रविवार, 18 अक्तूबर 2015

गोवर्धन यादव की प्रस्तुति - आश्चर्यजनक किंतु सत्य

झूलती मीनार

घोर आश्चर्यजनक, किन्तु सत्य घटना

छॊटी-बडी हजारों इमारतें सारी दुनिया में हैं, किन्तु इनमें सबसे निराली, विचित्र एक भारत में भी है. ये अहमदाबाद में है एवं झूलती हुई मीनार के नाम से जग प्रसिद्ध है. ये मीनारें अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के समीप कालूपुर क्षेत्र में वशीर मसजिद के अहाते में है. इतिहास प्रसिद्ध मौलवी हाफ़िज सिद्दकी के नाम से यह मसजिद है. ये मीनारें अद्भुत हैं. नीचे करीब 20 वर्ग फ़ुट के दो स्तम्भों से जुडी दीवार के ऊपर ये मीनारें बनी हैं. इसकी लम्बाई 75 फ़ुट है. इन मीनारों की असली खूबी यह है कि अगर किसी एक मीनार के ऊपर चढकर खडॆ हो जायें और कुछ लोग अगर दूसरी को पकडकर हिलाएँ तो दोनों झूले की तरह झूलने लगती हैं. पत्थर की मोटी-मोटी मीनारें जो जमीन में पता नहीं कहाँ तक गडी हैं, झूले की तरह झूलती है. पिछले करीब छ सौ साल से ये मीनारें इसी तरह झूलती चली आ रही है. विश्व में ऎसी दूसरी मीनार नहीं है, जो झूलती है. फ़िलहाल इसे बंद कर दिया गया है.

इन झूलती मीनारों को ईस्वी 1458 में मल्लिक साहरंग ने बनवाया था. यह वह समय था जब यहाँ सुल्तान मुहम्मद का शासन था. सुल्तान मुहम्मद यों तो कठोर शासक था, परन्तु वह कला प्रेमी भी था. कहते हैं कि जब पहली बार इन मीनारों के विषय में सुल्तान को बताया गया तो उसे विश्वास नहीं हुआ. भला पत्थर की मीनारें झूल कैसे सकती हैं ? इस बात की सत्यता को जानने के लिए वह खुद एक बार अहमदाबाद गया और एक मीनार पर चढकर देखा.

इन झूलती मीनारों का रहस्य क्या है, यह आज तक अज्ञात है. अंग्रेज जब भारत पर शासन करने लगे, तब उन लोगों ने भी बहुत कोशिश की कि झूलती मीनारों के रहस्य का पता लगाया जाए, परन्तु अब तक सारे प्रयत्न बेकार ही रहे हैं.

कई बार ऎसी रहस्यमय घटनाएँ घटती रहती हैं, जिनका पता लगाना कठिन जान पडता है. इन मामलों में वैज्ञानिकों का कहना है कि ये अचरज भी प्राकृतिक नियमों के अन्तर्गत होते हैं, जिनके वास्तविक कारणॊं को जानने में हम अभी समर्थ नहीं हो सके हैं.

सन 1857 हमारे लिए गदर की लडाई के लिए याद किया जाता है. किन्तु अमेरिका वासियों के लिए कुछ और कारणॊं से यह यादगार वर्ष है. इस वर्ष कैलिफ़ोर्निया की नापा-काउण्टी में कई दिनों तक ऎसा पानी बरसा जो शर्बत से भी अधिक मीठा था, कुछ लोगों ने तो इसे भावी उपयोग के लिए जमा कर लिया और कई दिन तक इसका सेवन करते रहे. वैज्ञानिकों का मत था कि पानी में घुली हुई मिश्री इसका कारण थी. प्रकृति की इस अबूझ पहेली को वैज्ञानिक अब तक सुलझा नहीं पाए हैं.

प्रकृति का ढर्रा एक सामान्य क्रम से लुढकता दीखता है, किन्तु कितनी बार ऎसे दृष्य दृष्टिगोचर होते हैं, जिनके रहस्यों का पता लगाना कठिन जान पडता है. यों तो वैज्ञानिकों का कहना है कि ये अचरज भी ऎसे प्राकृतिक नियमों के अन्तर्गत होते हैं, जिनके वास्तविक कारणॊं को जानने में हम अभी समर्थ नहीं हो सके हैं.

अप्राकृतिक वर्षा के भी अनेकों उदाहरण सामने आए हैं. फ़रवरी 1903 में पश्चिम यूरोप का विस्तृत भू-भाग सहारा रेगिस्तान के काले रेत से भर गया था. पदार्थों के रंग कई तरह के थे. ठीक ऎसी ही वर्षा इंग्लैण्ड के लीड्स शहर एवं वेल्स में 30 जून 1968 को हुई थी.

सन 1918 में 13 अगस्त की रात को अमेरिका के मेसाच्युसेट्स शहर में घनघोर वर्षा हुई. आकाश मार्ग से गिरते हुए आठ इंच व्यास तथा एक इंच मोटाई के चिकने गोल पदार्थ देखे गए. कुछ दिन पश्चात शोध-अनुसन्धानों से पता चला कि वे फ़फ़ूँद हैं.

13 नवम्बर, 1833 को उत्तर-अमेरिका में आग बरसते सभी ने देखी थी. उस इतिहास प्रसिद्ध घटना का मुख्य कारण था अन्तरिक्ष से छॊटी-छॊटी अगणित उल्काओं का एक साथ बरस पडना. अनुमानतः 2 लाख छॊटॆ-बडॆ जलते अंगारे आकाश से जमीन की ओर तेजी के साथ दौडते हुए देखे गए. गनीमत इतनी रही कि वे सभी जमीन तक पहुँचने के पहले बुझ गए. एक भी उल्का धरती को छू नहीं सकी और आकाश में घूल बनकर बिखर गई.

पश्चिम जर्मनी के म्यूनिख शहर में चारों तरफ़ से बन्द दरवाजे और खिडकियों वाले कमरे में एक मनुष्य जलता हुआ पाया गया, जबकि दूसरी वस्तुओं ने आग नहीं पकडी थी. उसकी पाँच रक्त नाडियाँ भी कटी हुई थी और खून काफ़ी निकला हुआ था. आश्चर्य है कि आग कैसे पकडी? सम्भवतः आत्महत्या की गई होगी. वहाँ पर माचिस बीडी-सिगरेट या अन्य चीज नहीं थी, जिससे आग पकडने की पुष्टि हो सके. अधिक खून निकलने के कारण वह इतना दुर्बल था कि स्वयं भी आग नहीं लगा सकता था. वहाँ तेल अथवा पेट्रोल आदि की गन्ध भी नहीं थी.

इसी तरह का दूसरा केस इसी इंग्लैण्ड में घटित हुआ. एक व्यक्ति की समस्त माँसपेशियाँ जल गई थीं, किन्तु उसके बाल, भौंहें और अण्डरवियर व अन्य कपडॆ बिल्कुल भी नहीं जले थे. क्या वह आत्महत्या का केस हो सकता था ? जवाब किसी के पास नहीं था. ऎसी ही घटना में पार्टी चालू थी, लोगों का नाच-गाना चल रहा था कि अचानक कमरे के मध्य में एक नर्तकी के शरीर से नीली रोशनी निकलने लगी और कुछ ही मिनटॊं में वह जलकर राख हो गई. इंग्लैण्ड की इस घटना का कोई हल अब तक निकल नहीं पाया.

ऎसी ही घटना 2 जुलाई 1951 की है. जिसमें मिसेज रोजर का शरीर अचानक जल कर राख हो गया फ़िर भी उस कमरे में कोई भी अन्य वस्तु नहीं जली और न ही आग की लपटॆं ही दिखीं. उस समय सिर्फ़ गर्मी महसूस की जा रही थी. उनकी हड्डीयाँ भर शेष थी. इस घटना का रहस्य अब तक नहीं समझा जा सका.

अनेक स्तरों से जाँच-पडताल, विशेषज्ञों द्वारा परिक्षणॊं एवं उन्नत देशों की जाँचों से भी इन अग्निकाण्डॊं का रहस्य समझ से बाहर रहा. इन रह्स्यों को “स्पाण्टॆनियस कम्बशन” नाम दिया गया है व एक परिकल्पना यह की गई है कि सम्भवतः पृथ्वी की जियोमैग्नेटिक वेन्स की पकड में आने से ये घटनाएँ घटी हों, पर यह केवल तीर-तुक्का भर है क्योंकि ये घटनाएँ वहीं घटी है जहाँ इन वेल्स या विद्युत तरंगो की सघनता नहीं के बराबर होती है.

ये प्रसंग चाहे मानवी काया के हों अथवा विराट प्रकृति जगत के, अविज्ञात अनोखे करतबों के एक प्रश्न- चिन्ह विज्ञान जगत के समक्ष खडा करते हैं. जब हर बातों का जवाब देने का दावा वैज्ञानिक करते हैं, तो फ़िर ऎसे विचित्र घटनाक्रमों को संयोग मात्र अथवा अपवाद कहकर क्यों टाल देते हैं?

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गोवर्धन यादव
103,कावेरी नगर,छिन्दवाडा (म.प्र.) 480001
07162-246651,9424356400

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