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नवरात्रि की कविताएँ

डाक्टर चंद जैन "अंकुर "

" वसुधैव कुटुम्बकम "
अब मुखौटों से बना विश्व का जनतंत्र है
हर शख्स है मैं से बना और एकता भी तंत्र है
धड़कन ह्रदय का रिक्त है हर एक चेहरा सख्त है
मृत्यु शय्या पर पड़ा अब मनुज का धर्म है
कौन सोचे सत्य का असत्य से जिव्हा बिका
जिस धरा पर हम खड़े है उसी को विष से सींचते
कब तक पियेगा शिव हलाहल
और विश्व के इस पाप को
कब तक सहेगा मातृ भू पुत्र संताप को
अब मुखौटों से बना विश्व का जनतंत्र है
हर शख्स है मैं से बना और एकता भी तंत्र है
चीखता है ये पुत्र मैय्या कैसा ये तेरा भक्त है
दानवता अट्टहास करता और देवयानी मस्त है
मिटटी का तो घट दिया जो शिव चेतना से रिक्त है
जल भरा है गंग का पर गंगोत्री विभक्त है
रक्तरंजित है धरा और धराशाही हर सक्श है
माँ कृपा कर पुत्र पर सुविचार का तू दान दे
तीसरे शिव द्वार पर शिव पुत्र को ही मान दे
अब मुखौटों से बना विश्व का जनतंत्र है
हर शख्स है मैं से बना और एकता भी तंत्र है
माँ मनुज मजबूर है तभी तो तुझ से दूर है
माँ गर्भ में शिवराज है फिर क्यों ये सब काज है
कुछ तो कर तू योजना ,शिव शंकर को बोल ना
हिमशिला का द्वार खोले हम खड़े है द्वार तेरे
नीलकंठंम ध्यानमग्नम तेरी योजना पर ध्यान दे
शिवपुत्र को ही जन्म दे जो हो ह्रदय जनतंत्र का
वसुधा बने तेरी सुधा रस एक घर बनें जनतंत्र का
वसुधैव कुटुम्बकम, वसुधैव कुटुम्बकम, वसुधैव कुटुम्बकम
डाक्टर चंद जैन "अंकुर "
रायपुर छ ग

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''सनातन''

कैलाश प्रसाद यादव

 

तू ही खेल रचाती है...

तू ही कर्म कराती मैय्या, तू ही भाग्य बनाती है,

सारी दुनिया तेरी महिमा, तू ही खेल रचाती है।

ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव, सबमें तेरी शक्ति माँ,

कभी तू गौरी, कभी कालिमा, नित नये रूप बनाती माँ।

तू ही शक्ति, तू ही भक्ति, विद्या और अविद्या है,

राम भी तू रावण भी तू ही, तू ही युद्ध रचाती है।

सूरज चंदा तेरे सहारे, सप्तऋषि और सारे तारे,

सारी सृष्टि उधर घूमती, तू करती जिस ओर इशारे।

आग में बाग लगाती मैय्या, सागर पीती बन ज्वाला,

पूजा पाठ की अग्नि तू ही, मधुशाला की तू हाला।

तू ने जन्मा सारे जग को, तू ही गोद खिलाती है,

कालचक्र का घुमा के पहिया, वापस हमें बुलाती है।

सारी दुनिया तेरी महिमा, तू ही खेल रचाती है।।

 

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किसविधि दर्शन पाउं माँ

अश्रुधार भरी आँखों से, किसविधि दर्शन पाउं माँ,

मन मेरे संताप भरा है, मैं कैसे मुस्काउं माँ,

कदम-कदम पर भरे हैं काँटे, उँची-नीची खाई है,

दुःखों की बेड़ी पड़ी पाँव में, किस विधि चलकर आउँ माँ।

अश्रुधार भरी आँखों से, किसविधि दर्शन पाउं माँ,

सुख और दुःख के भंवरजाल में, फंसी हुई है मेरी नैय्या,

कभी डूबती कभी उबरती, आज नहीं है कोई खिवैय्या,

छूट गई पतवार हाथ से, किस विधि पार लगाउं माँ।

अश्रुधार भरी आँखों से, किसविधि दर्शन पाउं माँ,

पाप-पुण्य के फेर फंसा हूं, मैंने सुधबुध खोई माँ,

अंदर बैठी मेरी आत्मा, फूट-फूट कर रोई माँ,

बोल भी अब तो फंसे गले में, आरती किसविधि गाउं माँ,

अश्रुधार भरी आँखों से, किसविधि दर्शन पाउं माँ,

पाप-पुण्य में भेद बता दे, धर्म कर्म का ज्ञान दे,

मेरे अंदर तू बैठी है, इतना मुझको भान दे,

फिर से मुझमें शक्ति भर दे, फिर से मुझमें जान दे,

नवजात शिशु सा गोद में खेलूं, फिर बालक बन जाउं माँ,

तू ही बता दे, किन शब्दों में, तुझको आज मनाउं माँ,

अश्रुधार भरी आँखों से, किसविधि दर्शन पाउं माँ,

 

''सनातन''

कैलाश प्रसाद यादव

96304 50031

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