शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

राकेश अचल की व्यंग्य ग़ज़लें

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बहती गंगा में हाथों को धो लीजे
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हमको भी हासिल है इतनी आजादी
इज्जत लौटाना थी,हमने लौटा दी
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हम फ़क़ीर हैं नंगे भी रह सकते हैं
आप वजीर बने हैं,पहने अब खादी
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बहती गंगा में हाथों को धो लीजे
लोग कहें,कहने दें हम अवसरवादी
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हिंसा का शिकार है ,कोई बात नहीं
आधी से ज्यादा दुनिया की आबादी
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अचल लिखोगे और तो मारे जाओगे
बात खरी भी है समझो सीधी-सादी
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हम कागज के शेर, तो डरते क्यों हो

बोलो कुछ शमशेर, बगरते क्यों हों

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सब कुछ है मामूल तो फिर घर बैठो

बेमतलब निशि-याम विचरते क्यों हो ?

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यहां नहीं है वीफ,थीफ या गैया

रोज गली से आप गुजरते क्यों हो ?

*

सांप और सीढ़ी का खेल अजब है

सीढ़ी चढ़ते और उतरते क्यों हो ?

*

हम तो नहीं मुनव्वर राना भाई

नए पैरों को रोज कतरते क्यों हो?

*

कोई नहीं देखने वाला तुमको

अचल व्यर्थ में आप संवारते क्यों हो ?

*

@राकेश अचल

f/10,new park hotel,padav

gwalior

[m.p.]

09826217795

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