शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

समीक्षा - जिन्दगी जीना कोई दीपक से सीखे : मुक्तक

समीक्षक : एम.एम.चन्द्रा

आधुनिक साहित्य में मुक्तक लिखने का साहस बहुत कम लेखकों में देखने को मिलता है किन्तु कुँवर कुसुमेश के इस साहस ने अपने नाम के अनुसार वरिष्ठता, शिष्टता, सरलता और मारक क्षमता के आधार पर मुक्तक लेखन की समझ को पाठकों के लिए सहज बना दिया है.

इस मुक्तक संग्रह की सबसे बड़ी खासियत यह है कि लेखक ने अपने अंदर जीवनरूपी समुद्र की गहराई और विस्तार को अनुभव ही नहीं किया बल्कि मुक्तक के माध्यम से पाठक की चेतना को भी उद्द्वेलित और प्रेरित करने का काम किया है.

आधुनिक समाज में जब मानवीय मूल्यों का क्षरण हो रहा हो तो ऐसे कठिन समय में कुँवर कुसुमेश के मुक्तक कम शब्दों में मानवता के उच्चतम मूल्यों को स्थापित करने की कोशिश करते हैं-

कब तलक डाले रहेगी रात डेरा

देखना इक रोज आयेगा सवेरा

जिन्दगी जीना कोई दीपक से सीखे

खुद जला पर दूर कर डाला अँधेरा

 

चुनावी राजनीति का शोर भारतीय जनमानस को विभिन्न प्रकार के अनुभव प्रदान करता है. चुनावी अनुभव जनता और नेता दोनों के लिए विरोधाभासी होते हैं-

उनकी मूछों पे ताव होता है

जब कभी भी चुनाव होता है

कान सुन सुन के पक गये मेरे

इस कदर कांव कांव होता है

 

पैमाने और मैखाने की जब भी बात चलती है तो कवि हरिवंशराय बच्चन और उनकी मधुशाला जरूर याद आती है. कुँवर कुसुमेश भी उसी परम्परा को आगे बढ़ाने वाले कवियों में एक हैं-

सब उसे लाजवाब कहते हैं

आप जिसको शराब कहते हैं

खुद भी आशिक हैं जानो-मीना के

वो जो इसको खराब कहते हैं

मैकदे के ही साथ-साथ चली

तेरी आँखों की जब बात चली

जाम क्या रिंद क्या मैखाने क्या

तुम चले, सारी कायनात चली

 

काले धन के सवाल पर न जाने कितनी सरकारें आती जाती रहीं हैं लेकिन भूख, गरीबी, बेरोजगारी जैसे बुनयादी मुद्दों से जनता को दूर करने में लगे नेताओं के मुखौटों को लेखक बखूबी उतारते हैं. काले धन की काली जुबानी और जुगाली में फंसे लोगों को आगाह करते हुए लेखक लोगों को सचेत करता है कि ये मसला सिर्फ हम लोगों को भरमाने के लिए है न कि बहस के लिए-

वो भी अमृत-सा नजर आएगा जो विष होगा

हरिक जगह पे कभी दैट कभी दिस होगा

मसला-ए-काला धन में शोर शराबा है बहुत

अंत में देखना है सब टांय-टांय फिस होगा

 

हिन्दी-उर्दू तहजीब के साझी विरासत और परम्परा को आगे बढ़ाते हुए लेखक उन कलमकारों, फनकारों को भी ललकारता है-

काबिज रहेंगे हम पर यूँ रंजो-आलम क्या

हालाते-हाजिरः से डर जायेंगे हम क्या

कहते हैं कलम में है वल्लाह बड़ी ताकत

सोते रहेंगे फिर भी अर्बाबे-कलम क्या

 

पूरी दुनिया महंगाई की मार झेल रही है. सत्ता और व्यापार का गठजोड़ आम आदमी को अपनी चक्की में पीस रहा है. इसी तिकड़मबाजी को लेखक ने सबके सामने कुछ इस तरह उजागर किया-

उनके सर को तो सत्ता का ताज मिला

फिर से हर व्यापारी तिकड़मबाज मिला

महंगाई डायन ने फिर से कमर कसी

अस्सी रुपये किलो टमाटर आज मिला

लेखक कुँवर कुसुमेश ने अपने अंतर्मन से जिस घटना, विषय-वस्तु एवं विचार को देखा-समझा उन्हें मुक्तक के रूप में पाठक के सामने रखा. यह उनका बहुरंगी विचार दर्पण है जिसमें उन्होंने जीवन के उन सभी पहलुओं को देखने की कोशिश की जिसको उन्होंने जिन्दगी में जिया. उन्होंने अच्छे बुरे दोनों अनुभवों को पाठक के साथ साझा किया है. कुछ पाठक उनके विचार से असहमत भी हो सकते हैं. आधुनिक तकनीकि फेसबुक, व्हाट्सअप, इमेल इत्यादि की सीमाओं को भी उन्होंने पहचानने की कोशिश की है. लेखक का यही अनुभव हमें नये सिरे से विचार-विमर्श के लिए भी जगह मुहैया कराता है और आजके लेखकों को समाज की चुनौतियों के साथ हमेशा खड़े रहने के लिए प्रेरित करता है.

 

मुक्तक : कुँवर कुसुमेश | प्रकाशन : उत्तरायण | कीतम : 150 | पेज : 64

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