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सुशील यादव का व्यंग्य - पुरूस्कार लौटाऊ व्यथा

धिक्कार है सुशील ! ,लेखक जमात, अपने -अपने पुरूस्कार लौटा रहे है तेरे पास लौटाने के लिए कुछ भी नहीं है ....?

तुमने क्या ख़ाक लिखा..... जो साहित्य-बिरादरी में स्थापित नहीं हुए ?

तेरे लिखे पर पुरुस्स्कार देने वालो की नजर ही नहीं गई ...?कम से कम ,एक अदद छोटे-मोटे पुरूस्कार मिलने की गुंजाइश तो पैदा हुई होती ......?साहित्य-बिरादरी के, घुंघराले-बालों में ‘जूं’ तक नहीं रेंगी ...?लगता है, मिडिल-क्लास वाली वेशभूषा ,रहन-सहन, ने तेरी गति, झोला लटकाए, टपोरी-राइटर से आगे बढ़ने न दिया, वरना ‘तोड़ती-पत्थर’ के टक्कर का साहित्य तू ने भी, मंनरेगा में काम करने वाली अधेड़ औरत पर लिखा था। ’कुकुरमुत्ता’ के काव्य सौन्दर्य बोध ने, तेरे लिखे में भी अपना घर बनाया था। कालिदास माफिक, मेघों को तूने जेठ-बैसाख की तपती दोपहरिया में लाकर, मोहल्ले-पडौस की, सुगढ़-कन्याओं को अपने बारे में सोचने पर मजबूर किया था। पंच-परमेश्वर जैसी धांसू न्याय-प्रियता, तेरे साहित्य के इर्द-गिर्द हुआ करती थी। आलोचक को, कुछ कहते नहीं बनता था। तुमने ‘गोरे लाल आवारा’ के छद्म नाम से सडक -छाप साहित्य लिखने में अपनी जवानी के कुछ साल नहीं बिताये होते तो साहित्य के आकाशदीप बन के छा गए होते। तुझे ऍन गरीबी की मार उस वक्त झेलनी पड़ी जब तेरी कलम से आग उगलने का समय था। तुमने नई-कविता ,नई-कहानी को, पचास सौ बरस पहले लिख कर मानो कूड़े-करकट के बीच फेक दिया ,लोगो की तब, नई-चीजों को समझने की समझ ही पैदा नहीं हुई थी।

पुरूस्कार देने वालों की ‘पलटन’ भी बेचारे बेबस थे। वे तुझे टंच करते और एक कोने, जिसे साहित्य में ‘हाशिया’ कहते हैं डाल देते।

तुझे गर पुरूस्कार मिला होता तो,यही आज आड़े वक्त में सम्मान पाने का एक और मौक़ा दे जाता है.... तू उससे खासा वंचित है ,शर्म कर....।

मुझे अपने आप को धिक्कारने का, ज्यादा मौक़ा नहीं मिला ,नत्थू सामने आ बैठा। मैं बिना वजह खुद को, अखबार समेटते हुए, दिखाने की चेष्टा में ,अखबार सेंटर-टेबल में रखते हुए उसे बैठने का इशारा किया।

नत्थू के आने के बाद, अखबार पढने की जरूरत, वैसे भी नहीं रहती।

वो ‘कालम बाई कालम’,तीन-चार अखबारों का निचोड़ , जिसे नुक्कड़ के ग्रामीण ‘चा- समोसा’ सेंटर में, आधी-चाय की कीमत चुका कर पढ़ा होता है ,मुझे हुबहू , पूरा, किस्से -कहानियों की तरह सुना डालता है।

अगर चश्मे को ‘रिचार्जे’ करवाने की कोई बात रहती, तो नत्थू बदौलत, मेरे काफी पैसे जो अखबार पढने में जाया होते, बचा करते।

नत्थू का खबर वाचन ,स्वत: की त्वरित टिप्पणियों पर, मेरी सविस्तार व्याख्या की अपेक्षा में सदैव रहता।

कभी वो कालिख-कांड में कालिख पोतने वाले ‘कुपात्रजन’ की, व्याख्या करने लेने के बाद ,कालिख पुतने वाले के प्रति, सहानुभूति का प्रदर्शन करने लगाता तो कभी दिल्ली बिहार की सैर बेटिकट घर बैठे करवा देता।

वो पहले कालिख-पोतने की घटना को शर्मनाक,प्रजातंत्र पर प्रहार ,अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर कुठाराघात आदि-आदि बोल के, मेरी ओर यूँ देखता, जैसे रंग का डिब्बा मै हाथ में लिए खड़ा हूँ .....। फिर अपनी बात में बेलेंस बनाने के लिए दूसरे पक्ष की ओर मुड़ जाता।

इंन दिनों नत्थू को प्राय: असमंजस की स्थिति में देखता हूँ। उसने कहा ,गुरुजी ये पडौसी मुल्क वाले भी गजब करते हैं ,मूली अपने मुल्क में उगा कर, बेचने इधर आ जाते हैं ,हवा खराब हो जाती है।

उधर हमारे जवान को बन्दूक की नोक में रखते हैं इधर लेखक-गवयै भेज कर सांस्कृतिक -चोचले की मरहम-पट्टी की बात करते हैं। अपना मुल्क ये सब सहेगा भला .....?

बिहार-चुनाव ,में क्या हो रहा है जानिये .....!जिनने महागठ्बन्धन का ठेका लिया था वो सीट बटवारे के फले दौर से ही उखड गया। वहां केम्पेन के दौरान चारा-किंग ,आरक्षण ,नरभक्षी ,विकास, बीमारू-राज,सरकारी-अनुदान, महादान ,जैसे जुमलों के बीच अचानक ‘धार्मिक पवित्र नानवेज’ जैसे मुद्दे उछल गए।

अपने तरफ एक लोकोक्ति है

“बाम्हन बाम्हन जात के, कुकरी पूजे रात के

कुकरी सिरा गे ,बाम्हन रसा गे “

ये नानवेज का मामला बस ऐसे ही दिखता है ,बाम्हन जो रात को मुर्गे को पका लेता है और किसी कारण उसे खाने से वंचित होना पड़ता है तो बाम्हन के ‘रिसा’ जाने से कोई नहीं रोक सकता।

अपना लोकतंत्र बाम्हन है। कब किस बात से रूठ जाए कह नहीं सकते। एक चिंगारी अगर जोरों से सुलग गई तो खतरा परमाणु विस्फोट के बराबर का होगा।

कुछ ने इस ‘नानवेज’ मसले पर बढ़-चढ़ के बोला तो किसी ने एकदम दम-साध लिया, कि अपन को बोलना ही नहीं है। उनके न बोलने के कई मतलब थे ,बड़ा मतलब सामने चुनाव से ताल्लुक रखे था।

जनता कहती है ,वे बड़-बोले हैं मगर लगाम कहाँ लगाना है, बखूबी जानते हैं।

नत्थू,देशव्यापी चर्चा को आगे बढाने के मूड में दिख रहा था।

मुझे बातों का गेयर बदलना अच्छे से आता है सो मैंने कहा ,नत्थू मैं लेखकों के सम्मान बाबत सोच रहा था। आये दिन पढ़ रहे हैं आज इस साहित्यकार ने अपना पुरूस्कार लौटाया कल उसने ...सिलसिला थम नहीं रहा है ?

राजनीतिग्य तबके में इसे आडंबर ,उथली वाह-वाही पाने का नाटक करार दिया जा रहा है। मैं सोचता हूँ उनके साथ नाइंसाफी है। वे किस विरोध में हैं पहले वो तो जानो .....?

सत्ता काबिजों को लगता है कि पिछली सरकार के ये ‘ढिंढोरची’ हैं। मगर एक पहलू ये है कि लेखक कितनी मेहनत के बाद ये सम्मान का हक़ पाता है उसे उसके सिवा कोई नहीं जानता। वह किसी उथले कारणों से अपने सम्मान को त्याग नहीं देगा ....?समझो वे अपनी जीवन भर की पूंजी को तज रहा है। सत्ता काबिजों को ये महज मखौल लगता है। तरह-तरह के तंज किये जा रहे हैं ,मशवरे दिए जा रहे हैं। उनका मानना है ,पानी सर से ऊपर अभी नहीं हुआ जा रहा है ......?

नत्थू ! आज बड़ी इच्छा हो रही है ,मै भी अपना सम्मान-पुरस्कार लौटा दूँ। इस अदने लेखक को, लिखने के शुरुआती दिनों में , किसी गाव के ‘सरपंच’ ने ,उसकी चाटुकारिता में लिखे चार-लाइन की बदौलत शाल-श्रीफल और एक सिक्के से नवाजा था।

नत्थू अब वो बुजुर्ग तो इस जहाँ से कूच कर गए हो .....?,पंचायत में ये जमा करवा देना और हाँ, अपने ‘हरिभूमि’ वाले पत्रकार बाबू को ये खबर जरुर कर देना।

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

susyadav7@gmail.com ०९४०८८०७४२०

 

१८.१०.१५

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