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धीरेन्द्र गर्ग का आलेख रमंते तत्र देवता !!!!

धीरेन्द्र गर्ग 
सुलतानपुर उत्तरप्रदेश 
रमंते तत्र देवता !!!!

वैदिक सभ्यता की दुहाई देने वाले भारतीय समाज में आज महिलाओं की स्थिति बेहतर नही है जबकि उस वक़्त महिलाओं की दशा अच्छी थी चाहे वह सम्पत्ति में हो या शिक्षा में। भारत का समाज मोटे तौर पर पुरुष प्रधान है लिहाज़ा महिलाओं की आज़ादी का मसला पुरुषों की इच्छा का मोहताज़ हो जाता है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम  की रिपोर्ट बताती है कि भारत में लैंगिक असमानता बढी है। लैंगिक समानता सूचकांक में भारत 13 स्थान लुढक कर अब 114वें स्थान पर पहुँच गया है। ऐसे में यह हम सबके लिए चिंता का विषय है। आज हर क्षेत्र में महिलायें पुरुषों से कन्धा मिलाकर चल रहीं हैं फिर भी अभी आधी आबादी की बेहतरी के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। कहा जाता है कि यदि आप किसी भी समाज को करीब से जानना चाहते हैं तो सर्वप्रथम वहां रह रहीं महिलाओं की स्थिति जानिये। सतह पर इज़्ज़त की बात तो स्वीकारी जाती है किन्तु अधिकारों के मामले में महिलाओं का दायरा अभी भी बहुत सीमित है। 
बाल विवाह के चंगुल में आज देश की 49 फीसदी ऐसी लड़कियां है जो 18 साल से कम उम्र में ही बधू बन जाती हैं। कच्ची उम्र में विवाह होने का ही यह नतीजा है कि आज भी अनुमानतः एक लाख बच्चों के जन्म पर दो सौ माएं दम तोड़ देती हैं। कम उम्र में विवाह होने के कारण लड़कियों में गर्भधारण से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं होने की सम्भावना ज्यादा बढ़ जाती है। मातृत्व मृत्यु की बढ़ती दर महिला स्वास्थ्य और विकास के लिए गंभीर चुनौती है। हमें समाज से बालिका बधू नामक रोग को खत्म करना होगा। वैसे भी हमारे समाज का बुराईयों से पुराना रिश्ता है लेकिन इसमें सबसे दुखद यह है कि इसकी बुनियाद में एक ईंट बाल विवाह का भी है। ऐसी ज्यादातर घटनाएं ग्रामीण भारत में होती हैं। देश के कुछ शहरों को आधुनिक तकनीक या मैट्रो शहर बना देने से गावों की बदतर स्थिति नही छुप सकती। गांधी जी ने कहा था असली भारत तो गाँवों में बसता है। 
आज यदि हम उस स्थिति का विवेचन करें तो हमारे सम्मुख गरीबी, भुखमरी, अभाव के सिवाय ज्यादा कुछ नही दिखता। हमारे यहाँ मात्र 25.51 फ़ीसदी महिलाएं ही रोजगार में हैं। बाकी या तो घरों में चूल्हा-चौका करती हैं या तो उतना पढ़ ही नहीं पाती जितनी सामान्यतः जरुरत है। इस हिस्सेदारी को और भी बढाने की जरूरत है जिससे कि महिलाएं आत्मनिर्भर बनकर अपना और समाज का विकास कर सकें। साक्षरता के मामले में जहाँ पुरुषों की साक्षरता 82.14 प्रतिशत है वहीं मात्र 65.46 प्रतिशत स्त्रियां साक्षर हैं। भारतीय समाज महिलाओं के मुद्दों को किस तरह नज़रअंदाज़ कर रहा है यह इस बात से ही पता चलता है कि वर्षों से चल रही बहस के बावजूद महिलाओं के लिए संसद में सीटों के लिए आरक्षण के मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच सहमति नही बन पायी है। 
लोकसभा में मात्र 11.23 फीसदी ही महिला सांसद हैं। आँकडों को छोड़ यदि सामान्य स्तर पर बात करें तो पाते है कि महिलाओं के पिछड़ने की एक बड़ी वजह देश की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियाँ भी रहीं हैं, जिसमें ज्यादातर घरों में बचपन से ही लड़कों को ही वरीयता मिलती है चाहे खान-पान और वस्त्रों का हो या शिक्षा का। ऐसी स्थितियां लड़कियों को बचपन में ही मानसिक रूप से छोटी कर देती हैं। हमारे देश में अधिकतर महिलाओं को विरासत की सम्पति नही मिलती। नए कानूनों के प्रावधान के बाद भी सामान्यतः यह हक़ महिलाओं को नही मिलता। 
बहन इसलिए  भी सम्पति में दावा नही करती क्योंकि उसे भाइयों से अपने सम्बन्ध बिगड़ने का डर रहता है इतना ही नही पत्नी के रूप में पति की जमीन में उसका कोई स्वामित्व भी नही होता है। जब तक इस मानसिक समस्या का स्थायी समाधान नही हो जाता तब तक महिलाओं की स्थिति सुधारने की बात बेमानी ही है। आज हम साक्षर जरूर हुए हैं किन्तु हमारा ज्ञान कहीं खो सा गया है। 
मुझे लगता है कि इन समस्याओं के पीछे सिर्फ अज्ञानता ही जिम्मेदार नही है बल्कि सामाजिक रूढ़ियाँ और मान्यताएं भी इनका प्रमुख कारण हैं। तभी तो शाहबानों जैसी महिलाएं सुप्रीम कोर्ट से तो मुकदमा जीत जाती हैं लेकिन समाज उनकी अपील को सिरे से ठुकरा देता है। देश का कोई ख़ास हिस्सा नहीं है जो इससे पीड़ित है बल्कि पूरा देश ऐसी घटनाओं से वाबस्ता है। अगर इन चुनिंदा क्षेत्रों मे ही महिलाओं को सशक्त बनाने के ठोस प्रयास हों तो भी हालात बदल सकते हैं।

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