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सराहें इन कर्मवीरों को

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डॉ0 दीपक आचार्य

आजीविका निर्वाह के लिए तमाम प्रकार के काम-काज करना इंसान की अनिवार्यता है और हम सभी लोग इसमें किसी न किसी रूप में जुटे रहते ही हैं।

अपनी प्रतिभा, हैसियत और व्यवस्थाओं के अनुरूप सभी को काम मिला हुआ है लेकिन कोई सा काम छोटा या बड़ा नहीं है, महत्त्वपूर्ण या गौण नहीं है बल्कि हर कर्म और उससे जुड़े इंसान का बराबर आदर-सम्मान और महत्त्व है।

हर प्रकार के कर्म की संसार को आवश्यकता है तथा इसके बगैर संसार के सामान्य काम-काज तक प्रभावित हो सकते हैं। इस लिहाज से न कोई इंसान छोटा-बड़ा है, न कोई सा काम।

समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्राें में बहुत सारे काम ऎसे हैं जिनमें मानसिक व्यापार हावी रहता है, ढेरों कामों में शारीरिक भावों को प्रधानता देनी पड़ती है। और  अधिकांश कर्म ऎसे हैं जिनमें मन-मस्तिष्क और शरीर सभी को लिप्त होना पड़ता है।

इसी प्रकार सारे कामकाजियों की दों किस्मे हैं। एक वे हैं जो एसी या नॉन एसी बंद कमरों में रहकर काम-काज या राज-काज करते हैं। इनसे अधिक संख्या उन लोगों की है जो बंद कमरों की बजाय क्षेत्र में काम करते हैं।

बंद कमरों की अपेक्षा क्षेत्र में काम करने वाले लोगों का काम-काज और परिश्रम किसी दृष्टि से कम नहीं आँका नहीं जा सकता। वास्तव में असली कर्मयोगी वे ही लोग हैं जो प्रकृति और सम सामयिक विषम हालातों के बावजूद संघर्षशील रहते हुए अपने काम करते रहते हैं। न बरसात की चिन्ता, न गरमी या सर्दी की।

बात सामान्य दिनों की हो या फिर किसी आकस्मिक आवश्यकता और प्रबन्ध के समय की। इन लोगों की कठोर ड्यूटी का कोई पैमाना नहीं हो सकता।

इस वर्ग में सर्वाधिक कठोरतम ड्यूटी और अनुशासन की बात करें तो हमारे पुलिसकर्मियों को सर्वोपरि रखकर देखना होगा जिनके लिए ड्यूटी उस वीर सैनिक के दायित्वों से कम नहीं है जो सीमा पर रहकर देश की रक्षा करते हैं और पूरे देशवासियों को हर तरह से बेफिक्र कर देते हैं।

बात सुरक्षा की हो या अपराधियों से मुक्ति दिलाने की, विशिष्टजनों से लेकर आम से आम आदमी तक की हिफाजत की जिम्मेदारी कोई निभाता चला आ रहा है तो वह है कि हमारा पुलिस महकमा।

पहले पुलिस सुरक्षा और खुफिया तंत्र तक ही सीमित रहा करती थी, राजद्वारों को ही सुशोभित किया करती थी। आज पुलिस आम जनजीवन में इतने गहरे तक प्रभाव रखती है जिसका कोई पार नहीं है।

जिन्दा इंसानों से लेकर मृतकों तक, धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक उत्सवों से लेकर सम सामयिक आयोजनों तक और आम जन जीवन से प्रत्येक कर्म से पुलिस का संबंध है।

पुलिस की मौजूदगी या दखल के बिना हम उत्सवों, आयोजनों और सुरक्षा के किसी भी काम  की निर्विघ्न पूर्णता की कल्पना नहीं कर सकते।

कितनी भीषण गर्मी, लू के थपेड़ों और गर्म हवाओं के मंजर हों, हमारी पुलिस, हमारा ट्रॉफिक मैन किस तरह अडिग खड़ा रहकर हमारी सेवा करता है, भारी बरसात में भीगते हुए किस तरह तरह रेस्क्यू ऑपरेशन में पुलिसकर्मी हमारी मदद को खड़े रहते हैं, हाडकँपाती सर्दी में किस तरह ये अपनी ड्यूटी को अंजाम देते हैं, इस दिशा में थोड़ी सी फुरसत निकाल कर हम सोचें तो लगेगा कि इन लोगों के बिना जनजीवन की सुस्थिरता और शांति की कल्पना बेमानी ही है।

अपने धर्म-कर्म, पारिवारिक और सामाजिक व्यवहार, उत्सवों, होली, दीवाली, राखी, दशहरा आदि पर्वों का आनंद भुलाकर जो लोग हमें उत्सवी आनंद के लिए सुरक्षित माहौल प्रदान करते हैं उनके जीवन में भी झाँक लेने की जरूरत है।

जो लोग अपनी रातों की नींद खराब कर हमारी मीठी नींद और शांति को सुरक्षित रखते हैं, जान जोखिम में डालकर परिस्थितियों, गुण्डे-बदमाशों और उनके संरक्षकों से लोहा लेते हैं, प्रभावशालियों के ताने सुनते हैं, जीवन के सारे तनावों को झेलते हैं, अनचाहे हालातों से दो-चार होते हैं, उन लोगों की जिन्दगी और कर्म को पूरी ईमानदारी से देखने और महसूस करने की जरूरत है।

अपवाद सभी जगह हैं और रहेंगे। यह अपवाद कुछ परिमाण में सभी जगह होते हैं। लेकिन अपवादों को छोड़कर स्वस्थ मूल्यांकन किया जाए तो हमें इस बात पर गर्व होगा कि खाकी वर्दी किस तरह हमारे व्यक्तिगत जीवन से लेकर सामुदायिक लोक जीवन और परिवेश तक में सुनहरे रंगों और शांति, माधुर्य, प्रसन्नता एवं सुकून भरे माहौल का अनुभव कराती रही है।

फिर खाकी जगत में आधे आसमाँ की भागीदारी भी अब निरन्तर बढ़ती जा रही है। पुलिस जैसी सख्त और कठोर ड्यूटी में आधे आसमाँ की सहभागिता सच में नए इतिहास का सृजन कर रही है।

अन्यथा कुछ वर्ष पूर्व तक यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि कुछ वर्ष बाद ऎसा समय आएगा जब महिलाओं की पुलिस में अहम् भागीदारी का दिग्दर्शन होगा।

आम सिपाही से लेकर बड़े से बड़े अफसर तक में अनुशासन की धाराओं के साथ कर्मयोग का जो परिदृश्य हमारे सामने है वह अत्यन्त सुकूनदायी है। हमें चाहिए कि केवल दोष ही दोष न दें, उन लोगों को सराहें जो हमारे चैन के लिए अपना आनंद गंवा कर दिन-रात हमारे लिए पूरे मन से जुटे हुए हैं।

कर्मयोगियों और कर्मयोगिनियों को सराहते हुए उन्हें प्रोत्साहित करना समाज का फर्ज है। और कुछ न कर सकें तो इनकी प्रशंसा करते हुए पीठ थपथपाएं और उनका हौसला बढ़ाएं।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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