गुरुवार, 15 अक्तूबर 2015

राजेन्द्र नागदेव की कविताएँ

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यात्रा
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कहीं निकलने के दिन जब बूढे हो चुके
और रातें कोलतार से अधिक काली घनी
एक आदमी यात्रा पर निकल गया

वह उस समय के अंदर चलता चला गया
जहाँ के परिचित चेहरे
घुल कर नदी में बह गए थे
या मिट्टी के लौंदे बन
चाक पर घूमते-घूमते
दूसरे चेहरों में ढल गए थे

कुछ सूखी पर महकती यादों की पंखुडियां
नीम की दो-चार कड़वी पत्तियाँ जेब में
और पुराने दालान में खड़े पीपल और बरगद
जिन्हें दशकों तक बोन्साई में बदल कर
रख लिया था उसने
वह जानता था
पूरा वृक्ष संकुचित कर सीमाहीन समय में रख लेना सहज नहीं होता
रखा उसने फिर भी 

कुछ घर नम्बर, गली नम्बर, बस्ती, कस्बा
और बहुत सारी धुंध भरी यादें

उसने मित्रों के कुर्ते,पाजामे,जाकेट,टोपियों की छायाएं तक
चिपका ली थीं पतों वाली पर्ची पर
उस विश्वास था समय के हथौड़े से पिट-पिट कर
चेहरों की हड्डियाँ बदली भी होंगीं
लिबास से पहचान लेगा,
काल का सरोकार देह से होता है
उसे ही तोड़ता- मरोड़ता
और ताबूत के आकार में ढालता रहता है वह निरंतर
काल को वस्त्रों से सरोकार उतना नहीं होता

थका हुआ आदमी बस्ती में पहुँचा जब
घर वही थे, घरों के अंदर चेहरे अलग थे
उसने पहचान लिया तब भी हर चेहरा
वह मग़र हर चेहरे के लिये अन्जान चेहरा था

उसने पुराना दर्पण देखा
उन चेहरों के बिम्ब अब तक अक्षत थे

सत्तर पार कांपती उंगलियों से छिटक चट्टान पर गिरा दर्पण

दर्पण की तरह टूटा आदमी
भूत से अब वर्तमान की यात्रा पर है
अत्यंत त्रासद, अत्यंत लंबी है वापसी,
पगडंडी जबकि वही।
           *                 *            *                *                *


         नई पुस्तक
           
       एक सौ तीसवें मील पर है
सच और यथार्थ की नई पुस्तक में मुसाफ़िर
मील के कई पत्थर अभी शेष हैं

नई कलम से नए पृष्ठों पर किसी ने
लिखे हैं वहाँ नए अक्षर

अनथकी देह पुस्तक के अंदर चल रही है निरंतर

मन और मस्तिष्क का अनिवार्य आदेश-
ठहरना मना है
ठहरने से विनाश संभव
आकाश का सुलग जाना
और तप्त राख का धरती पर बरस जाना संभव है
आल्हाद, मुस्कान, प्रेम
बुद्धि, कलम, तूलिका, मनुष्यता
राख में सबका दफ़्न हो जाना संभव,
एक सौ तीसवें को बत्तीसवें . . .  चालीसवें. . .
अंततः तीन सौ पचासवें में बदलना इसीलिए ज़रूरी है
ज़रूरी है अंतिम पड़ाव तक पहुँचना

हवा
भेदिये- सी दबे पाँव घुसी है घर में अभी-अभी
लालटेन की लौ थरथरा रही है,
कब्र के पत्थर- सी जड़ पुरातन आँखों से
परख रही है हवा नई पुस्तक की नई इबारत,
हवा निकलेगी तमतमाती बाहर
और तय है कल शहर की गलियों में जहर फैला होगा

विचार की हत्या संभावना नहीं
सच की हत्या संभावना नहीं
यथार्थ है

कल किसी देश में
किसी तरह जीवित रह गया कोई गैलिलियो
इस देश में आज सूर्य के ठीक सामने मारा जाएगा
और गोलियां तुरंत किसी जादू से हवा में घुल जाएँगी।
*                       *                        *

                         

                                                    राजेन्द्र नागदेव
                                                    डी के 2 – 166/18, दानिशकुंज
                                                    कोलार रोड
                                                    भोपाल- 462042
                            फोन 0755- 2411838 

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