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हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन का व्यंग्य - प्लीज , मेरा भी अवार्ड वापस ले लो

बड़ी लम्बी कतार थी वह। कम होने का नाम ही नहीं बल्कि बढ़ते ही जा रही थी वह कतार। उसे नहीं मालूम था किस बात के लिए लगी है यह। वह भी हर बार की तरह शामिल हो जाना चाहता है। जल्दी पा लेने के लालच में बीच में घुस जाने का निरर्थक प्रयास भी किया। हरेक मर्तबा ढकेल दिया गया पीछे की ओर। हर बार की तरह , किस्मत आजमाने के लिए सबसे आखिरी की ही जगह सुरक्षित मिली उसे। सीना तान उसी तरह खड़ा हो गया जैसे कोई तीर मारने के लिए खड़ा हुआ हो। आज से नहीं वह तो जन्म जन्मांतर से अपनी किस्मत आजमा रहा था , परंतु हाय रे किस्मत , इतनी बेवफा ......। हर बार चुचवाते लौटता था वह। फिर भी हरेक लाइन की शोभा बढ़ाने की जिद और कुछ पा जाने की आस ने फिर खड़ा कर दिया उसे।

बहुत संतोषी था वह। “ चलो कतार का हिस्सा तो बना “ यही सोचकर खुश रहता था। उसे तो मालूम भी नहीं था कि ये कतार किसलिये लगी है ? पर उसने सूट बूट , झकाझक धोती कुरता और महंगे जींस में कतार में खड़े लोगों को देखा तो , खड़े हो जाने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। कतार में लगते ही , सामने खड़े सज्जन से पूछा – भइया किस बात की लाइन लगी है ? क्या मुफ्त में कोई बड़ी चीज बांटी जा रही है ? वह सज्जन हंसा ....। तू क्या करेगा इस कतार में लगकर। मुझे समझना नहीं है .... .. मुझे सिरीफ दो किलो अरहर की दाल और एकाध किलो प्याज ही चाहिए , बड़े दिनों से खाना तो दूर देखा तक नहीं। वह सज्जन खूब हंसा .......। अरे मूर्ख यह कतार मांगने के लिए नहीं देने के लिए है। देने के लिए ..? पर आप तो कागज के अलावा कुछ नहीं रखे हैं आप क्या देंगे ? अरे उन्हे वही वापस देना है जो वस्तु उन्होने कभी हमें दी थी। पर क्यों भइया ? क्योंकि वह हमारे लोगों के साथ न्याय नहीं कर रही है , हम उनकी दी हुई वस्तु इसीलिये वापस करना चाहते हैं। पर मुझे तो आज तक कुछ नहीं मिला , मैं क्या वापस करूंगा – सोचने लगा वह। उसे याद आया , कुछ बछर पहले किसी ने मुझे चुनाव के वक्त पैसा दिया था , पर मै उसे कैसे वापस कर सकता हूं ? वह तो उसी समय खर्च हो गए थे। वह उधेड़बुन में लगा रहा। समझने की कोशिश करने लगा कि लोग क्या वापस कर रहे हैं। बच्चों की तरह ताली बजाया , समझ गया , क्या वापस करना है। सामने खड़े सज्जन ने झिड़क दिया , तब उसने बताया कि वह भी अपना वही चीज वापस करेगा , जो इन लोगों से मिला है। सज्जन ने पूछा – वैसे तुम क्या वापस करने वाले हो ? वह बोला - सारे लोग मंच पर जाकर घोषणा कर रहे हैं। पहले से बताकर क्यों लीक करूं ?

बड़ी देर तक वहीं खड़ा रहा। सामने के अनेक सज्जन बदल गए और अपना काम कर लौट गये थे। वह वहां से इंच भर भी नहीं बढ़ा। उसे लगा उसके पीछे बड़ी लम्बी लाइन लग चुकी होगी , पीछे टटोल कर देखा , कोई नहीं था। हर बार की तरह वह फिर जान गया कि , वही इस कतार का अंतिम व्यक्ति है। खैर अपनी बारी का इंतजार करता रहा वह।

इस बीच सर्च भी कर रहा है वह कि , कौन - क्या लौटा रहा है ? ध्यान से देखने लगा। वह नामी उद्योगपति था , जिसे पिछले कुछ वर्ष पूर्व उद्यमिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मान मिला था। अपने सम्मान को लौटाने आया था वह। ताम्र पट्टिका समेत मिली हुई मोटी रकम लौटाते हुए बताया कि , सरकार उद्योगपतियों के हितों की अनदेखी कर रही है , हमारे उद्योगपति भाई उद्योग छोड़ , केवल पति रह गए हैं। अब उनकी कमाई को स्विस बैंक में जमा करने नहीं दिया जा रहा है , समय पर टैक्स भरने का भारी दबाव बनाया जा रहा है। मैं ऐसी सरकार के इन कार्यों की भर्त्सना करते हुए विरोध स्वरूप अपना सम्मान वापस कर रहा हूं। खूब तालियां बजी।

बहुत बड़ा खिलाड़ी था वह। खेल के मैदान का कम , किसी और मैदान का अधिक। खूब पैसा और शोहरत बटोर चुका था। खेल से रिटायर होते होते सरकार ने खेल रत्न दिया था – वही वापस कर रहा था। उसने अपने वक्तव्य में बताया कि – सरकार कैसे शोषण कर रही है खिलाड़ियों का। किसी खिलाड़ी का भविष्य सुरक्षित नहीं। हमारे इनाम पर इनकम टैक्स के द्वारा नजर रखी गयी है। हमें ड्रग्स के बिना खेलने पर मजबूर किया जा रहा है , ताकि हम पदक न जीत सकें। मैं सरकार के देश विरोधी कार्यों की निंदा करता हूं और विरोध स्वरूप सम्मान वापस कर रहा हूं।

साहित्यकार था वह। अनेक बार कवि सम्मेलनों और साहित्यिक आयोजनों में इनकी भागीदारी देख चुका था वह। उसने अपना वक्तव्य कुछ इस तरह दिया – देश में इतनी अराजकता कभी नहीं देखी हमने। ईश्वर ने भी हमें ऐसे दिन दिखाने के पहले उठा क्यों नहीं लिया ? हमारी बातें नहीं सुनी जा रही , न प्रशंसा करने दिया जा रहा , न चाटुकारिता। हमारे लोग सुरक्षित नहीं है , वे कभी भी , कहीं भी , किसी भी संसदीय आतंकी का शिकार हो रहे है। सरकार में बैठे लोग स्वयं सुरक्षा के कड़े घेरे में घूमते हैं , हमारे तो मरने के बाद भी हमारे हत्यारे ढूंढे नहीं जा सक रहे। मैं ऐसी निकम्मी सरकार की आलोचना करते हुए सम्मान राशि समेत प्रमाण पत्र वापस करता हूं।

उसका नम्बर आएगा , तब क्या वापस करेगा ? वह भी सोच चुका है। परंतु दिन पर दिन बीतते गए। उसका नम्बर नहीं आया। अब महीने भी निकलने लगे , साल बीतने की बारी आ गयी। साल भी बीत ही गया। वह लाइन में लगा अपनी बारी का इंतजार करते करते थकने लगा था। तभी वह घड़ी भी आ गयी , पर पूरे पांच बछर बीत चुके थे तब तक।

आज उसकी बारी थी। पर यह क्या ? मंच पर चढ़ने नहीं दिया गया उसे। क्या आपने कोई अवार्ड जीता है ? आपको देखकर तो ऐसा लगता ही नहीं कि , आपको किसी ने सम्मानित किया हो कभी। क्यों , मंच पर आने की कुचेष्टा कर रहे हैं आप ? वह बोला - आपके दिये अवार्ड को मैं भी वापस करना चाहता हूं जनाब। धीरे से किसी ने कहा – हो सकता है भूले भटके दे दिये होंगे , पर वह उस अवार्ड के साथ दिये गए राशि को कतई वापस नहीं कर पायेगा। आने दो मंच पर। बोंबियाने दो। राशि वापस करने के समय छीछालेदर होगी तब पता चलेगा। मैं कौन हूं , यह परिचय देने की आवश्यकता नहीं है , क्योंकि पूरे पांच साल में एक बार पहचाना जाता हूं मैं। मैं आदमी हूं , जिसे तुम लोगों ने जनता अवार्ड दिया है , उस अवार्ड के साथ खूब सारे सम्पत्ति जैसे भूख , गरीबी , बेकारी और लाचारी दी है। मैं यह सब इसलिये लौटाना चाहता हूं क्योंकि तुम लोग पिछले कितने दशक से हमें बेवकूफ बना रहे हो। भेड़ बकरी की तरह मरने वाले मेरे जैसे ही भाई हैं , जिन्हे तुम लोगों ने जनता अवार्ड से नवाजा है। तुम्हारे राज में , न हम तब सुरक्षित थे न आज हैं। सम्मान लौटाने वाले मेरे भाइयों का शुक्रगुजार हूं , जिनकी वजह से मुझे भी अकल आ गयी। बहुत हो चुका , अब मैं थक चुका हूं - तुम्हारे दिए जनता अवार्ड को सम्हालते सम्हालते। प्लीज मेरा अवार्ड वापस ले लीजिए , ताकि मैं भी , अवार्ड वापस करने वाले अन्य अवार्डी भाई की तरह अपने नाम का डंका बजा सकूं।

सभी को अपने लच्छेदार शब्दों में जवाब देने वाले सरकारी नुमाइंदे में से किसी के पास इन बातों का जवाब नहीं था। कानाफूसी शुरू हो गयी। इसने यदि यह सम्मान वापस कर दिया , तब ... हमारे भविष्य का क्या होगा। कौन आने वाले पांच साल के लिए जनता अवार्ड अपने पास रखेगा ? तभी .............धीरे से किसी ने , उस आदमी के टूटे हैंडल वाले झोले में पांच किलो चावल , एक किलो अरहर की दाल डाल दी , और कहा - हम जब तक जिंदा हैं , तुम्हे निर्बाध मिलता रहेगा यह सब। भरे थैले ने उस आदमी को , भूख से बिलबिलाते बच्चे का रूदन चेहरा सुरता करा दिया। उदुप ले बोंबियाना बंद हो गया , हर बार की तरह , वह फिर शांत हो गया।

झोले के पेंदी में न जाने किसने छेद बना दिया। मंच से उतरते – उतरते ही झोला खाली होना शुरू हो गया। घर आते ही पत्नि ने पूछा – वापस कर आये न अवार्ड। जो मिलता था , वह भी नहीं मिलेगा। पति ने झोले की तरफ इशारा किया। झट खोलकर देखा – चावल और दाल के कुछ दाने , हड़िया कस सीथा लटका मिला। पर अब क्या ? एक बार फिर छला गया वह। नयी सरकार बन गयी। वह आदमी , जनता अवार्ड माथे लेकर , सिर धुन रहा है। लाइन लगाते रहा। पांच बछर बाद मौका मिलता रहा। जनता अवार्ड लौटाने , हर बार गुहार लगाता रहा , पर आज तक , न ही अवार्ड , न उसके साथ पायी भूख , गरीबी , बेकारी , बदहाली और तंगहाली जैसी सम्पत्ति को लौटा पाया।

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा

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