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श्रेय न चुराएँ

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

कुछ भी होना या न होना हर इंसान के अपने भाग्य या ईश्वर की कृपा अथवा स्व कर्म पर निर्भर होता है। हर आदमी किसी न किसी कामना के साथ जगता है और कामना पूरी होने के लिए हरसंभव प्रयास करता है।

जब तक इच्छापूर्ति नहीं हो जाती है तब तक वह हरसंभव प्रयासों में लगा रहता है। काम हो जाने पर खुश होता है और नहीं होने की स्थिति में नैराश्य ओढ़ लेता है।

दुनिया में जो लोग आए हैं उन सभी के साथ यह होता रहा है। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो हर हाल में खुश रहते हैं और सुख-दुःख दोनों स्थितियों में सम हुआ करते हैं। अपने-अपने भाग्य और कर्म पर भरोसा रखने वाले लोगों के काम होने या न होने की बातों को एक तरफ छोड़ कर देखें तो इंसानों का एक वर्ग ऐसा है जो किसी के लिए न कुछ कहता है, न करता है बल्कि इस वर्ग में शामिल लोग हमेशा इसी फिराक में लगे रहते हैं कि कैसे किसी भी काम का श्रेय लूट लिया जाए।

ये लोग सच को सच अथवा झूठ को झूठ नहीं कह सकते, जैसा देस वैसा भेस बना लेते हैं और हर रंग में रंग जाते हैं। पूरी दुनिया में काफी संख्या ऐसे लोगों की है जो कि हर काम का श्रेय लेने के लिए लपकते ही रहते हैं, भले ही कार्य संपादन या प्रेरणा संचरण में इनकी अपनी कोई भूमिका न हो।

सीधे तौर पर इस काम को तस्करी, डकैती या चोरी भी कहा जा सकता है। कोई सा काम अपने माध्यम से हो, उसका श्रेय लेने में कोई बुराई नहीं है, श्रेय मिलना ही चाहिए। इसके साथ ही कोई भी इंसान हमारे अपने लिए कुछ भी करे, उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी भी चाहिए।

लेकिन बहुधा लोग इसमें कंजूसी करते हैं। अव्वल बात यह है कि जो लोग सेवा और परोपकार की भावना से कोई काम करते हैं तब वे प्रतिफल या धन्यवाद की कोई कामना नहीं करते हैं बल्कि उन्हें यह अच्छा भी नहीं लगता कि कोई उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करे या एवज में कोई लाभ देने का मानस रखे।

दूसरी ओर बहुत सारे लोग हैं जो करते कुछ नहीं पर जब किसी का कोई काम बन जाता है तब आगे बढ़कर श्रेय पाने के लिए लपक पड़ते हैं और जताते ऐसा हैं कि जो कुछ हो रहा है, हुआ है वह सब उनकी मेहरबानी और मेहनत से ही हुआ है और इन्हें बरकरार रखने के लिए उनकी कृपा का बने रहना नितान्त जरूरी है।

इस किस्म के लोग दुनिया में और कुछ करें या न करें, इनकी निगाह उन सारे कामों पर हमेशा बनी रहती है जो होने वाले हैं अथवा हो सकते हैं। फिर जैसे ही कोई सा काम होता है, संबंधितों को फोन लगाने में तनिक भी देर नहीं करते कि अमुक काम हो गया है और हमारी वजह से हुआ है।

यह अपने आप में श्रेय लूटने से कम नहीं है। बिना कुछ किए बेवजह श्रेय प्राप्त करना अपने आप में चोरी है और जो लोग ऐसा करते हैं उनके प्रति परिचितों, सम्पर्कितों में हमेशा इस बात को लेकर अश्रद्धा बनी रहती है कि ये लोग काम-धाम या सहयोग तो कुछ करते हैं नहीं बल्कि बिना कुछ किए श्रेय पाने के लिए उतावले बने रहते हैं।

श्रेय चुराने वाले लोग भले ही अपने आपको कितना ही महान, समर्थ और प्रभावशाली समझते रहें, मगर हकीकत यही है कि समझदार लोग इन्हें खुदगर्ज और स्वार्थी ही मानते हैं और मन ही मन इन लोगों के प्रति अश्रद्धा ही दर्शाते हैं।

यह अलग बात है कि ऐसे लोगों के पद और कद को देखते हुए कोई भी इनके सामने कुछ कह पाने की हिम्मत नहीं रख पाता है। लेकिन मन में सब समझते हैं और उतना ही भाव देते हैं जितना देना चाहिए।

श्रेय उसी का लें जिसके संपादन में हमारी अपनी निजी भागीदारी हो, जिस काम में हमारा कोई योगदान न हो, उसका श्रेय लूटने की कोशिश न करें। यह अपने आप में व्यभिचार और पाप है और इससे हमारा अपना ही नुकसान होता है क्योंकि हर झूठ कुछ समय पश्चात अपने आप बेपरदा होता ही होता है।

 

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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