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अमित शाह का आलेख - काम करके दिखाना है तो ई. श्रीधरन बनिए

काम करके दिखाना है तो ई. श्रीधरन बनिए
सरकारी कामकाज को लेकर ढिलाई आम बात है। चाहे वह विकास के काम हो या किसी के व्यक्तिगत। कुछ काम समय पर होत भी है, लेकिन उसके लिए बाहरी रूप से दबाव बनाना पड़ता है। रसूखदार बनना पड़ेगा या उसके पास जाना पड़ेगा। जबकि हम ठंडे दिमाग से सोचे तो काई भी काम करना मुश्किल है। विशेषकर सरकारी तंत्र से जुड़े। उसके लिए निश्चित समय सीमा हो सकती है। 
क्योंकि सरकारी कामकाज में तय प्रोसेस के अनुसार चलना जरूरी होता है। हम इसी संदर्भ में बात करेंगे ई. श्रीधरन की। शायद, यह नाम जो भी लेख पढ़ रहे हैं वह जानते होंगे। मेट्रो मैन आॅफ इंडिया के नाम से मशहूर डॉ. ईलाट्टूवालापिल श्रीधरन को ही ई. श्रीधरन कहा जाता है। 

1932 में जन्मे श्रीधरन 1990 को रिटायर हो चुके थे। लेकिन उनमें काम का जुनून था। वह भारत में रेलवे को ऊंचाइयों पर पहुंचाना चाहते थे। तभी उन्होंने रिटायर के बाद भी दिल्ली मेट्रो जैसे बड़े प्रोजेक्टर को सफल पूर्वक काम किया। उनकी बात हमेशा सरकार और रेलवे डिपार्टमेंट को गौरवांवित महसूस कराती है। रामेश्वरम से तमिलनाडु को जोड़ने वाला पंबन पुल ज्वार की चपेट में आने से 1963 को बह गया था। सैकड़ों लोगों की जान चली गई। रेलवे विभाग ने इसकी मरम्मत के लिए 6 माह का समय दिया। क्योंकि यह अंग्रेजों के जमाना में बना था और पूरी तरह से जर्जर हो चुका था। फिर क्या था 31 वर्षीय श्रीधरन ऐसे जुटे कि पूरे पुल का काम 46 दिन में पूरा कर दिया। इसी काम ने उन्हें पूरे देश में पहचान दिलाई। काम के प्रति लगन ओर जोशी को सफलता का सूत्र मानने वाले श्रीधरन काम करने की सीख देने की मिसाल है। उन्होंने रिटायर के बाद कोंकण रेलवे का काम किया। यह मुंबई-कोच्ची को जोड़ता है। इस दूरी में बहोत बड़े-बड़े पहाड़ है। उस दौरान रेल मंत्री रहे जॉर्ज फर्नाडीज ने भी इस प्रोजेक्ट के लिए हाथ खड़े कर दिए। रेलवे के आला अधिकारी भी इस काम को असंभव बताने लगे, लेकिन श्रीधरन रिटायर के बाद भी मानने वाले कहा था। 

उन्होंने अपनी टीम के साथ इस काम को सात साल में पूरा कर दिया। इसी वजह से आज मुंबई-कोच्ची की दूरी एक तिहाई कम हो गई। श्रीधरन को एक अजीब सी सनक थी, वह हर काम को समय से पहले पूरा करके चैन की सांस सोते। उनका काम को सफल बनाने का मुख्य मोटो समय और काम के प्रति प्रतिबद्धता, लोगों को काम करने के लिए उत्साहित करना और अच्छे काम के लिए पुरस्कृत करना था।


दूसरी बात यह भी है कि ऐसा नहीं है कि श्रीधरन को काम करने में कोई समस्या नहीं आई हो। कभी राजनीतिक दबाव तो कभी भूमि अधिग्रहण के दौरान भी विरोध झेलना पड़ा, लेकिन वह अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटे और तय सीमा के पहले ही काम को अंजाम दे दिया। यह तो महज उनके कुछ उदाहरण है। हमें देश के विकास के लिए इसी तरह के काम की जरूरत है। यदि समय सीमा पर ईमानदारी से काम किया जाएगा तो कोई काम मुश्किल नहीं होता है। बस सबके साथ मिलकर समय सीमा में काम करने का जज्बा होना चाहिए। हमारा सरकारी और राजनीतिक तंत्र तो बना ही ऐसा हुआ है कि दबाव और धमकियां मिलना आसान है। इसका मुकाबला इच्छा शक्ति के बिना असंभव है। श्रीधरन को इस काम के दौरान कई निजी कंपनियों ने बड़े-बड़े ऑफर भी दिए, लेकिन वह सरकार के साथ मिलकर देश के लिए कुछ करना चाहते थे।


श्रीधरन की सोच ही भ्रष्टाचार को कम कर सकती है। बड़े-बड़े वेतन पर बैठे अधिकारी जब छोटी-छोटी रकम के लिए काम अटकाते है तो यह हमारा नहीं पूरे देश का दुर्भाग्य है। सरकार आपको टूर का, निवास का, वाहन का यानि कई पदों में बच्चों की पढ़ाई तक का खर्चा भी वहन करती है। इसके बाद भी एक टेबल से दूसरे टेबल पर फाइल पहुंचाने के लिए आम लोगों को कई परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। 

हालांकि भ्रष्टाचार और काम करने के जज्बे में अलग-अलग सोच हो सकती है। कोई व्यक्ति भ्रष्ट तंत्र से जुड़ा होने पर भी काम का हौसला रख सकता है। इच्छा शक्ति मजबूत रख सकता है और समय सीमा में काम भी कर सकता है। लेकिन अभी के हालात विपरीत है। हमारे यहां कहावत है ‘न घर के और न घाट के’। कई मर्तबा पैसा देने के बाद भी काम नहीं होते। ईमानदारी की अपेक्षा तो कहीं दूर की बात है। खैर, हम वापस काम की गति पर आते है। सरकार के कई प्रोजेक्ट देरी से चल रहे है। छोटी-छोटी अड़चनों पर अधिकारी काम को बीच में ही छोड़ देते है। जबकि इन्हें इन मुसीबतों के खिलाफ लड़कर काम को सही अंजाम देने की जरूरत है।


- अमित शाह, लेखक एक राष्ट्रीय अखबार में युवा पत्रकार है।
(यह लेख दिल्ली मेट्रो की शुरुआत के दौरान ई श्रीधरन द्वारा दिए गए इंटरव्यू के आधार पर लिखा गया है।)

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