शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

चन्द्रलेखा की कविताएं

कविताएँ  

1.  बरस रहा है मेघ ...

 आसमान का चूल्हा ये

जलता नहीं है आज क्यों ?

इसे भी मंहगाई ने

बुझा दिया है क्या ?

 

सदियों से चल रहा इन्सान

पहुंचा नहीं क्यों मंजिल तक?

उसे भी किसी ने पता

गलत दिया है क्या?

 

खिड़की से बाहर चुपचाप

बरस रहा है देखो मेघ

अपनी रचना की दुर्गति में

ईश बहाता है अश्रु क्या 

 

 

    ----------------------

 

2. बहुत अच्छा है 


 प्रेमदयात्याग,बलिदान 
सौन्दर्य और  ममता की,

मूर्ति ही समझा गया उसे

निश्चित रूपरंग औ’ गुणाकार की

सिर्फ मूर्ति  समझा गया 
अच्छा है...   बहुत अच्छा है...

इस बहाने उसे

पूज तो लिया जाता 

कम से कम  

झुक जाते सर ,कभी न झुकने वाले 
उसी मूरत के सम्मुख 
अच्छा है 
बहुत अच्छा है 
सिर्फ मूर्ति  ही समझा गया, और

मूर्ति में शब्द नहीं होते

भावनाएँ उसमें नहीं होतीं

ये तो पाई जातीं उनमें

रचा जिन्हें ईश्वर ने

ईश्वर की उसी रचना ने 

 

मूर्ति को गढ़ा है जिसे वह 

निहारतासहलाता,सराहता,सजाता है

 दुलारकर,खेलता 

यहाँ-वहाँ रख देता है

जब-तब खोलता, फिर-फिर  ढांपता है 

मोहित हो कर भोगता 

और पशु-सा उसे फिर 

नोचता और खसोटता है

जी उब जाता उसका जब 

झट तोड़ एक नई मूर्ति

वह फिर से गढ़ लेता है

 

इन्सान से  पशु बनते

देर नहीं लगती जब 

औरत का मूरत ही बने रहना

अच्छा है  … बहुत अच्छा है...

 

 

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    @ चंद्रलेखा 

 

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