शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

कुछ नहीं होगा याद करने से

 

डॉ0 दीपक आचार्य

 

आज का दिन कई मायनों में अहम है। आज महात्मा गांधी एवं लालबहादुर शास्त्री जयन्ती है। दोनों महापुरुषों से हम सब परिचित हैं। इनके व्यक्तित्व और कर्मयोग की अमिट छाप हर दिल में है।

महापुरुषों के वचन, उपदेश और कर्म केवल स्मरण करने के लिए नहीं है। न ही उनकी जयन्ती या पुण्यतिथि कोई से आयोजन कर लेने तक ही सीमित है।

महापुरुषों का स्मरण कर लेना ही काफी नहीं है बल्कि यह जरूरी है कि उनका स्मरण करते हुए उनके व्यक्तित्व और कर्मयोग की सुगंध के कतरों से हम अपने आपको महकाएं, उनकी परंपराओं और श्रेष्ठ कर्मों का अनुसरण करते हुए जगत को नई दिशा-दृष्टि दें, सर्वत्र लोक मंगल की धाराओं और सामुदायिक विकास की उपधाराओं का प्रवाह और अधिक तीव्रतर करने में भागीदारी निभाएं और ऎसा कुछ करें कि इन महापुरुषों की बनाई परंपराएं और अधिक मजबूती प्राप्त करें।

हम सभी लोग अब परंपरा निर्वाह को अपने जीवन की निरन्तरता मान चुके हैं और एक बंधे-बंधाये ढर्रे के अनुरूप सब कुछ करने लगे हैं। औपचारिक परंपराओं के अनुरूप चलते हुए हम सभी लोग उस दिशा में जा रहे हैं जहाँ हमें कुछ करना नहीं है, न हमारे भीतर वो माद्दा बचा रह गया है जो कि उन लोगों में था जिन्होंने इतिहास बनाया है।

न हम पुरखों की बराबरी कर पा रहे हैं, न उनसे आगे बढ़ने या लम्बी लकीर खींचने का कोई दम ही हम में अब रहा है। हर नए युग में पैदा होने वाले इंसान का दायित्व है कि वह पुराने युग से कुछ नया करें, कुछ नया जोड़े और इस प्रकार हर युग में विकास का नवीन परिदृश्य सामने आ सके।

चारों तरफ बहुत कुछ हो रहा है लेकिन यह सब कुछ भौतिकता की भेंट चढ़ा हुआ है। पदार्थ की दुनिया अब हमारे लिए सर्वोपरि हो चुकी है और हर कोई चाहता है कि पदार्थ उसके कब्जे में रहें और उसे हमेशा पदार्थों का स्वामी स्वीकारा जाता रहे ताकि उसकी अहमियत मालिक या अधिनायक के रूप में बनी रहे जहाँ दूसरे लोग उसकी अधीनता स्वीकार करते हुए उसके आस-पास बने रहें या उनका दर्जा ऊपर नहीं हो जाए।

बात हमारे अपनों की हो, पुरखों की हो या फिर देश-दुनिया के किसी भी अनुकरणीय व्यक्तित्व की। हर मामले में हमारा रवैया यादों को ताजा कर दिए जाने का हो गया है यह हमारे लिए ठीक नहीं कहा जा सकता।

अवसर कोई सा हो, हर अवसर कुछ संदेश देने के लिए आता है और यह संदेश केवल कानों के आर-पार होने के लिए नहीं है बल्कि हृदय में उतरने के लिए है ताकि मन के स्तर पर इसका मंथन हो सके, मस्तिष्क इसके औचित्य और अनुभवों के आधार पर कुछ निष्कर्ष निकाल सके और ऎसा कोई संकल्प लक्ष्यबद्ध होकर सामने आए कि जिससे हमें श्रेय भी प्राप्त हो और हम संसार के लायक कुछ करके जा सकें।

महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री जयन्ती का यह दिन हमारे जीवन में सिद्धान्तों, आदर्शों, नैतिक मूल्यों और संस्कारों के पुनर्जागरण और प्रतिष्ठा के लिए कुछ करने का दिन है जब हम अपने भीतर विद्यमान इंसानियत के बीज तत्वों को अंकुरित होने का अवसर दें, पल्लवित करें और अपने व्यक्तित्व को आदर्शों के साँचे में ढालकर राष्ट्रीय चरित्र सम्पन्न व्यक्तित्व का निर्माण करें।

हम सभी लोग साल भर में कई-कई बार महात्मा गांधी, लालबहादुर शास्त्री एवं दूसरे महापुरुषों का किसी न किसी बहाने स्मरण करते रहते हैं लेकिन वह केवल औपचारिकता निर्वाह मात्र से अधिक कुछ नहीं होता।

बहुत सारे लोग हैं जो इनका स्मरण करते हैं लेकिन इनका स्वभाव, कार्यशैली और व्यवहार इनसे एकदम भिन्न होता है। सच कहा जाए तो इन लोगों को महापुरुषों का नाम लेने या भारतमाता की जय बोलने का कोई हक नहीं है।

जो कुछ करें पूरी ईमानदारी से करें, मन से करें और निष्कपट भाव से करें। इस मामले में दोहरा चरित्र न रखें। मुखौटा या बहुरूपिया संस्कृति छोड़ें। सीधा, सरल और स्पष्टवादी जीवन अपने आपको सादगीपूर्ण जिन्दगी प्रदान करता है और यही सादगी प्रत्येक महापुरुष का आरंभिक लक्षण है। 

बातें ही बातें करते रहने की बीमारी से बचें, जो कुछ करना है वह अपने हाथों करें, पहले स्वयं को सुधारें और फिर जमाने को सुधारने की सोचें। आज हममें से हर इंसान अपनी बुराइयों का खात्मा करने की सोच लें, अपने आपको शुद्ध-बुद्ध और प्रबुद्ध बना ले, हर इंसान दूसरे के काम आए और प्रत्येक जीव जगत को अपना मानकर जगत व्यवहार को दिव्य एवं परोपकारी बना ले तो हमें किसी के अनुकरण की कोई आवश्यकता नहीं।

दूसरों के अनुकरण से ज्यादा अच्छा यह है कि हम ऎसा कुछ करें कि दुनिया हमारा अनुकरण करे। अवसर कोई सा हो, किसी को भी याद कर लेना नाकाफी है।

कोशिश यह करें कि हम महापुरुषों और श्रेष्ठ परंपराओं का अनुगमन करते हुए आगे बढ़ते रहें, दुनिया के लिए जीने का माद्दा पैदा करें और ऎसा कुछ करें कि हमारे जाने के बाद भी लोग हमें याद करते रहें, हमारी कमी महसूस हो, और हमारे बताए मार्ग और कार्यों पर चलते हुए हरेक को दिली सुकून का अहसास होता रहे।

जो कुछ अच्छा है, अनुकरणीय है उसे हृदय से स्वीकारें।

आईये गांधीजी एवं शास्त्रीजी के जीवन से प्रेरणा पाएं और सिद्धान्तवाद पर चलकर स्वाभिमानी जीवन जीने की कोशिश करें। कम से कम एक आदर्श इसी साल से अपनाने की शुरूआत तो कर लें।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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