रविवार, 25 अक्तूबर 2015

तारा सिंह की कहानी - कुर्बानी का पुरस्कार

कुर्बानी का पुरस्कार
                                      ---डॉ० श्रीमती तारा सिंह
               
               जीवन सुख से विरत , रामलाल की जिंदगी में शायद ही कोई दिन ऐसा आया होगा, जब वह अपने गाँव के मंदिर में जाकर बाबा भोले के दर्शन किये बगैर घर लौटा हो । लोग उसके दुख-दर्द भरे कल्पना गीत के साथ सात्विक भावपूर्ण भजन सुनने के लिए अंधेरे मुँह वहाँ जाकर बैठे रहते थे । आज ऐसा पहली बार हुआ , जब रामलाल मंदिर परिसर में आकर भी, भोले से मिले बिना ही लौट गया । उसके दीप्त-शांत मुखमंडल पर लोट रही मलिनता की छाँह देखकर , वहाँ बैठे लोग सोचने लगे----’रहस्यों की प्रतिमा-सा दीखने वाला रामलाल अपने इष्टदेव से आज इतना नाराज क्यों है  ? अचानक इसमें ऐसा बदलाव कैसे आ गया कि पाप-पुण्य की दुहाई देने वाला, आज खुद ही धर्म के सर्वोच्च आसन से उतर गया ?’
तभी वहाँ उपस्थित जनों में से किसी ने कठोरता से सजग होते हुए आवाज लगाई, पूछा---- ’ रामलाल चाचा ! आज बिना कुछ सुनाये लौट जा रहे हो ; तबियत ठीक तो है ?’
रामलाल सिर झुकाये, बिना कुछ बोले मंदिर परिसर से निकल गया । उसका हृदय-मन , जैसे गंगा की लहरों पर तैरता हुआ, उसके पहुँचने से पहले पत्नी आनन्दी के पास पहुँच गया । वह थके पाँव घर कब पहुँचा, उसे पता भी न चला; लेकिन जब उसकी आँख पर से चिंता की परत हटी तो देखा, पत्नी आनन्दी उसके पाँव से जूते निकालकर पानी का गिलास लिये उससे कह रही है, ’रामलाल, थके लग रहे हो, थोड़ा पानी पी लो ।’
रामलाल, पानी का गिलास अपने हाथ में लेते हुए, रोज की तरह पूछा--- कोई मिलने भी आया था ?
रामलाल की बात सुनकर आनन्दी की आँखें तर हो आईं, बोली---- नहीं, कोई तो नहीं आया । ऐसे भी तुम जिसकी राह निहारते बूढ़े हो गये , वह कभी नहीं आयेगा । इसलिए , अब उसकी स्मृति-जाल से बाहर निकल आओ ।
रामलाल ,पत्नी की बात से क्रोधित हो उठा, बोला ---- आनन्दी, कभी तो सिद्धांतों से हटकर बात किया करो । अरि ! मैं जानता हूँ, मेरे जीवन के काले पट पर आसमां में जगमगा रहे ,उज्ज्वल तारे नहीं हैं । ऐसे में मेरा अंधकारमय भाग्य दीप्तिमान तारे कहाँ से लायेगा ।
आनन्दी ,पति की बातों से व्यथित हो, अपनी मनोव्यथा को मंद-मुस्कान की आड़ में छिपाती हुई कही---- कोई मिलने आये, तब तो मैं बताऊँ ? तुम रोज एक ही प्रश्न लिये घर में घुसते हो--- ’कोई मिलने भी आया था क्या ? सच पूछो , तो मुझे तुम पर तरस आती है , मैं तंग हो जाती हूँ । क्या तुम अपनी कुर्बानी का पुरस्कार लिये बगैर नहीं रह सकते, जब कि तुमको मालूम है, रक्त-शोषकों का कोई धर्म नहीं होता ; फ़िर भी तुम उस अधर्मी से धर्माचरण की आशा क्यों रखते हो ? इतिहास गवाह है, अधर्मी का चित्त कभी धर्म की ओर नहीं झुका है , बावजूद तुम हो कि , उसे मर्यादा के बंधन में बाँधना चाहते हो । मेरी सुनो तो---’ वह कभी नहीं बँधेगा, क्योंकि वह धर्म को अपने स्वार्थ के काँटे पर तोलता है । ’
आनन्दी के कठोर वचन से रामलाल विचलित हो उठा, बोला---- माँ-बाप को भी ?

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आनन्दी, दर्द की हँसी , हँसती हुई कही----- हाँ ! माँ-बाप को भी ,क्योंकि उसके पास औचित्य के काँटे जो नहीं होते ।
रामलाल , व्यथित हो कहा---- तो क्या संसार में आदर्श का निर्वाह करना केवल माँ-बाप के लिए है, बच्चों के लिए नहीं । अगर यही सच है ,तो वह मुझे पिता बोलकर संबोधित क्यों करता है ? क्या यह उसका चित्त-विनोदार्थ है ?
आनन्दी सगर्व हो बोली---- नहीं रामलाल, यह चित्त-विनोदार्थ नहीं बल्कि,यह तुम्हारा उपहास स्वरूप, पिता बनने का पुरस्कार है । देखते नहीं , वह अपना शुष्क त्याग दिखाकर ,तुम्हारा अपमान कैसे करता है  और जहाँ वह थूक फ़ेंकता है, वहाँ तुम अपना खून बहाने तैयार रहते हो ।
रामलाल, आनन्दी के दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए कहा---- हाँ, तुम ठीक कहती हो, आनन्दी । कुछ दिनों से मैं भी अनुभव कर रहा हूँ कि जिस उपवन को मैंने अपने भागिरथ परिश्रम से, अपने हृदय-रक्त से सींचकर सुंदर और आकर्षक बनाया, वहीं मैं खुद को परित्यक्त और उपेक्षित खड़ा पाता हूँ ।
रामलाल की बातों से , आनन्दी का विषय-शून्य हृदय, व्याकुल हो गया । वह कातर दृष्टि से रामलाल की ओर देखती हुई कही ---- रामलाल ! तुम जिंदगी के पिछले पन्ने को उलटाकर क्यों पढ्ने जाते हो ? आखिर क्या जानना चाहते हो ? अरे, जिसने माँ की विभूति को नहीं समझा, तुम उसी के चरणों पर नित अपनी त्याज्य अभिलाषा को निछावर करते हो । आखिर तुम एक सजीव मनुष्य हो या कोई स्मृतियों का पुतला ।
रामलाल अपने भवों से पानी पोछते हुए कुतूहल हो पूछा—-- आनंदी हमारी संतान की बेरुखी के अग्नि-कुंड में इतनी ज्वाला कहाँ से आई, कि जिसके ताप में हम दोनों इतने दूर रहकर भी झुलसे जा रहे हैं ? क्यों उसका हृदय-अंक , हम दोनों के होने की शीतलता,अनुभव नहीं करता । तुम कहती हो, ’ मैं अपनी अभिलाषाओं का दफ़न क्यों नहीं कर देता, तुम्हीं कहो, कैसे करूँ ? जिसे आज भी मैं अपनी आँखों की ज्योति समझता हूँ, उसके न चाहने के बाद भी, मैं हर वख्त उसे अपने साथ रखता हूँ ; अपनी दुख-गाथा सुनाता हूँ । तुम इसे मेरी दुर्बलता कहो या पागलपन; बेशक कह सकती हो, लेकिन यही सच है कि , अतीत मेरे साथ वर्तमान से ज्यादा सजीव और प्रत्यक्ष बनकर रहता है । पति की बात सुनकर आनन्दी के आँसू भरी आँखें मुस्कुरा उठीं और एक दर्द की हँसी बिखेरती हुई बोली---- सच पूछो तो रामलाल, तुम जैसे उच्च- विचारक के साथ रहने में मुझे डर लगता है ।
रामलाल चकित होकर पूछा------ ऐसा क्यों ?
आनन्दी बोली----- इसलिए कि तुम्हारे दिव्य विचारों से मेरा घायल- हृदय ,पीड़ा से तड़पने लगता है । जीवन के अकेले दिनों को याद कर उतना कष्ट नहीं होता, जितना तुम्हारी बातों में घुले दर्द से होता है ।
फ़िर वह पति की ओर दयाभाव से देखती हुई बोली----रामलाल ! मैं तुम्हारी त्यागमय प्रवृति का अनादर नहीं कर रही हूँ , मगर यह बात भी सच है , कि तुम पुत्र-स्नेह में उसके आगे भिखारी बन उससे सहयोग की भीख मांगते हो , तभी तो वह तुम्हारा अपमान करता है । अरे ! एक सुंदर, सुगंधमय फ़ूल अगर यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि उसकी हस्ती कीचड़ से सनी जड़ से है, तो तुम क्या कर सकते हो ?
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