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हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन का व्यंग्य - एक बार में ही क्यों नहीं मरता?

स्कूल में पढ़ाई के दरम्यान छात्र हार्दिक पूछ रहा था गुरूजी से। गुरूजी , मेरे दादू कुछ वर्ष पहले दुनिया से चले गए थे , तब हम लोगों ने अपने दादू को बहुत नम आंखों से बिदा किया था। एक बार दुनिया से चले जाने के बाद , वे दुनिया में कभी नहीं लौटे। पर रावण इस वर्ष मरता है , अगले वर्ष मरता है ...। प्रत्येक वर्ष जिंदा हो जाता है। जब यह मरता ही नहीं , तब प्रत्येक वर्ष , मारने का ये दिखावा क्यों गुरूजी ? क्या इनके कोई वंशज नहीं हैं ? क्या साल दर साल इन्हे मारने पर , उनको दुख नहीं होता होगा ? क्या रावण एक ही बार में , दुनिया से पूरी तरह विदा नहीं हो सकते ? बच्चे की जिज्ञासा और प्रश्नों की जटिलता ने झकझोर दिया गुरूजी को। “ कल बताने की बात ने ” - रात भर करवट बदलने मजबूर कर दिया – गुरूजी को। सवाल दिखने में छोटा था , किंतु उत्तर छोटा नहीं हो सकता। फिर बच्चों को समझाने का तरीका क्या हो ? चिंतन में बीत गई सारी रात।

गांव में प्रत्येक दशहरा में नाटक मंडली के द्वारा नाटक का मंचन किया जाता था। कक्षा में पहुंचते ही गुरूजी ने इस वर्ष नाटक करने की जिम्मेदारी , इन्ही बच्चों के साथ अपने ऊपर लेने की बात बताते हुए कहा – इस वर्ष “ रावण - बध “ का नाटक आप सभी बच्चों के द्वारा किया जाना है। आप सभी , अपने - अपने योग्य पात्र का चयन कर लीजिए। पर एक शर्त है जो बच्चा जिस पात्र का अभिनय करेगा उसे , उस पात्र को जीवंत बनाना होगा। बच्चे समझे नहीं। गुरूजी ने कहा – जीवंत का मतलब ये कि , जिसे जिस का पात्र को अभिनीत करना है वह अपने आप को आज से ही वही मानकर , उसी की तरह अपनी आदत बनाने का अभ्यास शुरू करे। उससे क्या होगा गुरूजी ? इस सतत अभ्यास से यह होगा बेटा कि जिस दिन नाटक का मंचन होगा , वानर रूप धारी बच्चा सचमुच का वानर प्रतीत होगा , राम रूप धारी सचमुच का राम लगेगा , आदि – आदि .....। बच्चों ने कहा - समझ गए गुरूजी , इसका मतलब यह कि पात्र की आदतों को अपने व्यवहार में ढालेंगे तो नाटक केवल नाटक न होकर , जीवन्त प्रस्तुति हो जाएगी।

अब बताओ , राम कौन बनेगा ? सभी के हाथ ऊपर उठ गए। अरे ! सभी लोग राम बनोगे तो , बाकी पात्र को कौन अभिनीत करेगा। एक काम करिए – कल आप सभी अपने मम्मी पापा को पूछकर आयें , कि उन्हे क्या बनना है ? पर उन्हे , उन पात्रों के जीवन का अभ्यास करने की बात भी जरूर बताना होगा।

दूसरे दिन कक्षा में सन्नाटा पसरा हुआ था। राम बन पाने की ललक एकाएक सभी के चेहरे से नदारद हो चुकी थी। गुरूजी के आते ही , बिना कुछ पूछे , एक धन्ना सेठ का सुपुत्र कहने लगा – गुरूजी मैं राम नहीं बनूंगा। पर कल तो तुम ...... बात पूरी नहीं हो पाई गुरूजी की। हां कल तक मैं बहुत उत्साहित था , पर मुझे आज पता चला कि राम बनने की योग्यता नहीं है मुझमें। तुझमें योग्यता है बेटा। मैं तुम्हारे पापा से बात करता हूं। गुरूजी प्लीज ! मेरे पापा से बात मत करिये। पर क्यों बेटा ? वही तो मुझे रोक रहे हैं राम बनने से। वे खुद सुबह से सामान तौलते वक्त .....गड़बड़ी शुरू करते है , हिसाब इधर उधर कर , अधिक से अधिक लूट खसोट करते हैं। मां सुबह से उठकर , हल्दी मिर्ची में मिलावट करती है , और बड़ा भाई सुबह से प्याज की जमाखोरी में लगा रहता है। पढ़ाई के बाद उन लोगों के इन सभी कामों में , संझा बिहनियां मुझे भी हाथ बंटाना पड़ता है। अब आप बताइए गुरूजी , राम बनने के लिए मेरे पास वक्त कहां है ? कौन सिखाएगा मुझे राम की आदत ?

गुरूजी मैं भी राम नहीं बनूंगा - सरपंच का बेटा था वह बालक। चुनाव का वक्त है , मेरे घर में चेपटी की पेटियां रखी हैं , जिसे गिनने की जिम्मेदारी मेरी है। मेरे घर में पैसों का खजाना दोनों हाथों से लुटाया भी जा रहा और बटोरा भी जा रहा है। मेरे बाबा , सामान से अधिक आदमी की खरीद - फरोख्त में लगे हुए हैं। राम की आदतों का अभ्यास तो बड़ी दूर की बात है , राम का नाम लेवा भी मेरे घर में , कोई नहीं मिलेगा। हां आप कहेंगे तो मै , रावण बन जाऊंगा , क्योंकि इसके लिए किसी अभ्यास की जरूरत नहीं , पैदा होने के बाद से सीख रहे हैं हम।

मैं भी नहीं बनूंगा। कौन है .......। गुरूजी मैं – विकासखंड के सबसे बड़े अधिकारी का बेटा है वह। मेरा घर किसी भी काम को वैध करने के तरीके का अनुसंधानशाला है। कोई भी अपना उल्टा सीधा काम पैसे के बल पर करा ले जाता है। रावण के किसी आदमी ने , यदि जंगल न जाने के लिए , मुझे नाटक के समय पर पैसों का लालच दिया , और मैं , अपने सुसंस्कारों की वजह से मुफ्त के पैसों का लोभ नहीं छोड़ पाया , मतलब , आपका यह राम बिक गया , तब कौन मारेगा रावण को ?

इतनी देर से अपनी बारी का इंतजार कर रहा था , वह किसी दरोगा का बेटा था। मैं तो , राम बन ही नहीं सकता हूं गुरूजी। मेरे घर में अपराधियों को कैसे संरक्षण देना है , इन्हे अदालत के जाल से कितना समय तक कैसे दूर रखा जा सकता है , यही गणित चलता है। रावण हमारे दोस्त हैं , हम उन्हे कैसे मार सकते हैं ?

हिम्मत आ गयी इसे भी। कर्मचारी पुत्र था वह। गुरूजी , मुझे माफ करिये। हम राम की तरह मिल बांट कर खाने में विश्वास रखते हैं। परंतु राम और हममें एक अंतर यह है कि वह अपनी सम्पत्तियों को बांटते थे , हम केवल दूसरे की। सरकार हमें इतना वेतन नहीं देती कि हम अपना घर भी चला सकें , हम अपनी सम्पत्तियां बांटने लगे तब हम क्या खायेंगे ? मेरे पापा कहते हैं - राम बनने के अभ्यास ने मुझे कहीं सचमुच का राम बना दिया , तो मेरा भविष्य अंधकार मय हो जायेगा। गुरूजी ... क्षमा ...... क्षमा ........।

पूरी बात को प्वाइंट टू प्वाइंट लिख कर लाया था वह। गुरूजी , राम बनने का क्या फायदा। मैं तो रावण ही बनूंगा। राम जब मुझे मारेगा , तब हम राम के ऊपर केस कर देंगे। खूब पैसा मिलेगा गुरूजी , मर्डर केस है , आपको भी फायदा करवा देंगे। चुप रे ......। रावण सच में थोड़े ही मरेगा। आप बड़े भोले हैं गुरूजी। मेरे पापा , मेरे नहीं मरने पर भी साबित कर सकते हैं कि मैं मर गया , पैसे की बरसात हो जायेगी गुरूजी ....। एक बार रावण बनाकर तो देखिये। यह वकील पुत्र था।

गुरूजी अवाक रह गए। तभी ......रावण मैं बनता , तब सोने की लंका बनाने का ठेका मेरे पापा को मिलता , हमारी भी चांदी , साथ में आपको भी कमीशन। मालामाल हो जायंगे गुरूजी। राम बनने पर फकत धोती कुरता धनुष के अलावा क्या मिलेगा ? प्लीज गुरूजी , मुझे राम नहीं , रावण बनवा दीजिए। सुनहरा मौका पता नहीं कब मिलेगा ....... कृपा करिये।

कोई कुछ बहाने बनाता , कोई कुछ ...। राम बनने के लिए तैयार कोई नहीं। एक गरीब लड़का सबसे पीछे बैठा था। वह खड़ा होना चाहता था , अन्य बच्चे उसे पकड़कर बिठा देते। बड़ी मुश्किल से उठ पाया वह। क्या तुम राम बनोगे ? हां ...... गुरूजी , मैं .......। पर ......... मुझसे कौन रावण मरेगा ..... ? मेरे तन पर कपड़ा नहीं , पेट में अन्न का दाना नहीं , रहने के लिए छत नहीं। बड़ी कठिनाइयों के बाद खड़ा हो सका हूं , पर न जाने कितने लोग , पैर पकड़ कर खींच रहे हैं , कितने लोग मेरे डैनों पर घात लगाए बैठे हैं , और कह रहे हैं – क्या , तू मारेगा रावण को ? वास्तव में रावण को मारने के लिए कोई मेरे साथ खड़ा नहीं होगा , तब इतनी विशाल संख्या के रावणों को कैसे मारूंगा मैं ? मेरा बस चलता तो मैं , कब का इन्हे धाराशायी कर चुका होता , पर ये रावण प्रत्येक वर्ष अपना पुतला बना कर जला लेते हैं , और हमें भरमा देते हैं कि रावण मर गया। पर यह मरता कहां है ? हम फिर कोशिश करते हैं , फिर इन्ही के चंगुल और भ्रम में फंस जाते हैं। फिर आ जाता है दशहरा , फिर कोई पुतला जलाकर रावण के मरने का भ्रम पैदा कर देता है। साल दर साल परम्परा चली आ रही है धोखा खा जाने की। निर्वाह रहे हैं तब भी।

बच्चों को समझाने की जरूरत नहीं पड़ी कि – “ रावण क्यों नहीं मरता ”। वे समझ गए। हम कब समझेंगे ? रावण बढ़ता जा रहा , भ्रम जाल भी .....।

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा

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