खिलने से रुक सकता है ?

समाज को बदलने से रोकोगे तो पिछड़ जाएगा।।

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हर हालत में ख़ुशी खोज लेना, ख़ूबी की बात है,

ख़ुश इंसान के लिए हर रात दिवाली की रात है। 

गमगीनी में रोशनी भी अँधेरा है,

खुश रहना,खुश रखना इंसान के हाथ है।। 

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कष्टों में ही मानवीयता का ज्ञान होता है,

शूलों पर ही सत्य का संधान होता है।

दीनों की आह सुन जो सेवा का व्रत ले,

धरा पर वही सच्चा इंसान होता है।।

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जीवन के लिए धन है, धन के लिए जीवन नहीं,

तन के लिए कपड़ा है, कपड़े के लिए तन नहीं।

साधन और साध्य का अन्तर समझना ज़रूरी है,

चेतन के लिए शरीर है, शरीर के लिए चेतन नहीं।।

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दाँव का भरोसा करो, बल का नहीं,

काम का भरोसा करो, फल का नहीं।

भरोसवादी बनना बुरा नहीं है पर,

आज का भरोसा करो, कल का नहीं।।

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क़दम आगे बढ़ता नहीं,जोशीले नारों से क्या होगा,

पृथ्वी पर प्रकाश फैला न सके,सितारों से क्या होगा।

रचनात्मक काम ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए,

अन्यथा कार्यकर्ताओं की लम्बी कतारों से क्या होगा।।

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श्रम करोगे तो तिल से तेल निकाल पाओगे

हिम्मत होगी तो कष्टों को झेल पाओगे

कर्मों के खेल का मैदान है यह ज़िंदगी

जीवन के मैदान में उतरकर ही खेल पाओगे

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मोती को पाना है तो तट को छोड़ना पड़ेगा

जल में उतर ताल से निज को जोड़ना होगा

मात्र ज्ञान से ही जीवन की गहराई नहीं दिखती

ध्यान की ओर भी स्वयं को मोड़ना होगा

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अभिमान टिकता नहीं, मिटते देर नहीं लगती

नमक के पुतले को गलते, देर नहीं लगती 

घमंड तो लंका के राजा रावण का भी नहीं रहा 

सोने की लंका को भी जलते देर नहीं लगती

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(प्रतिध्वनि में संकलित) 

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