गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

बख्त्यार अहमद खां की कविता - बेटी

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मेरे दिल का चैन है तू , आंखों की चमक है तू
मेरे दिल की जमीन है तू और मेरा फलक है तू
तेरी मौजूदगी से मिलती है हिम्मत मुझको,
तेरी चाहत से ही मिलती है राहत मुझको,

मैं जब भी थका हूँ, तेरी मुस्कान ने खुशी दी है,
मैं जब भी झुका हूँ तेरे हौसले ने बुलंदी दी है,
जो तू रही है तो इस आलम में मैं भी रहा हूँ,
तेरे वजूद के चिराग ने मेरे वजूद को रौशनी दी है,
तू न होती तो ये खुशी मयस्सर नहीं होती,
ये महफिलें ये रौनकें मेरे घर नहीं होती,

ये और बात तू एक रोज जुदा हो जाएगी

ये भी सच है तेरी याद बहुत आएगी,

तमाम उम्र तेरी मोहब्बत को कम न होने दूँगा,
हर एक गम तेरी किस्मत का मैं अपने सर लूँगा,
ऐ खुदा । मुझको ताकत दे ये रस्म भी अदा कर दूँ
साथ इज्जत के तुझे घर से मैं बिदा कर दूँ
दुआ करता हूँ मैं दिल से सदा खुश रहना,
तुम भी सुन लो -मेरी बेटी से कुछ न कहना
न अगर चाहो तो मेरे घर न आने देना,

हाँ मगर ऑख में उसकी ऑसू भी न आने देना,
दिल का चैन और रूह की तस्कीन तुम्हें दे दी है,
गेर मैं क्या दूँ की मेरी बेटी तुम्हें दे दी है,
कछ करो न करो बस इतना करम कर देना,
मेरी बच्ची को हमेशा के लिए खुश रख लेना ।

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रानी बाग, शमशाबाद रोड, आगरा

ba5363@yahoo.com

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