कैलाश प्रसाद यादव की कविताएँ - लौटा फिर से प्यार

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    करवा चौथ - लौटा फिर से प्यार

चंदा देख रही चंदा में, सजन की सूरत, सजन का प्यार
आज सुहागिन सजी है फिर से, फिर से किये सिंगार।
  चंदा ढ़ूंढ़ रही चंदा को, दूर गगन के पार,
  निराहार दिन भर से फिर भी, न माँगे संसार,
  लंबी उम्र सजन की माँगे, माँगे सच्चा प्यार।
  आज सुहागिन सजी है फिर से, फिर से किये सिंगार।
करवॉ चौथ, पावन गंगा सा, निर्मल जिसकी धार,
जिनके साजन रूठ गये थे, चंदा के संग वे भी लौटे,
                      लौटा फिर से प्यार।
आज सुहागिन सजी है फिर से, फिर से किये सिंगार।

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                याद फिजा़ में रहती हैं.....

आती-जाती साँसें मुझसे, चुपके से कुछ कहती हैं...
आनी-जानी काया लेकिन, याद फिजा में रहती हैं
   अंग-अंग में घाव लगे हों, पोर-पोर भी घायल हो,
   मन भारी हो धरा के जितना, फिर भी सब कुछ सहती हैं...
   आनी-जानी काया लेकिन, याद फिजा में रहती हैं
इन नयनों से जो कुछ दिखता, वो तो केवल नश्वर है...
भूख, प्यास, एहसास शाश्वत, इन्हीं की नदियां बहती हैं...
आनी-जानी काया लेकिन, याद फिजा में रहती हैं
   दूर कहीं से बिन बोले ही, बाँह पसारे आती है,
   गोद बिठाकर सबको इक दिन, दूर कहीं ले जाती है....
   सदियों से वो लगी हुई है, सब कुछ करके देख लिया...
   नींद भी संग में ले गई अपने, सपने यहीं पे छूट गये,
   आशा-तृष्णा बचीं यहीं पर, आस-पास ही रहती हैं...
   आनी-जानी काया लेकिन, याद फिजा में रहती हैं
आती-जाती लहरें तट पर, ठहर-ठहर कुछ कहती हैं,
संग चलो पाताल दिखा दूं, आसमान से कहती हैं...
मंद-मंद पवन के झोंके, कलियों से कुछ कहते हैं...
फूलों के संग-संग भँवरे भी, घाव सदा ही सहते हैं...
पत्थर दिल इंसानों में भी, सपने अक्सर नर्म हुये,
दिल में ठंडा बर्फ है फिर भी, आंसू अक्सर गर्म हुये....
ऋतुऐं तो आनी-जानी हैं, यहां तो खुशबू बहती हैं...
आनी-जानी काया लेकिन, याद फिजा में रहती हैं
       
                        ''सनातन''
                     कैलाश प्रसाद यादव       

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