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पूनम पाठक का आलेख - “राम बनाना नहीं , बनना होगा”


“राम बनाना नहीं , बनना होगा”  (आलेख)
                          --- डा. पूनम पाठक ,कोलकाता
 


 'दशहरा' एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है अपने भीतर निहित दस बुराइयों का 'हरण' करना अर्थात उनका 'अंत' करना। ये दस बुराइयाँ हैं-- कामवासना ( लिप्सा), मोह, लोभ, मद (क्रोध ), मत्सर ( ईर्ष्या), स्वार्थ, अन्याय, अमानवता और अहम्। इसे 'विजयदशमी' भी कहा जाता है अर्थात इन  दस बुराइयों पर विजय प्राप्त करना। हर व्यक्ति,हर समाज में अच्छाई और बुराई प्राकृतिक  रूप से विद्यमान होती है। व्यक्ति में निहित एक बुराई अनेक बुराइयों को जन्म देती है। एक साथ दस बुराइयों का एक व्यक्ति में होना समाज के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होता है अत : उनका नाश करना भी आवश्यक हो जाता है ,किन्तु एक साथ दस बुराइयों का  अंत करना असंभव कार्य   है और ये उस व्यक्ति के साथ ही उसी प्रकार नष्ट होतीं हैं जिस प्रकार  रावण के साथ उसकी बुराइयाँ नष्ट  हुईं थीं। रावण में निहित दस बुराइयों का अंत करना राम जैसे योग्य, शक्तिशाली, पराक्रमी,विनम्र,सहनशील,धैर्यवान और ज्ञानवान महापुरुष   के लिए भी सहज न था। उनको भी अनेक शक्तियों की सहायता लेनी पड़ी  थी । बुराइयों के समूह का नाश करने के लिए बहुत सारी अच्छाइयों का होना पर्याप्त नहीं है। जैसे-जैसे उन बुराइयों को नष्ट करने के प्रयास किये जाते हैं ,वैसे-वैसे बुराई और भी  शक्तिशाली होती जाती है।  अंत में रावण की बुराइयों को जड़ से नष्ट करने के लिए राम को 'ब्रह्मास्त्र' का प्रयोग करना पड़ा । तभी रावण का अंत  किया जा सका था।
                        इस पारंपरिक प्रतीकात्मक रावण को हम युगों- शताब्दियों से भस्म करते चले आ रहे हैं। बताना कठिन है कि कितना परिश्रम करना पड़ता है।  न  जाने कितनी टन लकड़ियाँ  और  कागज़ अब तक हमने भस्म कर दिए। उन लकड़ियों के लिए न  जाने कितने हरे- भरे वृक्षों को निर्ममता से काटते आ रहे हैं  और आगे भी न जाने कितनी हवन सामग्रियों को हम फूकेंगे। अरे भई, रावण को भस्म करने के लिए इतना नुक्सान तो सहना ही पड़ेगा न। कोई और मामूली व्यक्ति होता तो अलग बात थी  पर बात तो रावण के भस्म करने की  है। चाहे जंगल के जंगल फुंक जाएँ पर हर हाल में रावण भस्म होना ही  चाहिए। एक  यह दुष्ट हठी रावण है कि हर साल फूंके जाने के बावजूद भी मरता नहीं। त्रेता में राम को  कुछ दिन ही युद्ध करना पड़ा था 'उस' रावण को मारने के लिए। राम को यदि  हमारे रावण को मारना पड़ता तो उन्हें  पता चलता कि कलयुग के रावण को मारना कितना मुश्किल काम है। त्रेता के रावण -वध के  बाद जब पहला प्रतीकात्मक रावण फूँका गया होगा तो लोगों के मन में क्या विचार आया होगा ? शायद वे खुश हुए होंगे कि चलो आखिर हमने भी रावण फूँक ही दिया। पर, शायद सपने में भी उन्होंने यह कल्पना नहीं की होगी कि जिस एक दशानन  को फूँकने की परंपरा वे शुरू कर रहे हैं ,वह कभी न समाप्त होने वाली परंपरा बन जाएगी  और तो और भविष्य में इतने दशानन फूँकने  पड़ेंगे कि  दुनिया भर  की  हवन सामग्री भी कम पड़ जाएगी । वह  'एक'  में  'दस'  था , आज तो हरेक में दस-दस हैं , भला कैसे मरेंगे ? रावणों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है, हर गली-कूँचों में रावण पर रावण पैदा हो रहे हैं  ठीक वैसे ही जैसे  पैदल-पथ पर दिन-पर-दिन दुकानें बढती जा रहीं हैं।
बच्चा- बच्चा अपना  रावण तैयार कर रहा है , अनेक बच्चे मिल कर उसे फूँक रहे हैं , उत्सव मना रहे हैं।  एक नया फैशन -सा चल पड़ा है ,रावण फूँकने का। बधाइयाँ दी और ली जा रहीं हैं ,पर रावण है कि भस्म ही नहीं होता।

कम्पनियां नित नई-नई सेल  का प्रलोभन दे कर जनता के लोभ-रूपी रावण को भस्म कर रहीं हैं और जनता अपने  धन रुपी रावण को फूँक  दशहरा मना  रहीं है। समाज का  बल,बुद्धि,विद्या और चेतना रुपी रावण फूँक  नेता जनता को बेवकूफ बना कर विजयदशमी का पर्व मना रहे हैं। बांस , बल्लियों और गत्ते से बने कागज़ी  रावण को भस्म कर-कर के  मेला लगा  जश्न इसलिए मनाया जा रहा है   कि  इस साल भी हमने रावण को आखिर भस्म कर ही दिया। बुद्धिवादी शिक्षित व्हात्सप  पर सुन्दर-सुन्दर  और महान संदेशों को भेज अपना दशहरा मना रहे हैं । आडम्बरों  की चका-चौंध से सुसज्जित  लाखों -करोड़ों भक्तों की  आस्था के नाम पर  अपार धनराशि फूँक कर आयोजक प्रसन्नता से अपने- अपने  विजय पर्व मना  रहे हैं और जनता रात-रात भर जाग कर,समय और शक्ति लगा कर , पैदल घूम कर अपनी भक्ति  प्रदर्शित करते हुए  'शुभ विजय' की घोषणा कर रही है। मज़ेदार बात यह है कि कोई यह जानना समझना ही नहीं चाहता कि फूँक कौन रहा है और फुंक कौन रहा है और विजय किसकी हो रही है  ?
जब कि असली रावण लोगों के मनों में कैद  ,सुरक्षित अट्टहास कर रहा है ,उसकी भयानक हंसी  भीषण लाऊडस्पीकरों के शोर में दब गयी है ,किसी को सुनाई नहीं दे रही। ऐसे में कैसे मनेगा दशहरा और  कैसे मनेगी विजयदशमी ? जब हम ही उसको भस्म करना नहीं चाहते तो क्यों और कैसे मरेगा रावण ?
  सदियाँ बीत गईं ,हम न अपने मन में बसे एक रावण   को भस्म कर सके औए न समाज  में व्याप्त अनेक रावणों  को।

                           ' रावण ' की व्यक्तिगत दस बुराइयाँ आज आधुनिक कलयुगी समाज में अनेक रूपों में फ़ैल रही है। आधुनिक समाज की दस बुराइयाँ  --- बाल शोषण, , लैंगिक असमानता , स्त्री असम्मान , अशिक्षा, सामाजिक अन्याय, प्रदूषण, अस्वच्छता, उपभोक्तावाद, दूषित राजनीति, हैं । प्रतीकात्मक परम्पराओं के  प्रति हमारे मनों में   श्रद्धा दिन-प्रति-दिन बढती जा रही है , हम प्रतीकात्मक रावणों को फूँकने में अधिक रुचि ले रहे हैं बनिस्बत अपने और समाज में यथार्थ रूप से बसे जीवित रावणों के । हम निरंतर उन्हें  नज़रंदाज़ कर उन्हें पोषित कर उन्हें दीर्घायु बनाते जा रहे हैं। ऐसे  रावणों   से निपटने और उनको नष्ट  के लिए एक नहीं अनेक 'राम' की आवश्यकता है। ये राम वेदों,पुराणों, मिथकों या स्वर्ग से नहीं आने वाले। 'राम' नाम तो  है उस 'इच्छाशक्ति' का जिसे आज हमें अपने अन्दर पैदा करने की अत्यंत आवश्कता है , अपने ही अन्दर और समाज में  बसे उस रावण को नष्ट करने के लिए जिसने हमारी सुख-शांति नष्ट कर दी है । समाज को बीमार बना दिया है। हम भी उसी समाज के अंग हैं। आज हमें अपने राम स्वयं निर्मित करने पड़ेंगे। हममें से प्रत्येक को ही राम बनना होगा तभी समाज की शिराओं- धमनियों में रक्त रूप में प्रवाहित होने वाले अनेक रावणों को नष्ट किया जा सकेगा। तभी सच्चे  अर्थों में विजयदशमी होगी।

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 @डा. पूनम पाठक
 कोलकाता

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