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शशिकांत सिंह "शशि" का व्यंग्य - साहित्य में पेंशन

व्यंग्य


                                         शशिकांत सिंह "शशि"
 
साहित्य में पेंशन
व्यंग्य
          लेखकों को निठल्ला मानने वाले अब चेत जायें। साहित्य की सनातन शत्रु, पत्नी को तो खुली चुनौती है कि साहित्यिक पति भी काम का प्राणी होता है। उसे बिना ताना मारे चाय-काॅफी मिलती रहनी चाहिए वरना पचास हजार से हाथ धोने पड़ सकते हैं। महिला साहित्यकार के साथ तो दुश्मन देश के घुसपैठियों जैसा व्यवहार होता है। वह लिखने बैठी नहीं कि फरमान-’बैठ गई पोथा ले के। चल चाय बना के ला।’ अब पेंशन की आस में तो पतिदेव भी चरणचंपण करते हुये प्रार्थना करेंगे-देवी कुछ ऐसा लिखो कि यश भारती प्राप्त हो जाये। विवाह के पहले शर्त रखी जायेगी-हमें तो बहू लेखिका चाहिए। 
लड़की कविता, कहानी लिखती हो तो दहेज नहीं लेंगे। बुजुर्ग साहित्यकारों की चांदी होगी। उनके पुत्र-पौत्र उनको इस उम्मीद में पुआ खिलायेंगे कि एक न एक दिन यश भारती प्राप्त हो ही जायेगा। यदि पेन्शन प्राप्त लेखक हैं तब तो पूछिये ही मत। बेटा बिना पूछे बीबी के साथ शाॅपिंग भी नहीं जायेगा। बिना पूछा बहू बैंगन का भर्ता तक नहीं बनायेगी। बीबी रोज रात में गंजे सिर में लाल तेल डालेगी और लंबी उम्र की कामना करेगी। नवोदित लेखक आकर पूछा करेंगे- दादा, यश भारती प्राप्त करने के टिप्स हमें भी बताओ न।’ दादा गर्व से मुस्करायेंगे।  

       सरकार का यह कदम मानवीय तो है ही आर्थिक दृष्टि से भी दूरगामी है। नगरों में कोचिंग संस्थायें खुलेंगी-साहित्यकार बनने के आसन नुस्खें। केवल दो महीने में लेखन सीखें और यश भारती पाये। लेखक बनने के कैप्सुल कोर्स भी कराये जायेंगे। कविता कैसे लिखें, कहानी लिखने के तीन तरीके, व्यंग्य बुटिक, इत्यादि नामों से किताबें बाजार में आयेंगी। बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा। 
पुराने साहित्यकारों को लेक्चर के लिए ले जाया करेंगे कोचिंग वाले। अंदरखाने भी वारे-न्यारे होंगे। दलाल, साहित्यकारों के घर का चक्कर काटेंगे और साहित्यकार दलालों के। दलालों का दावा होगा-अजी साहब, हमारी तो यशराज फिल्मस तक पहुंच है। यश भारती तो हम चुटकी बजाते दिला देंगे। अपने मुंह से अपनी तारीफ क्या करें लेकिन मंत्री जी का साला हमारा क्लासमेट है। मंत्री जी हमें भी साला ही समझते हैं। कितनों को तो हमने पद्मश्री, पद्मविभूषण वगैरह यूं ही दिलवाये हैं। हां, रीति-रिवाजों का पालन तो करना ही होगा। घोड़ा घास से यारी तो करेगा नहीं। साहित्यकार दलाल को कहेगा-भैया, हमने साठ किताबें लिख मारी हैं। हमारे मुकाबले में ये ससुर तिवारी, मिश्रा, वर्मा पानी भरते नजर आयेंगे। ये जब कंचे खेलते थे उन दिनों हमारी कवितायें धर्मयुग में छपा करती थीं। हम तो साहित्यिक अवहेलना के शिकार हो गये। नहीं तो ........आप यदि मंत्री जी से एकबार........खर्च की चिंता मत कीजिये। 

सामाजिक सौहाद्र इसी प्रकार बढ़ेगा। हां, यह हो सकता है कि आवेदकों की संख्या में आशातीत वृद्धि हो। सरकार को छंटनी के लिए एक अलग से विभाग बनाना होगा। ’साहित्यिक पेंशन विभाग’। यह विभाग आवेदन पत्रों की छंटनी करेगा और सत्पात्रों के नाम सरकार तक पहुंचायेगा। संभावना यह भी है कि आवेदको की बढ़ती संख्या को देखकर कहीं सरकार प्रतियोगिता का आयोजन न कर दे। 
’पेशन हेतू काव्यपाठ प्रतियोगिता’ प्रतिभागी अपनी चुनी हुई पांच कविताएं सुनायेंगे। अपनी कहानियां या व्यंग्य का पाठ करेंगे। प्रतियोगिता में किसी प्रकार की हिंसा न हो इसके लिए अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की जायेगी। कहीं वीर रस के कवि श्रृंगार रस वाले को मंच से फेंक दिये तो कानून टूटेगा। कठिनाइयां तो हैं पर सरकार का यह एक स्वागतयोग्य कदम है।
 
                                                                     शशिकांत सिंह ’शशि’
                                                                        7387311701
 
 
 
शशिकंात सिंह ’शशि’
पिता-स्व. रामाधार सिंह
माता- स्वर्गीया कांति सिंह
ग्राम-मड़पा मोहन
जन्म तिथि- 24.10.1969
पो- देवकुलिया
जिला-पूर्वी चम्पारण, बिहार
सम्प्रतिः-
पी जी टी  भूगोल
जवाहर नवोदय विद्यालय
शंकरनगर, नांदेड़ 431736
महाराष्ट्र
प््राकाशनः-
1. समरथ को नहिं दोष (व्यंग्य संग्रह ,2001)
2. ऊधो! दिन चुनाव के आए (व्यंग्य काव्य 2005)
3. बटन दबाओ पार्थ 2013 व्यंग्य संकलन
सम्मान-
हरिशंकर परसाई सम्मान (क्षितिज पत्रिका द्वारा ,2005 )
सिद्धिनाथ तिवारी व्यंग्यश्री सम्मान 2014
श्रीमती हेमलता साहित्य सम्मान 2014
सम्पर्कः-
मो- 07387311701 

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