गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

विजय वर्मा की कविता - चाँद

  चाँद

चाँद बहुत चकित है -----

' इस धरा को क्या हुआ है ?'

धरा क्यों इतनी व्यथित है ?

पयोनिधि भी है मलिन सा

चमक खो चुके कालीन सा ।

पवन में है ज़हर भरा

है इसीलिए दुखी धरा।

द्रुमदल हुए निर्जीव-से

अब क्या पूछें? किस जीव से ?

तटिनी हुई बदरंग अब

प्रकृति के संग ही

छिड़ी  हुई है जंग अब।

इंसानों की करतूत से

प्रकृति भयभीत है।

यह तो इंसानों की हार है।

आपको लगता है यह जीत है ?

चाँद इसीलिए चकित है।

 

V.K.VERMA.D.V.C.,B.T.P.S.[ chem.lab]

vijayvermavijay560@gmail.com

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