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स्वाति तिवारी का आलेख - महिला कथा लेखन

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महिला कथा लेखन पर केन्द्रित इस मंच पर विषय की प्रासंगिकता के संदर्भ में उल्लेख करना चाहूँगी कि विश्व साहित्य में दो हजार तेरह को महिला लेखन की सशक्त मौजूदगी को लेकर याद किया जायगा। अमेरिका से लेकर इंग्लैण्ड, कनाडा से लेकर न्यूजीलेण्ड तक में महिला लेखकों ने अपने लेखन को एक नई पहचान, नया आयाम एक नई ऊँचाई और एक खास नया अन्दाज भी दिया है। विश्व साहित्य के दो बड़े प्रतिष्ठित पुरस्कार / सम्मान इस वर्ष लेखिकाओं के सर का ताज बनें।

सदियों पहले हिन्दी कहानी का सिलसिला अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष में नानी - दादी की कहानी से शुरू होता है। बावजूद इसके हिन्दी कथा परिदृश्य की बात अगर हम करते हैं तो इसकी शुरूआत करीब एक सौ वर्ष पहले ही हो गई थी। माना जाता है कि आधुनिक हिन्दी कहानी की शुरूआत बीसवीं सदी की शुरूआत के साथ ही होती है। और यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि हिन्दी की पहली मौलिक कहानी एक स्त्री द्वारा ही लिखी गई थी और वह कहानी थी बंग लेखिका की "दुलाईवाली" कथा लेखन के इतिहास की शुरूआत इसी कहानी से होती है। किसी लेखक-सम्पादक ने लिखा है कि यह चौकाने वाला तथ्य है। पर मेरा मानना है कि यह चौंकाने जैसा कुछ नहीं है। बल्कि दावे के साथ कहा जा सकता है कि यदि पहला कवि वियोगी होता तो पहली कहानीकार कोई स्त्री होगी अमृता प्रितम ने लिखा है कि "जब बच्चे ने अपनी मासूम आँखों से पहली बार दुनिया के रंग और फूल-पत्ते देखें, चाँद और सितारे देखें, तो हैरत में आकर अपने बूढ़े दादा या नाना या दारी और नानी के गले में बाँहें डाल दी और दुनिया को जानने के लिए कितने ही सवालात पूछें, तो दादी नानी ने अपनी कल्पना में से और अपने तजुर्बात में से जो भी कहानी गढ़ कर सुनाई ------ वह दुनिया की पहली कहानी थी।"

कहानी स्त्री के साथ हर पल, हर जगह, हर तरह से साथ चल रही होती हैं, घट रही होती है और उसके अन्तस में किसी ना किसी प्रारूप में रच रही होती है----वही किसी बयान में, किसी केनवास पर या लोक गीत में, कागज पर उतरती हैं तो किसी कहानी का जन्म होता है।

ज्यादातर आलोचकों ने स्वतन्त्रता पूर्व के महिला कथा लेखन को नकारा या दोय्यम दर्जे पर रखा क्योंकि वह घर-परिवार-रिश्तों पर केन्द्रित रहा। यह सच हो सकता है कि वह अपने स्त्री के अपने दायरों के आसपास का लेखन था क्योंकि उसके अनुभवों का संसार घर परिवार-समाज तक केन्द्रित था। आलोचना की दृष्टि से कई महत्वपूर्ण कहानियाँ व लेखिकाएँ सिर्फ इसीलिए चर्चा में नहीं आ पायी। बावजूद इसके बीसवीं सदी तक आते-आते हम देखते हैं कि महिला कथाकारों की एक लम्बी श्रृंखला सामने आयी और उनमें से अधिकांश पुरूष कथाकारों के समकक्ष खड़ी दिखाई दी। किंतु यह स्वीकारना होगा कि स्त्री लेखन विशेषकर कथा साहित्य को बहुत सहज भाव से सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली साथ ही परिवार ने भी उसे महत्वपूर्ण मानते हुए स्वाभाविक मान्यता कभी नहीं दी उसे पुरूष रचनाकारों की तुलना में निचले पायदान पर रखा गया एवं उपेक्षा रूकनी पड़ी है। साहित्यिक दृष्टि से उन्हें कभी उल्लेखित या रेखांकित नहीं किया गया। साहित्यिक आयोजन या गोष्ठियों में भाग्रीदारी इतनी सरल या सहज नहीं थी आज भी उतनी नहीं है स्त्री की महत्वपूर्ण उपस्थिति को बदलते हुए देखा जा रहा है। अब स्थितियां उतनी और वैसी नहीं रही आज महिला कथाकार सजग और मुखर है। यह बदलाव एक लम्बी महिला कथाकारों की श्रृंखला के उस छोर से जहाँ दुलाई वाली शुरूआती कहानी है से लेकर गोमा हंसती हैं या तीन सहेलियॉ तीन प्रेमी तक आते - आते आया है क्योंकि बदलाव एक सतत प्रक्रिया है - इसी प्रक्रिया के चलते हम समकालीन हिन्दी कथा परिदृश्य तक पहुंचे हैं और विशेष रूप से आज मध्यप्रदेश की बात करेंगे।

हिन्दी कथा साहित्य का समकालीन कथा परिदश्य अत्यंत आशाप्रद और समृद्ध है। इस समय रमेश उपाध्याय, शिवमूर्ति, राजीव, अखिलेश, चित्रा मुदगल, नासिका शर्मा, ममता कालिया, सूर्यबाला, सुधा अरोड़ा से लेकर इंदिरा दागी या कविता, आकांक्षा पारे और शेखर मल्लिक तक कई पीढ़ियां सक्रिय हैं। जाहिर है, सभी अपनी अपनी तरह से समकालीन प्रश्नों व परिस्थितियों से वाद विवाद संवाद कर रहे हैं।

ये प्रश्न और परिस्थितियां क्या हैं। यदि केवल संकेत करें तो हैं - भ्रष्टाचार, भूमंडलीकृत समाज में सामाजिक मूल्य, पंजीवाद की लोलुप लीला, संकटग्रस्त गांव किसान, असंगठित श्रमिक, भयावह बेरोजगारी, विस्थापन, जल जंगल जमीन का युद्ध, सूखते संबंध और असुरक्षा आदि। दलित, स्त्री और आदिवासी विमर्श इन्हीं का अन्य रूप हैं। समकालीन कथाकार अपने अनुभव, अध्ययन व सरोकार के अनुसार रचनाओं के सूत्र चुन रहे हैं। और उनमें से अधिकांश पर्याप्त संवेदना व कलात्मक सुधड़ता के साथ उन्हें प्रस्तुत कर रहे हैं। यदि हम विचार करें तो इन रचनाकारों का समय सांस्कृतिक आपाधापी का समय है। अब इन्हें किसी महास्वप्न या यूरोपिया का सहारा भी नहीं है1 आदर्श और यथार्थ को दंगल भी अप्रासंगिक हो चुके हैं। समकालीन कथा परिदृश्य में किसी सपने को आकार देना एक कठिन चुनौती है।

इस परिदृश्य का महत्वपूर्ण पक्ष वह युवा पीढ़ी है जिसने प्राय: 2000ई. के आसपास से रचनात्मक हस्तक्षेप प्रारंभ कर दिया था। अब इस युवा या नई पीढ़ी से कुछ नाम उभर कर आ चुके हैं जो हमें आश्वस्त करते हैं। इन नामों ने इतिहास से उछलते प्रश्न रोके हैं, सांप्रदायिकता की मानसिकता का विवेचन किया है, राजनीति के चरित्र को परखा है। अल्पना मिश्र, विवेक मिश्र, वंदना राग, पंकज मिश्र, संजय कुंदन, रवि बुले, कविता, चंदन पांडेय, विमल चन्द्र पांडेय, पंकज सुबीर, नीलाक्षी सिंह, प्रत्यक्षा आदि ने कस्बों और महानगरों क ेनये समीकरणों की गाथा लिखी है। लिव-इन रिलेशन भी ऐसा ही समीकरण है, जिसने प्रेम व दांपत्य को नया स्पेस दिया है।

यहां मैं मध्यप्रदेश की उन महिला कथाकारों का अलग से नामोल्लेख करना चाहूंगी, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। बिना किसी औपचारिक अनुक्रम के, ये नाम हैं --कृष्णा अग्निहोत्री, मालती जोशी, सुषमा मुनीन्द्र, वंदना राग, उर्मिला शिरीष, स्वाति तिवारी, निर्मला भुराड़िया, आकांक्षा पारे, शरद सिंह, नीलेश रघुवंशी------। कृष्णा जी वरिष्ठ कथाकार हैं। उनकी आत्मकथात्मक कृतियां चर्चित रही हैं। कथ्य की बेलाग अभिव्यक्ति उनमें मिलती है। किसी समय मालती जोशी की रचनात्मक सक्रियता पर सबका ध्यान रहता था। अपनी गझिन संवेदना के लिए वे उल्लेखनीय है। सुषमा जी ने लम्बी कहानियां भी लिखी हैं और "शार्ट स्टोरी' भी। परम्परागत हिन्दी कथा-विधि की सुखद उपस्थिति उनमें है। वंदना संग्रह "यूरोपिया' विगत दो दशकों के बीच अत्यन्त उल्लेखनीय माना गया है। इतिहास बोध, सामाजिक विषमताओं के गर्भ में पैठने की ललक और शिल्प का टटकापन वंदना राग को जरूरी कथाकार बनाता है। उर्मिला जी रिश्तों के आत्मीय अंतरालों की द्रष्टा कथाकार है। मध्यवर्गीय जीवन पर उनकी विशेष पकड़ है। स्वाति तिवारी नई सामाजिक स्थितियों के बीच जी रहे मनुष्य के संघर्ष को व्यक्त करती है। स्त्री विमर्श का संतुलित रूप उनकी रचनात्मक परिपक्वता को दर्शाता है। वस्तुत: मन की भीतरी तहों में संजोए सच को वे कहानियों में चिंतित कर देती हें। निर्मला भुराड़िया का उपन्यास -----खूब पढ़ा गया। विसंगतियों को सहज भाषा में वे प्रकट कर देती है। छोटी छोटी कहानियों की नई उस्ताद हैं आकांक्षा पारे। वे सचमुच अपनी पीढ़ी की कहानियां लिखती हैं। शरद सिंह वरिष्ठ हैं और कई कहानी संग्रह, अनेक उपन्यास व बहुतेरे पुरस्कार उनके खाते में हैं। स्त्री विमर्श का एक बोल्ड रूप उनकी रचनाओं में खासकर प्रभावित करता है। नीलेश रघुवंशी का उपन्यास "एक कस्बे के नोट्स' आजकल चर्चा‍ में हे। मूलत: कवि नीलेश का गद्य बेहद रचनात्मक है और यथार्थ को देखने की उनकी दृष्टि मौलिक।

समग्रत: समकालीन कथा परिदृश्य नई पठनीय कहानियों व उपन्यासों के लिए उल्लेखनीय है। अभी तो इसमें कई रंग भरे जाने बाकी हैं।

इस तरह समकालीन कथा साहित्य के लिए हम कह सकते हैं कि यह वह कथा समय है जिसमें महिला कथाकारों की एक सक्रिय पीढ़ी सशक्त लेखन व्दारा अपने कृतित्व को रेखांकित करवा रही हैं तो एक नयी पीढ़ी उभर कर आगे आना चाह रही हैं। मैं पूरे विश्वास से यह बात कहती हूं कि आज का कहानी समय कहानी के विकास की गति को तेज और विविध आयामी बनाए हुए हैं।

कहानी जितने विपुल परिमाण में लिखी जा रही है उसके सम्यक परीखण, मूल्यांकन, निष्ठा और निरन्तरता के साथ पाठक को उपलब्धता को भी हमें देखना होगा।

समकालीन हिन्दी कहानी की एक बड़ी खूबी "तात्कालिकता'' वह अपने समय की गंभीर चिन्ताओं, समस्याओं, ज्वलन्त प्रश्नों को तत्काल जिज्ञासा से ग्रहण कर गंभीर विमर्श के रूप में प्रस्तुत करती है जैसा इंदिरा दांगी की कहानी लिव इन सेकण्ड, भोपाल की घटना पर केन्द्रित है। वन्दना राग की ताजा कहानी हिजरत से पहले नक्सलाइट समस्या पर केन्द्रित है। उर्मिला शिरीष की कहानी ---- मध्यप्रदेश में चिकित्सा विभाग के भ्रष्टाचार की खबरों से बनी है। स्वाति तिवारी की मेरी अपनी कहानी "स्त्री मुक्ति का यूरोपिया' उस स्त्री पर केन्द्रित है जो स्वतंत्रता के नाम पर स्त्री मुक्ति के एक ऐसे आधुनिक यूरोपिया में जकड़ी है जहाँ ना परिवार हैं ना नपैतिकता के कोई अर्थ "कहानी का सार यह कि ऐसा भी क्या घर जहाँ पति पत्नी घर के ताले की चाबी भी शेयर नहीं करते। उनके निजना और स्वायत्तता के चलते बेडरूम भी अलग-अलग हैं जो घर के नाम पर मात्र एक सजा धजा एड्रेस शेयर करते हैं उनका इकलौता बेटा उसी शहर के बो‍र्डिंग स्कूल में और बुजुर्ग पिता ओल्ड एज होम में हैं।'' महानगरों की समस्या पर केन्द्रित है सुषमा मुनिन्द्र की कहानी।

ये कहानियां समाज और जीवन का ईसीजी होती जा रही है। समकालीन कहानी में यह परिभाषा निरन्तर चरितार्थ हो रही है। समकालीन कहानियां अपने समय से मुठभेड़ कर उसमें बड़े सार्थक ढंग से हस्तक्षेप कर रही है।

इन लेखकों ने हिन्दी कहानी को साहित्य की ललित विधा से एक गंभीर चिन्तर की विधा में रूपान्तरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है आज कहानी एक गंभीर बौद्धिक विमर्श की विधा के रूप में स्थापित हुई है। अब कहानी की चिन्ताएँ और भी व्यापक व गहरी हैं।

भूमण्डलीकरण की तीव्र प्रक्रिया में समाज का, हमारा निरन्तर अमेरिकीकरण, बाजारवाद, उपभोक्तावाद विज्ञापन का मॉडलिंग का मायाजाल, मनुष्यता का निरन्तर क्षरण, घटते जीवनमूल्य आदि प्रश्नों पर विस्तार से व्यापकता के साथ कहानी को रचा जा रहा है।

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