शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

हीरानंद देवांगन की कविताएँ

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अलविदा

ये जिंदगी कितनी खुश पहेली है

जितना सुलझाना चाहो उतना उलझता जाता है

कभी रिश्तों में , कभी पाने खोने की होड़ में

कभी बिल्कुल अकेले , शांत कुछ सोचती जिंदगी

खुशियों को पाने की चाह में उधेड़ बुनती जिंदगी

हर पल अनजाना सा लगता है पर

लगता है सब जान लिया

 

भीड़ के अथाह समुद्र में , दम तोड़ती जिंदगी

सुख पाने की चाह में दुखों का पहाड़ खड़ा है

फिर भी खुश रहने की जिद पर अड़ा है

कल जो रिश्ते फूलों की सेज पर दुलहन की तरह बैठी थी

वो आज अपने कांटों की ताकत दिखा रही है

उस कांटों से जिंदगी महसूस करती है चुभन को

अमृत के प्याले जैसे अमरत्व को तराशते ये रिश्ते

आज न जाने क्यूं जहर का कड़वा घूंट बन गए हैं

इसे पीने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है

वक्त आ गया है इसे पीकर जिंदगी के रिश्तों को

कह दूं अलविदा

 

चौराहे पर

कविता किसी चौराहे पर खड़ी

कोई पागल औरत नहीं है

कि जिसे उठाया पत्थर और मार दिया

कविता दहलीज पर खड़ी

किसी भिखारन की तरह भी नहीं

कि उसे आंख दिखाकर दुत्कार दिया

कविता उस नई नवेली दुलहन की तरह होती है

जो पहले थोड़ा शर्माती है

धीरे धीरे घूंघट उठाती है

और कवि को अपनी

असीम सुंदरता का आभास कराती है

 

परंतु आज कविता के सुंदरता का एहसास नहीं

क्योंकि उसे सुंदर बनाने वाली कलम मेरे पास नहीं

आज कविता सचमुच चौराहे पर खड़ी

उस मटमैले धूमिल औरत की तरह ही है

जिसके लिए एक रोटी ही संघर्ष है जीवन का

आज कविता भिखारन की तरह

दर दर भटक रही है

शायद कविता को कभी वो दूल्हा मिल जाये

और फिर कविता दुल्हन की तरह खिल जाये

 

हीरानंद देवांगन , नयापारा ( रायपुर )

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