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उडुपी राजगोपालाचार्य अनंतमूर्तिं

कन्नड़ से अनुवाद : मुकुंद जोशी

हमारे सभी बौद्धिक व्यवहार शब्द-कोश से सीखी हुइ कृत्रिम अंग्रेज़ी के सहारे चलते हैं. गाली-गलौज़, चापलूसी, आत्मीय संवाद और चर्चा जैसे रोजमर्रा के बाक़ी सभी काम शुष्क हो चुकी कन्नड़ के सहारे होते हैं. यह है हमारी वर्तमान स्थिति. इसका परिणाम द्विभाषा संपन्नता नहीं, भाषा-दारिद्र्य में निकलता है। बुद्धि-लोक और भाव-लोक के बीच एक दीवार खड़ी करके जीने से छद्म व्यक्तित्व की रचना होती है। अंग्रेज़ी न जानने वाले पुराने ज़माने के पण्डितों से ही नहीं बल्कि गाँव के किसी सामान्य आदमी से ही बात करके देखिए : आत्माविहीन कन्नड़ औररक्तविहीन अंग्रेज़ी हमें शर्मसार करने लगेगी। इस दृष्टि से देखने पर लगता है कि हमारी अपनी समझी जाने वाली संस्कृति को आज तक बचा कर रखने वाले लोग यही अँगूठाछाप और गाँव के गँवार हैं। इस भाषाई क्षेत्र में जो भी अर्थपूर्ण और सत्वपूर्ण काम हुआ है, वह भावनात्मक हो या वैचारिक, उसे कन्नड़ में लिखने वालों ने किया है। हमारी श्रेष्ठ रचनाओं में (जैसे, बेंद्रे-अडिग का काव्य, कुवेंपू की कानुरु हेग्गडति, कारंत के उपन्यास) इन अँगूठाछाप लोगों की ताकत और बिजली ही चमकती है।

बीबीसी में चार्ल्स पार्कर नामक महाशय हैं। इंग्लैण्ड के लोक-गीतों के बारे में इन्होंने लोगों में एक नयी आस्था जगाई है। इनका विश्वास है कि लोक-साहित्य की सम्पन्नता से उच्च नागरिक जीवन को रक्तदान मिल सकता है। इसके आधार पर शेक्सपीयर और बर्न्स की तरह फिर एक बार लिखना सम्भव हो सकता है। मज़दूर संघ शेक्सपीयर-दिवस मना रहा था तब मैंने उन्हें देखा और उनसे मिला। मैंने उनसे कहा कि किस तरह बेंद्रे लोक-साहित्य और लोक-जीवन से प्रभावित हुए और किस प्रकार सामान्य सुख-दुख से विशेष वैयक्तिक अनुभव के विविध स्तर के चित्रण के लिए उसका सहारा लिया। पार्कर का कहना था कि यह तो सचमुच अद्भुत बात है।

उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि भारत में यह अभी भी सम्भव है। उनके साथ बात करते हुए मैंने सोचा कि इतनी विकसित अंग्रेज़ी को भी अगर लोक-साहित्य के सत्व की कदम-कदम पर आवश्यकता है, तो फिर भारत भूमि में अंग्रेज़ी का बढ़ना कैसे सम्भव होगा? शब्द-कोश से अंग्रेज़ी सीख कर क्या हम साहित्य की रचना कर पाएँगे?

साहित्य की दृष्टि से मेरा सोचना ठीक है। लेकिन हमारे सामने समस्या कुछ और है। हमने लोक-साहित्य की सम्पन्नता से भाषा की ताकत पाई। साहित्य के लिए भाषा की सृष्टि की, लेकिन लोक-साहित्य से हमने क्या पाया? उसे क्या दिया? अंग्रेज़ी भाषा के कारण खिले हुए अपने विचारों को हम लोगों तक नहीं ले जा पाए। अर्थात् हमारे चिंतक बाँझ हो गये। अगर हम दूसरी भाषाओं से पाया हुआ अपने लोगों तक ले जा सकते तो लोक-जीवन में वह एक नया अनुभव बन कर फिर से हमारे पास लौट आता— लेकिन हमारे जीवन, हमारे विचार और हमारी भाषा के बीच किसी प्रकार का संबंध था ही नहीं। पाश्चात्य संस्कृति के सम्पर्क से हमने जो पाया, उसे हमने अपने लोगों तक पहुँचाया— यह कहते समय अगर हम कुमार व्यास, पम्प, बसवेश्वर से इसकी तुलना करें कि संस्कृत भाषा के विचारों और काव्य को इन लोगों ने किस प्रकार लोगों की पूँजी बनाया, तो शर्म से सिर झुकाना पड़ता है। वेद पर सारा अधिकार ब्राह्मणों का होने के बावजूद हमारी भाषाएँ इस जाति-भेद की विनाशकारी प्रवृत्तियों के साथ लड़ कर एक समग्र संस्कृति का निर्माण करने में सहायक बनीं। किसी एक कहावत में उपनिषद् का तत्त्व समा गया। पौराणिक कहानी में गहन तत्त्व-विचार हमारी पूँजी बने। लेकिन अंग्रेज़ी-अध्ययन के आधार पर रचित हमारा राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान इस तरह जनता की सम्पत्ति बन कर, भाषा की सम्पत्ति बन कर चिंतकों को लौट कर प्राप्त न हो सका। ऐसे असाध्य परिवेश में आज हम हैं।

विट्गेंस्टाइन कहते हैं : ‘मेरी भाषा की सीमा मेरे ज्ञान की सीमा है।’ कन्नड़ अभी भी सत्वशाली होकर गाँव के लोगों के कारण से बची हुई है— यह इस आधार पर शत-प्रतिशत सत्य है, लेकिन सुशिक्षित बने हुए हम लोगों के ज्ञान का दायरा किसी दूसरी भाषा के कारण विकसित हो रहा है।

अंग्रेज़ी-अध्ययन के आधार पर रचित हमारा राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान इस तरह जनता की सम्पत्ति बन कर, भाषा की सम्पत्ति बन कर चिंतकों को लौट कर प्राप्त न हो सका। ...हमने अंग्रेज़ी में पढ़े हुए समाजशास्त्र, साहित्य, विज्ञान, जीवशास्त्र को नित्य जीवन का अंग न बनाकर बुद्धि-लोक में खाद-पानी के बिना भटकने वाले भूतों में बदल दिया है।

जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि इसी के परिणामस्वरूप हमारे अनुभव विश्व के दो कक्ष हो गये हैं। इन दो कक्षों के बीच एक बहुत बड़ी दीवार है। हमने अंग्रेज़ी में पढ़े हुए समाजशास्त्र, साहित्य, विज्ञान, जीवशास्त्र को नित्य जीवन का अंग न बनाकर बुद्धि-लोक में खाद-पानी के बिना भटकने वाले भूतों में बदल दिया है। भारत को छोड़ कर अन्य देशों के लोगों के सभी व्यवहार— प्रेम, खाना- पीना, लड़ाई, चापलूसी से लेकर विज्ञान और साहित्य तक— एक ही भाषा द्वारा सम्पन्न होते हैं। इसी कारण समस्त पीढ़ी की रचनात्मकता एक सजीव भाषा बन कर विकसित होती जाती है। समस्त पीढ़ी की प्रज्ञा को आकार देते समय कवि को परस्पर विरोधी लगने वाले बुद्धिमूलक और भावमूलक व्यवहार भी एक भाषा से प्राप्त होते हैं। पब में सुनाई पड़ने वाली बातें, सुपर मार्केट में कही जाने वाली बातें, समाजशास्त्र पढ़ाते समय उपयोग की जाने वाली भाषाएँ अपनी पद-योजना में, अर्थपूर्णता में, अपनी तीव्रता में अंतर रखने के बावजूद दो अलग-अलग संसारों से जुड़ी हुई नहीं होतीं। ऐसी स्थिति में भी धोखा न हो, ऐसा नहीं है। सामान्य जीवन और विज्ञानादि विचार-लोक एक ही भाषा में व्यवहृत हो रहे हैं— ऐसा लगने के बावजूद अलग-अलग भाषा की तरह सुनाई पड़ना इस देश में भी सम्भव है। लेकिन भ्रम कुछ भी हो— इलियट, यीट्स, लारेंस जैसे लोग इसके विरोध में संघर्ष इसलिए कर पाने में समर्थ हुए क्योंकि व्यक्ति के विविध व्यवहार की वाहक और केंद्र के रूप में एक ही भाषा थी।

समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र और मनोविज्ञान के साथ आज भी अंग्रेज़ी साहित्य आदान-प्रदान का संबंध रखता है। रचनाकार केवल भावनात्मक गीतों को गाने वाला और काल्पनिक लोकों में विचरण करने वाला नहीं होता। इसी तरह पण्डित महज़ शुष्क चिंतक नहीं होता। ऐसा लगता है कि सभी मिल कर एक संस्कृति के चित्र-निर्माण में लगे हैं। केवल संकेत और फ़ार्मूले के आधार पर प्रगति करने वाले विज्ञान द्वारा विश्व को अपनी मुट्ठी में दबोचते समय मानवता के लिए योग्य भाषा का (अर्थात् उस भाषा द्वारा अपनी समूची संस्कृति का) रक्षण आँख में अंजन डाल कर अत्यंत जाग्रत हो कर करना पड़ता है। इस तरह की रक्षा करने का काम पाश्चात्यों में निरंतर चल रहा है। इस दृष्टि से वे हमसे ज़्यादा यथार्थवादी हैं। और, एक हम हैं जो इस बात से डरते हैं कि अंग्रेज़ी को छोड़ा तो यंत्र संस्कृति विकसित न होकर भाड़ में चली जाएगी। इस दृष्टि से हम चार्वाक को भी शर्मिंदा करने वाले पदार्थवादी बन जाते हैं।

मुख्य रूप से हमें यह जानना चाहिए कि बेंद्रे की तरह सभी को सभी कालावधियों में लोक-जीवन की पूँजी का सहारा लेना कष्टकर होता जाएगा। अंग्रेज़ी-अध्ययन से अति-आधुनिक विचारों को मन में समेट कर लोक-भाषा में लिखते जाना कृत्रिम बनता जाएगा। ज़रा आप ही सोचिए कि अंग्रेज़ी-कन्नड़ का मिश्रण करके बोलने वाले महानगर के जीवन के बारे में कितनी उत्तम कृतियाँ कन्नड़ में आयी हैं? उसी तरह गाँव के जीवन के बारे में अंग्रेज़ी उपन्यास लिखने वाले किस भारतीय ने श्रेष्ठ उपन्यास की रचना की है? इससे स्पष्ट होता है कि हमारी समस्या क्या है? साहित्य की दृष्टि से देखने पर लगता है कि आम भारतीय के लिए परिचित मातृभाषा अथवा अंग्रेज़ी समस्त पीढ़ी के सम्पूर्ण अनुभव को (गाँव और महानगर मिला कर) अभिव्यक्त करने में असमर्थ हो गयी हैं। गाँव के दो लोगों के संवाद को अंग्रेज़ी में लिखना जितना कठिन है, उतना ही कठिन है महानगर में रहने वाले दो चिंतकों के संवाद को प्रभावशाली कन्नड़ में लिखना। इसलिए हमारी समस्या इंग्लैण्ड के नागरिक वर्ग के लोक-साहित्य के साथ गहरे संबंध से भिन्न है। चार्ल्स पार्कर के कथनानुसार बेंद्रे की सिद्धि अद्भुत है, यह जान कर भी कि दो परस्पर असंगत संस्कृतियाँ, जो हमारे यहाँ निर्मित होने के कारण बेंद्रे को जो साध्य हुई थीं, कठिन बनती जाएँगी।

मानवीय बन कर जीने के लिए मनुष्य के पास अपने अतीत (रक्षित होकर आये हुए) से संचित मूल्यों तथा श्रेष्ठ पूर्वजों की तपस्या और साधना की स्मृति होनी चाहिए। भाषा इसी स्मृति की पूँजी है। अंग्रेज़ी-पीढ़ी की स्मृति इस तरह चॉसर के समय से निरंतर प्रवाहित होती आयी है। लेकिन आज की तरह कन्नड़ के बारे में व्यक्त अपमान और तिरस्कार का सामना कभी अंग्रेज़ी भाषा को भी करना पड़ा था। अंग्रेज़ी के अस्तित्व को मध्ययुग से भी ज़्यादा रेनेसाँ के समय लैटिन भाषा की चुनौती का सामना करना था। मध्ययुग में लैटिन भी अंग्रेज़ी के साथ जीने वाली भाषा थी। दरअसल, रेनेसाँ युग में लैटिन को भी व्याकरण-सम्मत लिखने का भूत पण्डितों पर सवार हुआ। दिन में, अनजाने में वाक्य-रचना में हुई ग़लती को लेकर रात भर बेचैन हो कर तड़पने वाले पण्डितों की इटली में कमी नहीं थी।

विक्रम संवत् 1574 के आसपास लव्ज़ लेबर ऐंड लॉस्ट नाटक में होलोपर्नेस पात्र के माध्यम से शेक्सपीयर ने ऐसे लोगों पर व्यंग्य किया है। लेकिन मानववाद के प्रभाव और उदीयमान सामाजिक शक्तियों के कारण एलिज़ाबेथ के समय की अंग्रेज़ पीढ़ी अतीत की स्मृति से दूर हो गयी। अंग्रेज़ी का अध्ययन करने के बजाय विद्यार्थी ग्रीक और लैटिन ही पढ़ने लगे। संवत् 1545 में टोक्सिफ़िलस ग्रंथ लिखने वाले अस्काम का कहना था कि अगर इस ग्रंथ को वे लैटिन में लिखते तो लिखने का काम और ज़्यादा आसान होता और गौरव भी ज़्यादा प्राप्त होता। इसका कारण देते हुए वे आगे कहते हैं कि लैटिन में लिखने के लिए नमूने के ग्रंथ भी उपलब्ध हैं। (हमारे यहाँ कन्नड़ के बारे में लोगों को जो लगता है, उसमें और अस्काम के कथन के बीच जो साम्य है उसे ध्यान से देखा जा सकता है)। सिडनी ने अपनी रचना अपोलॅजी में अंग्रेज़ी पर लगे दो आरोपों का समर्थन किया है। एक, अंग्रेज़ी मिश्रण की भाषा है। दूसरा, इसका अपना व्याकरण नहीं है। मुलकास्कर ने संवत् 1580 में रचित एलिमेंट्री में अंग्रेज़ी पर समकालीन लेखकों द्वारा लगाए गये आरोपों का स्पष्ट विवरण दिया है। इन आरोपों के अनुसार अंग्रेज़ी स्पष्ट भाषा नहीं है। इसलिए किसी भी वैचारिक ग्रंथ के निर्माण के लिए इसके पास दृढ़ आधार नहीं है। सुशिक्षित वर्ग की दृष्टि में इसका कोई मूल्य नहीं है।

मुख्यतः कहा जाता है कि ‘किसी भी दार्शनिक चर्चा को इस भाषा में लिखने का क्या प्रयोजन। अनपढ़ उसे समझेंगे नहीं और पढ़े-लिखे उस पर विश्वास नहीं करेंगे।’ बालसुब्रह्मण्यम् की पुस्तक आरिस्टॉटल की काव्य मीमांसा जब प्रकाशित हुई तब किसी ने इसी बात को दोहराया : ‘जो अंग्रेज़ी जानते हैं वे अंग्रेज़ी में ही पढ़ेंगे। और सिर्फ़ कन्नड़ जानने वाले अशिक्षितों को इस ग्रंथ की कोई आवश्यकता नहीं।

’ शाब्दिक अंग्रेज़ी के पाँव हमारी ज़मीन पर टिके हुए नहीं हैं। वह ऑक्सफ़र्ड शब्द-कोश से खोद कर निकाली हुई बीमार, कर्णकटु और परिश्रमजन्य भाषा बन जाती है। बुद्धि की तीक्ष्णता के स्पर्श के बिना भाव मवाद बनता है, भाव के सम्पर्क के बिना बुद्धि राक्षस बन जाती है। लोक-जीवन की संस्कृति की जानकारी न होने से बुद्धिवादी डोरी से लटकने वाला ब्रह्मराक्षस बन जाता है। बौद्धिक विकास की सीमा के भीतर लोक-संस्कृति न आने पर वह क्रमशः सघन होती जाती है। गाँव और शहर की दूरी अंग्रेज़ी-ब्राह्मण और कन्नड़-शूद्र जैसी और दो जातियाँ पैदा करेगी, जिससे ऐसा भयानक परिणाम हमारे देश में निकलेगा जैसा यंत्र संस्कृति के कारण कहीं नहीं निकला होगा। कारण यह कि यंत्र संस्कृति के दबाव में हमारी मानवता की रक्षा करने लायक अतीत की कोई स्मृति हमारे पास बची नहीं रहेगी। इसके लिए केवल एक ही उत्तर है कि अनिवार्य बनी यंत्र नागरिकता और नये विचार केवल हमारी भाषा द्वारा ही हमें प्राप्त होने चाहिए। तभी हमारे जीवन के अनुभव और नये विचारों के बीच मंथन हो कर नयी सृष्टि सम्भव है।

वर्तमान परिस्थिति में हमारी भाषा विज्ञानादि विचारों के लिए असमर्थ है। अंग्रेज़ी माध्यम छूटा तो दुनिया से सम्पर्क टूटा जैसे तर्क (जो सही भी होंगे) देना ज़िम्मेदारी से बचने की कायरता होगी। साहस और परिश्रम के बिना नयी सृष्टि सम्भव नहीं। यह केवल कन्नड़ के प्रति ममता का प्रश्न नहीं है। हमारी भाषाएँ कितनी ही हीन अवस्था में क्यों न हों, हमें हमारी परिस्थिति की सम्पूर्ण जानकारी होनी चाहिए और सदा आलोचनात्मक दृष्टि रख कर ऐसे साहस के लिए हाथ बढ़ाना चाहिए। अर्थात् सबसे पहले अंग्रेज़ी के प्रति अपनेपन को त्यागना होगा। इस तरह अंग्रेज़ी का त्याग करने के बाद भी इस भाषा के साथ किस प्रकार का संबंध रखना चाहिए— इसकी चर्चा आगे करूँगा।

लेकिन, इसके पहले हमें अपने आपसे एक प्रश्न पूछना होगा। जन-जीवन के साथ सीधा सम्पर्क स्थापित करने वाले समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान आदि विषयों को आज तक हम अंग्रेज़ी में पढ़ाते आये हैं। लेकिन किसी भी भारतीय द्वारा इन विषयों पर कहने लायक विश्वमान्य रचना की सृष्टि नहीं हुई है। इसका क्या कारण है? पहला, इस प्रकार की रचना-सृष्टि के लिए आवश्यक प्रतिभाएँ हमारे यहाँ नहीं हैं— यह कहना आसानी से स्वीकार करना कठिन है। साहित्य के क्षेत्र में भी तो यहाँ-वहाँ भारत में महान् प्रतिभाओं का जन्म हुआ है। इसी प्रकार भाषा और जन-जीवन के सम्पर्क से बिलकुल गौण भौतिकशास्त्र, गणितशास्त्र में भी रमन और रामानुजन जैसे प्रतिभाशाली यहाँ पैदा हुए हैं, लेकिन जन- जीवन के साथ सीधा सम्पर्क रखने वाले अन्य शास्त्रों में इस तरह की मूल्यवान रचना करने वाले क्यों पैदा नहीं हुए? इसका कोई दूसरा महत्त्वपूर्ण कारण रहा होगा।

उदाहरण के लिए राजनीतिशास्त्र को ही लीजिए। आज भी विश्व के लिए राजनीति में भारत की ओर से विशिष्ट उपहार मात्र गाँधीजी हैं। उधर तॉल्स्तॉय से ले कर, इधर थोरो और रस्किन से प्राप्त विचारों को भारतीय भूमि में विकसित करके जन-जीवन में उनका प्रयोग करके अपने ही एक मिश्रण को उन्होंने तैयार किया। यह थोड़ा-सा विचित्र लग सकता है, लेकिन राजनीति के क्षेत्र को छोड़िए विचार की दुनिया में भी गाँधीजी भारत के एकमात्र प्रतिभाशाली व्यक्ति दिखाई पड़ते हैं।

इसलिए यह मेरा अंदाज़ है कि राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान आदि जीवन से सीधे जुड़े हुए शास्त्रों में काम तभी सम्भव होगा जब इस तरह का संशोधन करने वाला और जीवन के बारे में तीव्र आस्था रखने वाला हो (अर्थात् अपने लोगों के सपने, आशा-आकांक्षा, विचारों के साथ)। हमारे साहित्यकारों ने इस तरह की आस्था रखने के कारण मूल्यवान काम किया है। हमारे समाज- वैज्ञानिक भी अगर इस तरह की आस्था रखेंगे तो वे भी सामान्य जनता को न समझ आने वाली भाषा में काम नहीं करेंगे। बुद्धिजीवी और सामान्यों के बीच अन्योन्य संबंध और विचारों का आदान-प्रदान हमारी भाषाओं द्वारा ही सम्भव है। अर्थात् लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा की पूँजी और उस भाषा साहित्य की परम्परा का परिचय मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री, राजनीतिशास्त्री को रहना अत्यंत आवश्यक है। इस तरह का परिचय होने से ही वह लोगों के सुप्त सपने, आशा-आकांक्षा, अतृप्ति के अलावा अपने लोगों के विकार, दुर्बल प्रवृत्तियों का अनुभव लेकर नयी विचार-सृष्टि सम्भव कर सकेगा।

मार्क्स कहते हैं कि मैंने बाल्जाक से अर्थशास्त्र सीखा। फ्रॉयड के विचारों के पीछे समूचे यूरोप का साहित्य है। इंग्लैण्ड का कोई राजनीतिशास्त्री पण्डित हो या दार्शनिक, ब्लेक, लॉरेंस, वर्ड्सवर्थ में अभिव्यक्त पीढ़ी की प्रज्ञा को दृष्टिगत किये बिना, नया विचार नहीं करेगा। और एक हम हैं कि अपने शाब्दिक अंग्रेज़ी के पाँव हमारी ज़मीन पर टिके हुए नहीं हैं। वह ऑक्सफ़र्ड शब्द- कोश से खोद कर निकाली हुई बीमार, कर्णकटु और परिश्रमजन्य भाषा बन जाती है।... बुद्धि की तीक्ष्णता के स्पर्श के बिना भाव मवाद बनता है, भाव के सम्पर्क के बिना बुद्धि राक्षस बन जाती है। लोक-जीवन की संस्कृति की जानकारी न होने से बुद्धिवादी डोरी से लटकने वाला ब्रह्मराक्षस बन जाता है।

बसवेश्वर, अल्लामा, कुमार व्यास को पढ़े बिना, अपने आधुनिक साहित्य की गुप्त और प्रकट प्रवृत्तियों के दर्शन के बिना जीवन से सीधे संबंधित सब शास्त्रों को अंग्रेज़ी पाठ्य-पुस्तकों के सहारे जान कर भ्रम में हैं कि हम एक नयी सृष्टि की रचना कर रहे हैं। इस तरह के भ्रमित और त्रिशंकु समान हमारे वैचारिकों से जीवन से संबंधित विषयों पर प्रतिभापूर्ण ग्रंथ के आने के बारे में मुझे तो शंका है। कुछ भी हो वर्तमान स्थिति में यह मानना पड़ेगा कि हमारी भाषा सीमित है। लेकिन इस सीमा से आगे, किसी दूसरी भाषा के सहारे, मानव मूल विचारों की दुनिया पार कर जाएँगे, यह कहना कष्टकर है। और अगर यह साध्य है भी, तो पीढ़ी की दृष्टि से लोक-साहित्य की सम्पन्नता की पूँजी और अंग्रेज़ी से प्राप्त ज्ञान-सम्पन्नता से दोनों एक-दूसरे में मिलकर ही नयी सृष्टि का निर्माण कर सकते हैं।

वेस्ट इण्डियन समाजवादी नेता और साहित्यकार सी.एल.आर. जेम्स ने एक बार कहा था : ‘भारतीयों के साथ तुलना करने पर हम भाग्यशाली हैं। हमारी मातृभाषा अंग्रेज़ी हमारे लिए भाषा- समस्या नहीं है। हम सीधे प्रगति पथ पर चल सकते हैं।’ लेकिन एक क्षण रुक कर उन्होंने फिर कहा, ‘लेकिन आपको इन असुविधाओं के साथ ही, अपनी भाषाओं द्वारा आपकी अपनी एक संस्कृति है। पर हमारी अपनी कहने लायक भाषा न होने के कारण हमारे पास अपना कोई व्यक्तित्व ही नहीं है।’ हमारी पीढ़ी को इस दृष्टि से सामना करने के लिए प्रश्न यह है कि हमें ‘अपनेपन’ को बचाते हुए (बचा कर ही) इस वैज्ञानिक युग में प्रगतिशील होना सम्भव है? और अगर है तो कैसे? इसके लिए दो में से एक उत्तर देना पड़ता है।

जून के एनकाउंटर में नीरद चौधरी ने एक उत्तर सुझाया है। उनका तर्क इस प्रकार है— ‘हम भारत के पाशविक तापमान में उलझे हुए, अटके हुए, विकृत बने यूरोपियन हैं।’ इससे मुक्त होना (उनके अनुसार) दो तरह से सम्भव है— एक, यूरोपियंस का हम पर राज्य करने से; दूसरा, हमें ही मन से पाश्चात्यों जैसा बनने से।’ यह दूसरा मार्ग कठिन होने पर भी हम भारतीयों को परिश्रम करके यूरोपियन बन कर भारत की पाशविक मुट्ठी से छूटना चाहिए— इसी की कामना करके उन्होंने लिखा है। धैर्य और ईमानदारी के साथ नीरद चौधरी का यह कहना कि अंग्रेज़ी का त्याग किया तो हम डूब जाएँगे— मानना पड़ता है। लेकिन ‘अपनेपन’ को खोने की चाह न रखने वालों के लिए एक और रास्ता भी है। और वह रास्ता है— विविध भाषाओं (हमारी अपनी) द्वारा अपने व्यक्तित्व की समग्रता की सृष्टि का रास्ता। अर्थात् हमारे अशिक्षित, दरिद्र जन-सागर को साथ लेकर सदियों की स्मृतियों के अनमोल को बचा कर, लोक-जीवन की संस्कृति में नींव बन कर हमारी विविधता के लिए योग्य विचार को विकसित करने का मार्ग। यह कठिन मार्ग है।

खोदते समय

पहली अवस्था मिट्टी थी

नीचे, और नीचे कुदाल चलाकर देखो

तो दिखेगा सोना—चमकता हुआ

बाहर निकालकर, तपाकर

जानने की विद्या को

अब तो सीखना चाहिए

सोना तपाकर

देवता के विग्रह को अर्पित

करने की असली कला।

—गोपालकृष्ण अडिग

यह दूसरा रास्ता अपनाना अनिवार्य है। क्योंकि नीरद चौधरी जैसे लोगों के लिए यूरोपियन बनना जिस तरह सम्भव है (क्या उनके लिए भी सचमुच सम्भव है?) उस तरह भारत की जनता के लिए सम्भव नहीं है। नीरद चौधरी की कल्पना के अनुसार एक वर्ग (समूह) यूरोपियन हो भी गया समझिए। वैसे लोग भारत पर राज करने वाले भी बन गये, मान लीजिए।

लेकिन सचमुच उन्हें भारत पर राज करना सम्भव है? उस समय भारत में क्या होगा, यह फ्रांस, रशिया, चीन की क्रांति का अध्ययन किये हुए लोगों को अलग से समझाने की आवश्यकता नहीं।

किसी भी तरह का तर्क दे कर (सही-ग़लत) नीरद चौधरी जैसे बुद्धिजीवी भले ही दुनिया के सामने भारत के सामान्य लोगों की मूढ़ता और भारतीय भाषाओं के बारे में तिरस्कार दिखाएँ, लेकिन इतना तो सत्य है कि हमारे लोग अज्ञानी हों, हमारी भाषाएँ निरुपयोगी हों लेकिन जो वास्तविक है, जो सत्य है, उससे चिंतक को मुक्ति नहीं है। भाषा कैसी भी हो, लोग कैसे भी हों— उनके साथ सम्पर्क बिना, संघर्ष बिना बुद्धिजीवी अँधेरे में बढ़ने वाले गुलदस्ते का अंकुर बन ही जाते हैं। यह गंदा होगा, यह गटर होगा, ये लोग मूर्ख होंगे, अनाड़ी होंगे— लेकिन यही जीवन है। इसके साथ सम्पर्क बुद्धिजीवियों और चिंतकों के लिए अनिवार्य है। भारत के इस मार्ग को पाँव गंदे किये बिना पार कर के हम यूरोपियन स्वर्ग पहुँचेंगे, इस भ्रम के सहारे सोचने वाले पागल हैं। सम्पर्क, संघर्ष, प्रेम अथवा जल जाना— यही एक मार्ग है बुद्धिजीवियों और चिंतकों के लिए। यह हमारी अपनी भाषाओं द्वारा ही सम्भव है। जब तक अंग्रेज़ी हमारा माध्यम बनी रहेगी तब तक हमारे समाज को, ‘छलाँग लगा कर’ पार कर लेंगे— ऐसा भ्रम बना रहेगा।

तो हमें सम्पूर्ण रूप से अंग्रेज़ी को छोड़ना होगा? किस तरह का संबंध अंग्रेज़ी के साथ सृजनात्मक रूप धारण कर सकेगा? अब हमें इन प्रश्नों को पूछने की आवश्यकता है।

ग्रहण करने के लिए हमें मूलकृति के पास अर्थात् अंग्रेज़ी भाषा के पास जाना चाहिए। लेकिन अभिव्यक्ति के लिए अपनी भाषा का उपयोग होना चाहिए। यही सही मार्ग है। इसके साथ जो अंग्रेज़ी के अलावा अन्य यूरोपियन भाषाओं का उपयोग करना चाहें, उनके लिए भी गुंजाइश होनी चाहिए। कुछ वैयक्तिक अनुभवों से मैं इसका समर्थन करना चाहता हूँ। विद्यार्थियों को अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य पढ़ाने का मुझे अनुभव है। परीक्षा में उनकी उत्तर-पुस्तिकाओं को पढ़ने का अनुभव है। सत्य के बारे में जिसके मन में थोड़ी-सी भी चिंता है, तड़प है उसे इस अपार धोखे को अपनी खुली आँखों से देखते हुए आत्मवंचना करते रहना असाध्य है। हम सचमुच विद्यार्थियों को क्या पढ़ा रहे हैं?

अंग्रेज़ी भाषा? लेकिन उन्हें एक सामान्य सरल वाक्य को बिना किसी ग़लती के लिखना नहीं आता है! या अंग्रेज़ी साहित्य को? उनकी लिखी हुई (अंग्रेज़ी में) वर्ड्सवर्थ की प्रकृति और हेमलेट का अंतर्द्वंद्व जैसे विषयों को वे कैसे अपना बना सकेंगे? लेकिन अंग्रेज़ी अध्यापकों में कुछ लोगों को तो एक अनुभव हुआ होगा। पल-पल पलक झपकाते हुए, सम्भ्रांत हो कर आप की तरफ़ देखने वाले छात्रों को एकाध घंटा ब्रेडले आदि आलोचकों के सहारे, हेमलेट की समस्या का विवरण देने के बाद ‘छोड़ दे बेचारों को’ कह कर उस नाटक के बारे में कन्नड़ में समझाना आरम्भ करते ही उनकी राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान आदि विषयों को आज तक हम अंग्रेज़ी में पढ़ाते आये हैं। लेकिन किसी भी भारतीय द्वारा इन विषयों पर कहने लायक विश्वमान्य रचना की सृष्टि नहीं हुई है। इसका क्या कारण है?... ग्रहण करने के लिए हमें मूलकृति के पास अर्थात् अंग्रेज़ी भाषा के पास जाना चाहिए। लेकिन अभिव्यक्ति के लिए अपनी भाषा का उपयोग होना चाहिए। यही सही मार्ग है।

आँखों में एक नयी ज्योति चमकने लगती है। इसलिए अध्यापक के रूप में मेरी यह विनम्र सुझाव है कि मूल ग्रंथ को समझने लायक अंग्रेज़ी भाषा और व्याकरण विद्यार्थियों को सिखाई जानी चाहिए ताकि उनमें अंग्रेज़ी में पढ़ा हुआ साहित्य और प्राप्त अनुभव अपनी भाषा में अभिव्यक्त करने की योग्यता का निर्माण हो सके। परीक्षा में उनकी अंग्रेज़ी भाषा को नापना ही हमारा लक्ष्य हो तो व्याकरण और वाक्य-रचना के बारे में प्रश्न पूछे जा सकते हैं। अथवा, उनका साहित्यानुभव, संवेदन-शक्ति और आसक्ति की परीक्षा ही करना अगर हमारा ध्येय है तो उनके अनुभव को सहज रूप से अभिव्यक्त करने लायक उनकी भाषा में उन्हें मौका दिया जाना चाहिए। लेकिन होता यह है कि हम परीक्षा में न उनके अंग्रेज़ी भाषा ज्ञान को परखते हैं और न ही उनके साहित्यानुभव की परख करते हैं। इसीलिए सौ में से अस्सी छात्र अंग्रेज़ी में फेल हो जाते हैं।

इसका परिणाम यह हुआ है कि हमारे विद्यार्थी या तो शेक्सपीयर के शत्रु बन गये हैं या शेक्सपीयर के बारे में नोट्स लिखने वालों के मित्र। या पास न होने के कारण ‘हम किसी काम के नहीं’ इस हताशा से ग्रस्त निराशावादी बन चुके हैं। इस तरह यह कहा जा सकता है कि ग्रहण करने के लिए अन्य भाषा और अभिव्यक्ति के लिए हमारी अपनी भाषा हो— यही सही मार्ग है। मैक्समूलर ने संस्कृत में वेद पढ़ने के बाद भी, संस्कृत भाषा में ही ग्रंथ-रचना करने की मूर्खता नहीं दिखाई और जर्मन भाषा में लिखा। जर्मन, रूसी और पुर्तगाली लोगों ने शेक्सपीयर को पढ़ कर, अध्ययन करके अपनी भाषाओं में समीक्षात्मक ग्रंथों की रचना की। वे फिर अंग्रेज़ी में अनूदित हो कर अंग्रेज़ी विद्यार्थियों के लिए ही उपयोगी आलोचनात्मक ग्रंथ बने हैं। लेकिन किसी भी भारतीय की शेक्सपीयर पर लिखी हुई कोई भी किताब उपयोगी बताने वाले विद्यार्थियों को मैंने नहीं देखा है। शेक्सपीयर को अपने लोक-जीवन की पूँजी बनाए बिना हम मूल्यवान ग्रंथ लिख भी कैसे सकते हैं? रूसी, जर्मन, फ्रेंच लोगों को अपनी-अपनी भाषा द्वारा शेक्सपीयर अपने लगे, तभी उनके बारे में अपनी भाषा में ग्रंथों को लिखना सम्भव हुआ।

यह कहना हास्यास्पद है कि ‘इस तरह विद्यार्थियों को कन्नड़ में लिखने दिया गया तो हमारे ज्ञान का स्तर नीचे गिर जाएगा’। साहित्य का विषय जाने दीजिए। उदाहरण के लिए राजनीतिशास्त्र और समाजशास्त्र को लीजिए। अंग्रेज़ी में इन विषयों का अध्ययन करने वाले हमारे विद्यार्थी क्या अंग्रेज़ी में इन विषयों के बारे में रचित ग्रंथों को सचमुच पढ़ते हैं? या कम-से-कम पाठ्य-पुस्तक पढ़ते हैं? अब विद्यार्थी पढ़ते हैं, यानी ‘मगअप’ करते हैं अपने प्राध्यापकों के नोट्स। उन्हें ‘मगअप’ करके परीक्षा में किस प्रकार लिखा जाता है, यह परीक्षक जानता है। कन्नड़ में पाठ्य-पुस्तकें नहीं हैं— कहने वाले को इस पर ग़ौर करना चाहिए। चूँकि सभी ग्रंथ अंग्रेज़ी में ही मैक्समूलर ने संस्कृत में वेद पढ़ने के बाद भी, संस्कृत भाषा में ही ग्रंथ-रचना करने की मूर्खता नहीं दिखाई और जर्मन भाषा में लिखा। जर्मन, रूसी और पुर्तगाली लोगों ने शेक्सपीयर को पढ़ कर, अध्ययन करके अपनी भाषाओं में समीक्षात्मक ग्रंथों की रचना की। वे फिर अंग्रेज़ी में अनूदित हो कर अंग्रेज़ी विद्यार्थियों के लिए उपयोगी आलोचनात्मक ग्रंथ बने हैं। लेकिन किसी भी भारतीय की शेक्सपीयर पर लिखी हुई किसी भी किताब को उपयोगी बताने वाले विद्यार्थियों को मैंने नहीं देखा है। इसलिए विद्यार्थियों के मस्तिष्क में पहुँचने वाले ज्ञान में थोड़ा बहुत परिमार्जन कन्नड़ में पाठ्य- पुस्तकें न होने के बावजूद तत्क्षण कन्नड़ में पाठ पढ़ाने से ही सम्भव होगा। इंग्लैण्ड के मेरे अपने अनुभव से प्राप्त जानकारी इस प्रकार है। मैं जिस विश्वविद्यालय में पढ़ता था वहाँ स्पैनिश, फ्रेंच, रशियन, जर्मन आदि युरोपियन भाषाओं के विभाग हैं। इनमें कुछ मित्र शोधकार्य कर रहे थे। एमए और पीएचडी के लिए शोध करने वाला एक छात्र बीच-बीच में पेरिस जा कर आता था। वहाँ फ़्रेंच समीक्षकों के साथ बैठ कर चर्चा करता था। अध्ययन करता था। लेकिन वह स्टेंढाल पर अंग्रेज़ी में ही लिखता था। फ्रेंच में दी जाने वाली पीएचडी के अंग्रेज़ी ग्रंथ के लिए। यह सभी विभागों का साधारण तरीका है। इसी तरह जापान से आये हुए एक सज्जन अंग्रेज़ी विभाग में शोधकार्य कर रहे थे। लेकिन आलोचना अपनी जापानी भाषा में ही लिख रहे थे। जापानी के अंग्रेज़ी प्राध्यापक अपनी भाषा में ही उन्हें अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। फिर भी अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य का प्रभाव अद्भुत रूप से जापान पर हुआ है। साथ ही अंग्रेज़ी साहित्य पर प्रभाव डालने लायक नाटक और उपन्यास जापानी भाषा में रचे गये हैं।

यह सब देखने के बाद मुझे ऐसा लगता है कि कम-से-कम हमें इतना करना तो सम्भव होगा : कर्नाटक में तीन विश्वविद्यालय हैं। अंग्रेज़ी और कन्नड़, दोनों भाषा लेकर पढ़ने वाले विद्यार्थी हैं। अंग्रेज़ी साहित्य विभाग में अंग्रेज़ी कवियों, नाटककारों, आलोचकों पर शोधकार्य होता है और उसे अंग्रेज़ी में लिखा जाता है। इस तरह के शोधकार्य के लिए आवश्यक संदर्भ ग्रंथों को भारत में प्राप्त करना कई बार कठिन होता है। इस कारण से और इसके पहले मैंने जिन कारणों का विवरण दिया है— उनके आधार पर स्थिति यह है कि हमारे विद्यार्थी कितने ही बुद्धिमान क्यों न हों, उनका अंग्रेज़ी में लिखा हुआ शोधकार्य अंग्रेज़ी आलोचकों की कृतियों की पंक्ति में आना मुश्किल हो जाता है। अगर आया तो भी, अंग्रेज़ी साहित्य में विश्व के लिए किसी भारतीय का एक ग्रंथ कितना महत्त्वपूर्ण होगा, यह शंका का विषय है। हमारे जन-जीवन के लिए इन ग्रंथों का कोई प्रयोजन नहीं है। हमारे विद्यार्थी ही अंग्रेज़ी साहित्य के बारे में अंग्रेज़ी आलोचक को ही पढ़ना पसंद करते हैं। इसलिए अगर वे किसी शोधकार्य को अपनी ही भाषा में लिखते हैं तो भले ही वह रचना तृतीय श्रेणी की हो, पर कन्नड़ की वर्तमान दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बन सकती है। न केवल कन्नड़ के लिए उसका उपयोग किया जा सकता है, बल्कि एक नयी आलोचनात्मक भाषा के लिए उसका उपयोग हो सकता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस तरह अंग्रेज़ी के शोधकार्य को कन्नड़ में करने का अनुभव हमारे विकास के लिए प्रयोजनकारी बन सकता है। विफल शोधकार्य में परिश्रम और पैसा बरबाद करने की बजाय इस तरह का काम हाथ में लेना उपयोगी हो सकता है। यह काम हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। मेरी जानकारी के अनुसार इंग्लैण्ड के सभी विश्वविद्यालयों में इसी तरह से काम किया जाता है। दो भाषाओं के बीच इस तरह का आदान-प्रदान चलना ही अपेक्षित होना चाहिए।

अब तक इस तरह का काम साहित्य सेवा के रूप में यहाँ-वहाँ किसी-किसी साहसी ने किया है। अपनी पीढ़ी की विशेषता की रक्षा के लिए यदि हमारे विश्वविद्यालय और हमारी सरकार इस तरह की ज़िम्मेदारी नहीं उठाएगी तो भाषा-दारिद्रय से अ-संस्कृत हुई वैज्ञानिक राक्षस पीढ़ी की ज़िम्मेदारी हम सब की होगी। इसलिए हम सबके तुरंत करने का और कर सकने का काम यह है कि अब हमारे विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीतिशास्त्र, अंग्रेज़ी साहित्य, दर्शनशास्त्र आदि पर किये जाने वाले पीएचडी शोधकार्य हर सम्भव कन्नड़ में होने चाहिए।

(राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित यू.आर. अनंतमूर्ति की रचनाओं के संकलन किस प्रकार की है यह भारतीयता? से साभार। इसमें यह निबंध ‘अंग्रेज़ी ब्राह्मण-कन्नड़ शूद्र’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है।)

सीएसडीएस दिल्ली से प्रकाशित 'प्रतिमान' से साभार

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