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दीपक आचार्य का आलेख - सेवा या धंधा

सेवा या धंधा ?

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

 

लोकजीवन के ये दो शब्द बड़े ही महत्त्वपूर्ण हैं - सेवा और धंधा। दोनों ही का समाज और क्षेत्र से सीधा संबंध है। काम-धंधा या कारोबार आजीविका निर्वाह के लिए जरूरी है और यह हर इंसान के लिए अनिवार्य है जो परिश्रम से जीवन चलाना चाहता है, पुरुषार्थ करने में रुचि रखता है और मेहनत की कमाई का महत्व समझता है। 

धंधे या कारोबार का प्रकार कोई सा हो सकता है। इसके लिए कोई सीमा नहीं है। यह क्षेत्र विराट है। धंधा विशुद्ध रूप से जीवन निर्वाह का मूलाधार है और इसमें भी उसूलों के साथ किया गया धंधा आत्मतोष और आनंद प्रदान करता है।  

इस धंधे में भी कई क्षेत्र ऎसे हैं जिन्हें सेवा से जोड़ दिया गया है, यह मानकर कि इसके माध्यम से आजीविका का प्रबन्ध भी होगा और लोक सेवा एवं क्षेत्र सेवा भी। यह शोध का विषय हो सकता है कि ऎसे सेवा से जुड़े कितने क्षेत्र हैं जिनमें सेवा शब्द सार्थक हो रहा है।

जिन लोगों की आजीविका के साथ सेवा जुड़ा हुआ है उन्हें सेवा शब्द पर गौर करते हुए अपने कर्म को जीविका तक ही सीमित नहीं रखकर सेवा के सरोकारों से भी जोड़ना होगा। यह सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़े कारकों की सेवा हो सकती है या फिर और कुछ। 

हमें अपने दायित्व के लिए जो कुछ बंधा-बंधाया मिल रहा है, उसमें संतोष करते हुए उससे अधिक की अनुचित आस नहीं रखनी चाहिए बल्कि इसके अलावा जो समय मिला है उसे निष्काम भाव से सेवा में लगाने की आदत डालनी चाहिए। 

और वह सेवा भी ऎसी कि इसकी एवज में कुछ भी ग्रहण नहीं किया जाए यहां तक कि किसी का आतिथ्य तक भी नहीं।  सेवा का सीधा मतलब है जरूरतमन्दों तक उनके उपयोग की वस्तु या सुविधा की निरपेक्ष भाव से पहुँच। 

जिस सेवा के बदले पब्लिसिटी, भोग-विलास, पैसा, उपहार, पार्टी, खान-पान या धन्यवाद प्राप्त कर लिया जाता है वह सेवा नहीं बल्कि धंधा है जिसमें लेन-देन ही प्रधान होता है, बाकी सब कुछ गौण और निरर्थक। 

बहुत से लोग सेवा के नाम पर धूम धड़ाका, पब्लिसिटी करते हैं, अपने आपको महान दिखाने के लिए बड़े-बड़े प्रचार तंत्रों का इस्तेमाल करते हैं, विशालकाय फ्लेक्स के माध्यम से अपनी जवानी और खूबसूरती दर्शाने वाले छायाचित्रों का प्रदर्शन करते हैं, अपने नाम और फोटो चस्पा करते रहने के लिए किसी न किसी अवसर की तलाश में लगे रहते हैं, काम से अधिक नाम और तस्वीरों का प्रचार करते हैं, यह सेवा नहीं है बल्कि सेवा के नाम को भुनाकर किसी न किसी प्रकार का धंधा ही है जिसमें रुपया-पैसा और उपहार प्राप्त करने की भले ही आकांक्षा न हो, लेकिन लोकप्रियता और प्रतिष्ठा पाने के लिए जो कुछ किया जाता है वह भी प्राप्ति के दायरे में आता है। 

इसलिए लोकेषणा पाना भी एक तरह से धंधा ही है जिसमें अपना प्रचार करते हुए औरों से कुछ न कुछ पाने की कामना की जाती है। इसे सेवा नहीं माना जा सकता। सेवा हृदय से जुड़ा हुआ शब्द है जिसे पब्लिसिटी की जरूरत नहीं पड़ती। फिर आजकल सामाजिक, धार्मिक और क्षेत्रीय गतिविधियों में इसी पर अधिक जोर दिया जाने लगा है। 

यहाँ तक कि धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ, सत्संग और जप-तप एवं हवन आदि का भी प्रचार होने लगा है। जिस साधना का प्रचार हो जाता है उसका प्रभाव और पुण्य समाप्त हो जाता है और इस मायने में ऎसे पूजा-पाठ और हवन-अनुष्ठान आदि केवल नौटंकी ही बने रहते हैं, इनका कोई असर सामने नहीं आ पाता। 

यही कारण है कि देश में ढेरों शंकराचार्यों, लाखों बाबाओं, अपने आपको सिद्ध एवं ईश्वर के समकक्ष मानने वाले संत-महात्माओं, मठाधीशों और महंतों, तीनों कालों का ज्ञान रखने का दावा करने वाले ध्यानयोगियों, तंत्र-मंत्रों के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले असंख्य मांत्रिकों-तांत्रिकों और भौंपों  तथा भगवान से सीधा संबंध रखते हुए भाग्य को बदल डालने की क्षमता रखने वाले सिद्ध पण्डितों के बड़े भारी अस्तित्व के बावजूद देश में विपदाओं का खात्मा नहीं हो रहा है। 

कारण यही है कि हम केवल दिखावों में जी रहे हैं, लोगों को उल्लू बनाकर अपने उल्लू सीधे कर रहे हैं और हम सभी का एकमात्र उद्देश्य जमीन-जायदाद का संग्रहण और उन्मुक्त विलासिता भरा जीवन रह गया है। 

इसी तरह लाखों स्वयंसेवी संस्थाएं हैं जो सेवा के नाम पर हर क्षण कुछ न कुछ कर रही है। बावजूद इसके आज भी लोग सुखी एवं संतुष्ट नहीं हो पा रहे हैं। आखिर यह सब कहां जा रहा है, कुछ दिखाई क्यों नहीं देता, कुछ अनुभव क्यों नहीं हो पा रहा। 

धंधा करने वालों को अपने धर्म का पता नहीं है अथवा जानबूझकर कोई समझना और अपनाना नहीं चाहता। इसी प्रकार सेवा धर्म को अपनाने वाले भी सेवा के मर्म से अनभिज्ञ हैं अथवा सेवा को केवल धंधों की बरकत का जरिया बनाकर रखा हुआ है। सेवा के नाम पर जहां लक्ष्मी का संचय होना आरंभ हो जाता है वहां आसुरी भाव आ जाते हैं।

 बहुत सारे लोग अपने-अपने धंधों में रमे रहते हुए सेवा के नाम पर कोई न कोई ऎसा क्षेत्र पकड़ लिया करते हैं जिसमें अधिक से अधिक लोगों से सम्पर्क के सहज-सुलभ अवसर उपलब्ध हों। इस समूह के माध्यम से अपनी पहचान बनाते हुए ये तथाकथित सेवाव्रती लोग अपने धंधों का विस्तार करते हुए लाभ पाने  के तमाम हुनरों को आजमाते रहते हैं। 

ये समूह इनके लिए उत्प्रेरक का काम करते हैं जहां उन्हें अपने परिचय क्षेत्र को बढ़ाने के भरपूर अवसर मुहैया होते हैं। इससे कई तरफा फायदे होते हैं। एक तो सेवा के नाम पर होने वाले आयोजनों के माध्यम से भरपूर पब्लिसिटी स्टंट से लोकप्रियता पाने और हमेशा प्रचार माध्यमों में बने रहने का सुकून, और दूसरा परिचय क्षेत्र जितना अधिक बढ़ता जाता है उतना इनके धंधे के लिए लक्ष्य समूह अपना आकार बढ़ाता जाता है। 

इसका बहुआयामी लाभ इन्हें प्राप्त होता ही है। इस प्रकार के खूब सारे लोग हैं जिनके लिए सेवा के क्षेत्र अपनी खुशहाली और लाभों का ज्वार उमड़ाने वाले सिद्ध हो रहे हैं। इनमें से बहुत कम सेवाव्रती ऎसे होते हैं जो अपने हुनर और ज्ञान का उपयोग किसी गरीब या जरूरतमन्द के लिए निःशुल्क करते हों, वहाँ इनके सामने धंधा ही लक्ष्य होता है। 

अपने धंधे से ये सेवा को बहुत दूर ही रखा करते हैं लेकिन सेवा क्षेत्रों में पग-पग पर इन्हें धंधा ही दिखता है। सेवा के नाम पर पुरस्कार, सम्मान और अभिनंदन पाने की आदत पाले हुए लोगों में अधिकांश ऎसे हैं जो सेवा कार्यों के लिए अपनी जेब या घर से एक पैसा तक नहीं देते।

ये लोग सेवा के नाम पर भी  दूसरों से पैसा निकलवाने और खुद खर्च करने-करवाने में माहिर होते हैं। सेवा और धंधे में स्पष्ट सीमा रेखा होनी जरूरी है। हम जो सेवा करें वह निष्काम हो, इसमें किसी भी प्रकार से कुछ भी पाने की भावना न हो, तभी वह सेवा है। 

जिसमें सेवा के नाम पर कुछ भी पाने की इच्छा हो या मिल पाने की दूरदर्शी भावना हो, वह अपने आप में धंधे के सिवा कुछ नहीं है। धंधा करें, यह जीवन की जरूरत है लेकिन सेवा के नाम पर धंधा न करें। 

कुछ काम रोजाना मुफ्त में भी किया करें। हर काम में पैसा-उपहार या कृतज्ञता पाने की कामना करना अपने आप में लेन-देन का धंधा है और यह धंधेबाजी मानसिकता ही है जिसकी वजह से हमारा देश विषमताओं से घिरा हुआ है। हमने हर काम को धंधा मान लिया है और उसी के अनुरूप बर्ताव करते हैं।

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