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ईरान की कहानी - काशान का फिन गार्डन

ईरान की कहानी

सोफि़या मेहमूदी

1956 में जन्मी सोफि़या की ‘ज़ान-ओ-उदक (औरत और बच्चा) तथा ‘यक् ज़िक्र-ए-बिक्र’ (एक मुक़म्मल ख़्याल) नामक कृतियां प्रकाशित हैं।

काशान का फि़न गार्डन

 

अनुवाद - सुरेश सलिल

 

मेरे वालिद ट्रक ड्राइवर थे। हर सुबह चना-चबेना की बजाय अपनी जैकिट की जेब में वे अँजुरी भर सवालिया निशानात भर कर घर से निकलते। ड्राइवर वाली अपनी केबिन में बैठते और गली की जानिब रफ़्तार पकड़ते। जैसे ही जैसे वे रफ़्तार तेज़ करना चाहते, खंभे, रोड सिग्नल, हिदायती और रोक के निशानात दायें और बायें बाजू से एक के बाद एक, सामने उभरने शुरू हो जाते। हिदायतें, ख़तरे और सावधानी बरतने के निशानात उन्हें मंज़िल तक न पहुँचते देने में मदरगार होते। ‘रफ़्तार न लें,’ ‘ब्रेक लगाएँ!’ और फिर ‘स्टाप!’ जैसे ही वे फिर बढ़ना शुरू करते, ‘नो क्रॉसिंग’, ‘नो पार्किंग’, ‘नो लेफ़्ट (ऑर राइट) टर्न!’ ‘हार्न न बजाएँ’, ‘नो पासिंग!’, ‘डिप!’, ‘कॉशन!’, ‘ख़तरनाक ढाल!’, ‘फिसलन है!’, और... और यहाँ तक कि जब वे आगे जाने का इरादा तर्क कर वापस लौटने का मन बनाते, तो सामने होता ‘नो यू-टर्न!’ फिर भी किसी न किसी तरह वह टर्न का रास्ता निकालते। और रात में, आख़िरकार घर के सामने की बंद गली में जब वह ट्रक पार्क करते, तो उनका मूड बेतरह उखड़ा होता।

चाभी की तलाश में जेब में हाथ डालते तो वहाँ सिर्फ़ चाभी ही ग़ायब नज़र आती। सुबह वाले अँजुरी-भर सवालिया निशानात के सिवाय तरह-तरह के हिदायती और ख़तरों के निशानात से जेब भरी होती।

वालिद हैरत से भर उठते और इस तरह उन निशानात से हैरत का एक नुक्ता भी जा जुड़ता। अजीब बात है!

फिर वह गेट पर लगी घंटी बजाते। बहुत तेज़। वालिदा झटपट आकर काशान के फि़न गार्डन का गेट खेलतीं और कहतीं, सिश्श्!... बच्ची सो रही है! शोरगुल से जाग जाएगी। वालिदा दुरुस्तफ़रमा रही थीं। मैं पालने में सोई हुई थी, इंतज़ार करती हुई। इंतज़ार दूध का या गर्म गुनगुने शर्बत का।

वालिद दबे पाँव गलियारा पार करते, अहाते में दाखिल होते और मेरे पालने की बग़ल में आ बैठते। वालिदा चाय की टेन्न् आगे खिसकातीं, केतली उठातीं, और उसके बाद सँकरी खाड़ी के साहिलों की कानाफूसियाँ शुरू हो जातीं। परिंदों के नग़मों के साथ वालिद चाय पीते, फिर जैकिट उतारते और उसकी जेबें झाड़ते- ठीक वहीं, ट्रेन पर।

शादी के बाद से ही वालिद काशान के फि़न गार्डन में रहते आ रहे थे। इस जुमले में एक पहेली भी निहाँ है। दरअसल थे वे अपने ही शहर में। अपना शहर छोड़कर सचमुच के काशान शहर में नहीं जा बसे थे।

आसपास के लोगों से कई-कई बार मैंने यह दास्तान सुनी थीः सिवालिदा जब वोट खोलती हैं, तो उनका बेपर्दा चेहरा काशान के फि़न गार्डन के गेट से कम नाज़नीं नहीं होता। उनकी आवाज़ खनकदार है। बोलती हैं तो एक हज़ार सुरीले परिंदे उनके सर्बराय जिस्म की शाख़ों से गाने लग पड़ते हैं, ठीक काशान के फि़न गार्डन में मोतिये बहार के मानिंद...

लोग अक्सर वह दास्तान दुहराते। और लोगों की तादाद कम नहीं थी। आख़िर तो उनके लिए वह जगह काशान के फि़न गार्डन जैसी ही थी! और लोग उसके ख़ुशनुमा मौसम और रग रग में पेवस्त हो जाने वाले उसके सुकून की वजह से अक्सर वहाँ आते और दोबारा आने की हसरत से भर कर वापस लौटते। हर रोज़, एक के बाद एक, या कई-कई एक साथ, दूर- पास के लोग अपने मुख्तलिफ़ निशानात बग़ल में दबाये आते और काशान के फि़न गार्डन में उँडेल जाते। कोई रुमाल में अफ़सोस का निशान लपेट कर लाता और अपने आँसू धो- पोंछ जाता। कोई उँगलियों के बीच एक सवालिया निशान दबाये आता, बैठकर उसका धुआँ पीता और टोटा वहीं छोड़ जाता। कोई वहाँ आकर एक लिफ़ाफ़ा खोलता, डैश कॉमा-फुलस्टॉप-मार्क आफ़ एक्सक्लेमेशन से पुर एक ख़त निकालता... और वालिदा आहों पर आहें भरती रहतीं।... हवा का एक झोंका आहिस्ते से अहाते में दाखिल होता और लोगों के वे निशानात यहाँ-वहाँ बिखर जाते।

मैं उन सारे लोगों को और बजरिये हवा चारों ओर उड़ते उन सारे सैलानी निशानात को देखती।

देखती और सोचती ख़िज़ाँ का मौसम आ गया!

वालिदा जब खड़ी होतीं, ज़र्द-सूखे पत्ते बुहारतीं, ख़िज़ाँ के दरमियान एक छोटा ब्रेकेट खोलतीं और वे सारे निशानात इकट्ठा करके उसमें डाल देतीं, ताकि अस्त-व्यस्त गार्डन थोड़ा ठीक नज़र आने लगे।

मगर ख़िज़ाँ और गिरते पत्तों के साथ क़दम-ताल मिला पाना कैसे मुमकिन हो सकता है। फिर एक दिन वालिदा ने काशान के फि़न गार्डन को अलविदा कह दी। सब कुछ छोड़ छाड़कर वहाँ से रुख़्सत कर गईं। मेरा ख़्याल है, वह सीधे एक वीरान गाँव की तरफ़ गईं। किसी अजनबी इमामज़ादे के मक़बरे में। वहाँ जाकर एक कपड़े को रस्सीनुमा बट कर उसका फंदा गले में डाल लिया, ताकि, नमाज़ अदा कर सकें। कभी ख़त्म न होने वाली नमाज़।

उसके अगले रोज़, वालिद ने एक बड़ा-सा सवालिया निशान उठाया, उसे सीने पर की भीतरी जेब में रखा, ड्राइवर वाली केबिन में जा बैठे और सहरा के रुख गाड़ी दौड़ी दी। इस बार वे बिल्कुल बेखौफ़ थे। ‘वाइल्ड एनिमल क्रॉसिंग।’, ‘डेंजर, लैंडस्लाइड!’, ‘डेंजरस डाउनहिल, डेंजरस अपहिल!’ जैसे, रास्ते में आनेवाले, निशानात से बिल्कुल बेफि़क्र।

बहरहाल वे चले गये और कभी वापस नहीं लौटे।

मैं पालने में बिल्कुल तन्हा छूट गई। टनाफेंल्स्टॉप, कॉमा, ब्रेकेट्स, सवालिया निशानात के साथ, जो मेरी विरासत थे।

यही वजह थी, कि मैं उठ खड़ी हुई। तेज़ रफ़्तार से बड़ी हुई और कंधे से एक पर्स लटका लिया। पर्स में अँजुरी भर अपनी विरासत रखी और एक पब्लिसिंग हाउस के जानिब बढ़ गई। उसके हेड से मैंने कहा, मैं सारे निशानात बखूबी जानती हूँ। उसने मुझे अपने चीफ़ एडीटर के पास भेज दिया।

वह क़द्दावर शख़्सियत के मालिक मि.फ़रहदी थे। उन्होंने मुझे नौकरी दे दी। अब मैं एक एडीटर हूँ- काशान के फि़न गार्डन से आई एक एडीटर!

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