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दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - अपनी सीमा में रहें

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जो जहाँ है, जैसा है वैसा ही बना रहे तो किसी को कोई समस्या ही नहीं रहती। न खुद के लिए कोई समस्या खड़ी होती है, न औरों को कोई समस्या आती है। जहाँ यथार्थ, वास्तविकता और मौलिकता होती है वहाँ किसी भी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होती बल्कि सब कुछ सुव्यवस्थित रूप से चलता रहता है।

जहाँ भी लोग अपनी मौलिकता के साथ पेश आते हैं वहाँ सभी प्रकार से स्थितियां शांत और मस्त बनी रहती हैं लेकिन जहाँ कहीं किसी भी अंश में कृत्रिमता होती है वहाँ सभी प्रकार के आडम्बर, पाखण्ड, झूठ-फरेब, कुटिलताएं और अधर्म अपने आप साथ हो जाते हैं क्योंकि कृत्रिमता को निरन्तर बनाए रखने के लिए इन सभी का साथ जरूरी होता है।

सभी लोग अपनी-अपनी प्रतिभा, सामर्थ्य और बहुआयामी हैसियत के मुताबिक काम करते रहें, उसी के अनुरूप अपने स्वभाव और व्यवहार का पालन करते रहें तो किसी को कुछ भी कहने की जरूरत कभी न पड़े। न कहीं कोई अशांति दिखे, न किसी को कोई परेशानी हो तथा न कहीं किसी भी प्रकार की उद्विग्नता या तनाव हो।

लेकिन दुर्भाग्य से ऎसा हो नहीं पा रहा। हर आदमी सुविधाभोगी होने लगा है, अधिकारों की चाहत रखता है पर कर्तव्यों को भुला बैठता है या कि उनके प्रति उदासीन होकर दूसरे काम-धंधों में अधिक रुचि लेने लगता है।

लोग चाहे जिस क्षेत्र में हों, अपने  लिए निर्धारित सुख-सुविधाओं और संसाधनों में संतुष्ट नहीं रहते बल्कि इनकी निगाह अपने से ऊपर वालों को प्राप्त हो रही सुख-सुविधाओं और वैभव पर रहती है और इसे पाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं।

इनमें बहुत सारे पिछले दरवाजे से घुस आते हैं, बहुत सारे कार्यवाहक होकर सुख भोगते रहते हैं और अधिकांश लोग अनधिकृत चेष्टा करते हुए सब कुछ पा जाने के फेर में दिन-रात लगे रहते हैं।

एक गरीब, अनपढ़ या सीधा सादा इंसान अपनी हैसियत और प्रतिभा को अच्छी तरह जानता है और उसी के अनुरूप अपनी सीमाओं में रहकर बर्ताव करता है तथा जो कुछ मेहनत से प्राप्त होता है उससे खुश रहता है, अपनी मस्ती में जीता है, किसी को परेशान नहीं करता, कोई उससे दुःखी नहीं होता।

लेकिन अपने आपे और सीमा से बाहर जाकर देखने और पाने की तलब का यह महारोग उन लोगों में अधिक देखा जाता है जिन्हें हम बुद्धिजीवी मानते हैं या जिन लोगों को अपनी बुद्धि के भरोसे कुछ भी कर डालने का भ्रम रहता है।

कतिपय अपवादों को छोड़ दिया जाए तो इन लोगों की खासियत यही होती है कि ये सदा-सर्वदा वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं और हमेशा वह पाना चाहते हैं जो अपने से ऊपर के पायदान वालों के लिए निर्धारित है, चाहे जिस तरह भी प्राप्त हो सके।

इसके लिए किसी भी सीमा तक जाने, किसी भी प्रकार के समझौते करने या कि समीकरण बिठाने के लिए ये लोग उन्मुक्त हैं। मानवीय मूल्यों को खूंटी पर टांग कर भी अपने काम निकलवाने या खुद को प्रतिष्ठित करने में इन्हें कोई लाज-शरम नहीं आती।

इनका एकमेव मकसद अपने आपको हमेशा प्रतिष्ठित और वैभवशाली बनाए रखना है और इस परम उद्देश्य के आगे इनके लिए पूरी दुनिया गौण है। इनमें से कोई भी इंसान उन लोगों की ओर नहीं देखना चाहता जो इनके नीचे के पायदानों पर होते हैं।

कारण यह है कि इनकी भोग-विलासी प्रवृत्ति और छीना झपटी की संस्कृति के आगे मानवीय मूल्य और संवेदनशीलता का कोई वजूद नहीं रहता। इस मामले में इन्हें आदमी न कहकर कियोस्क या किराने की दुकान कहना ज्यादा प्रासंगिक होगा।

अपनी सीमा रेखाओं  से बाहर झाँकना और पाने के लिए जीभ लपलपाना या कि हाथ फैलाना-पसारना, हाथ मारना आदि सब कुछ वे लोग करते हैं जिन्हें अपने दायरों या प्रतिभा के भविष्य पर कोई भरोसा नहीं होता।

ये लोग एक जगह रहकर बिना कुछ मेहनत किए ऊपर की श्रेणियों के लाभों और सुखों को अपना बनाना चाहते हैं। ये लोग यह भूल जाते हैं कि उन्हें जिस काम के लिए लगाया गया है, जो कुछ मिल रहा है, वह उनकी प्रतिभा और कार्य मूल्यांकन के आधार पर है।

इसमें अभिवृद्धि चाहें तो वे अपनी प्रतिभाओं के बूते निर्धारित रास्तों का उपयोग करते हुए सब कुछ पा सकते हैं लेकिन हम नियम-कायदों और निर्धारित रास्तों या मर्यादाओं को दरकिनार कर बिना परिश्रम के वह सब कुछ पा जाने के उतावले हैं जो हमसे ऊपर की श्रेणी के लोगों को मिल रहा है।

इसे पाने के लिए हममें से कई सारे महारथी ऎसे भी हैं जो सकारात्मक प्रयासों की बजाय नकारात्मक कामों में जुटे रहकर अपने समकक्ष या वरिष्ठों का नीचा दिखाने और उनके अधिकारों को अपने कब्जे में लेकर सारी सुख-सुविधाओं और वैभवों का भोग करने और इन्हें निरन्तर बनाए रखने के लिए निरन्तर प्रयास करते रहते हैं।

ऎसे ही लोगों के कारण से समाज में सज्जनों और प्रतिभाशाली लोगों को हमेशा दुःख, पीड़ाओं और तनावों का सामना करना पड़ता है और वे समाज की अपेक्षित सेवा के संकल्पों को इन नुगरों की वजह से पूरा नहीं कर पाते।

जो लोग अपने से नीचे पायदानों पर हैं उनकी पीड़ाओं, समस्याओं को देखें, निराकरण के प्रयास करें और इनके प्रति संवेदनशील रहें तो हम अपने आपको अपने आप ऊपर पाएंगे।  अपने दायरों में रहकर काम करें, औरों के अधिकारों का हनन न करें, न अपने आपको उनसे ऊपर दिखाने की कोशिश करें जो हमसे बड़े, अनुभवी और ऊपर के ओहदों पर हैं।

सब लोग अपनी सीमाओं में रहकर समाज और देश के लिए काम करें तो किसी को किसी से कोई परेशानी ही न हो। दुनिया की बहुत सारी समस्याएं इसी कारण से होती हैं कि हम अपने दायरों से बाहर निकल कर सोचने और करने लगे जाते हैं जो कि मर्यादाओं का सीधा सा उल्लंघन है। सभी को चाहिए कि अपनी हैसियत को पहचानें और उसी के अनुष्प बर्ताव करें।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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