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श्रीकांत त्रिपाठी की दो रचनाएं

१.प्रगति पथ के चितेरो

 

 

ऐ प्रगति पथ के चितेरो, कलुष मन की भ्रान्ति घोलो |

यदि नहीं निर्माण संभव, क्या उचित है जहर घोलो ?

 

मोड़ने की चाह है तो, मोड़ दो इस भ्रमित जग को,

विमुख पथ उन्मत्त हो, कर्तव्य से तुम मुंह न मोड़ो |

 

हर विवश की दृष्टि तुमसे चाहती उर से लगालो ,

भावना को भाव दो तुम प्यार को धन से न तोलो |

 

शिखा की आभा बनेगा ये सुलगता ह्रदय तेरा ,

दूर करदो तिमिर जग से दीप बन खुद को जलालो |

 

आज ये असमय घिरे घन स्वयं ही फट जायंगे ,

विष बुझा उर-वज्र लेकर आज तुम संकल्प लेलो |

 

स्वप्न सुख के, फिर हँसेंगे, पूर्णिमा के चाँद बनकर ,

अभी संभव लक्ष्य तेरा है सुबह जब आँख खोलो ||

 

                 ---श्रीकांत त्रिपाठी 

 


               2.तुम्हारी सौगात 

हमने इस उम्र की रग रग में सजाये कांटे ,

इसकी शाखों में कोइ फूल नहीं पात नहीं |

सिर्फ गुजरे हुए लम्हों की चन्द यादें हैं ,

सर्द आहों के सिवा कोइ भी ज़ज्वात नहीं |

 

कुछ कदम राह में हम साथ चलेंगे तेरे 

इसी उम्मीद में छोड़ा था हंसते सावन को |

न मिला प्यार तेरा चाह तेरी साथ तेरा ,

चैन से काटी हो ऐसी कोइ रात नहीं |

 

टीस उठती है जब, बजती है कहीं शहनाई,

देखता रहता हूँ ख्यालों में सजी दुल्हन को |

आज तक याद हैं भूले नहीं वादे तेरे ,

दिल बहल जाता, ऐसी तो कोइ बात नहीं |  

 

बहुत करीब से देखा है मैंने हर शह को,

तुम से हो और हसीं, ऐसी कोइ मात नहीं |

सूनी आँखों में जो तडपे हैं निकल जाने को,

सूखे आंसू के सिवा कोइ भी सौगात नहीं ||

 

                   ---- श्री कान्त त्रिपाठी 


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