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सुदर्शन कुमार सोनी का आलेख - किए पीएचडी बने भृत्य, ये देखो जीवन का नृत्य

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बचपन में कहावत सुनी थी - पढ़े फारसी बेचे तेल, ये देखो जीवन का खेल. यह कहावत इतना अधिक कटु सत्य होगा, सोचा नहीं था.

हम सब ने यह समाचार पढ़ सुन लिया है। पढ़कर आंखें फटी की फटी रह गयीं। हो सकता है कि पहले भी इसी तरह से कई गुना आवेदन आये हों। लेकिन इसके साथ तो पूरा एक विश्लेषण भी है कि चपरासी के 300 सौ से अधिक पदों के लिये जिन तेईस लाख लोगों ने आवेदन किया है उसमें पांचवीं पास केवल 55000 हजार है। इस पद की यह एक योग्यता थी। दूसरी कि साईकिल चलाना आता हो वैसे अब यह बदल देना चाहिये कि सायकल के साथ ही मोटर सायकल चलाना भी आता हो ? दो लाख से अधिक तो बीटेक उम्मीदवारों ने आवेदन किया , कई पीएचडी ने भी आवेदन किया , न कहो कुछ डाक्टर भी हो , अभी बारीक विश्लेषण बाकी है ! यह भी कहा गया कि इतने अधिक आवेदनों की जांच करने व इंटरव्यू करने में ही चार साल लग जायेंगे। इतने आवेदन रखने ही एक भवन अलग से किराये पर लेना पड़ गया होगा। तारीफ तो इस बात की है कि इतने अधिक आवेदन अच्छे से ले लिये गये नहीं तो यह सब विश्लेषण आता कहां से। लगता है कि इन पदों पर भर्ती कभी नहीं हो पायेगी ! हां इस पर तरह तरह से समाचार जरूर बन सकता है ! वैसे इस देश में बेरोजगारों के साथ एैसे छल व मजाक हमेशा से होते आये है।

लेकिन इस एक समाचार से हमें देश में बेरोजगारी की `स्थिति की भयावहता का आभास होता है। इसे देख कर तो लगता है कि देश में यदि सबसे बड़ी कोई समस्या है , तो यह बेरोजगारी की ही है , चपरासी के पद के लिये पीएचडी , व इंजीनियर , एमबीए सब पलक पांवड़े बिछा रहे है ! मतलब यह है कि सरकारी नौकरी होना चाहे वह चपरासी की ही क्यों न हो ? एक कहावत है कि स्वर्ग का चपरासी होने से बेहतर है कि नर्क का राजा हो जाये लेकिन यहां तो देखकर लगता है कि यह कहावत गलत साबित होती है ?

एक बात और समझने की , विचार मंथन करने की है कि क्या देश की शिक्षा पद्धति एैसी है कि यहां आदमी पढा़ई कुछ भी करे अल्टीमेटली वह सरकारी नौकरी चाहे वह चपरासी की ही क्यों न हो उसे मौका मिलने पर अपनी डिग्री विशेषज्ञता को छोड़कर अपना लेगा। यह लाख टके का प्रश्न है जिसका उत्तर हमें खोजना ही होगा। आज यदि चारों ओर मारकाट मची है रोज अपराध हो रहे है , रोज धोखाधड़ी हो रही है , जहरीली शराब पीने से लोग चाहे जब मर जाते है , वेश्यावृत्ति में लड़कियों को ढकेला जाता है , मादक पदार्थों की तस्करी रूकती नहीं है तो इस सबके पीछे बेरोजगारी का ही बहुत बडा़ रोल लगता है ?

और सोचने वाली बात तो यह है कि बेरोजगारी दूर करने का माद्दा अकेले सरकार के पास नहीं है यह तो जब तक खेती की स्थिति सुधरती नहीं मतलब यह लाभ का धंधा नहीं बनता , कौशल उन्नयन नहीं होता , निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर नहीं बढ़ते तब तक तो कुछ खास नहीं होने वाला है ! एैसे ही हैडलाईंस हमेशा बनती रहेंगी कि शिक्षक पद के लिये इतने एमबीए व पीएचडी ने आवेदन किया या कि चपरासी के इतने पदों के लिये इतने लाख लोगों के आवेदन आये। वैसे यह गिन्नीस बुक आफ रिकार्ड के लायक भी एक आंकडा़ है इस पर विचार होना चाहिये।

उत्तर प्रदेश जहां की यह न्यूज है वहां के हर 93 वें व्यक्ति ने आवेदन किया है यह नहीं मालूम कि शुल्क रखा गया कि नहीं यदि रखा गया होता तो वह गणना भी हो जाती। यदि दस रूपये भी रखा गया होता तो दो करोड़ तीस लाख की आय भी हो जाती सौ रखा होता तो यदि दो सो तीस करोड़ हो जाती ! और आंकड़े भी बन सकते है कि यदि एक आवेदक ने दस कागज आवेदन पत्र के साथ लगाये तो तेईस लाख के दो करोड़ तीस लाख हो गये जिसे कि सौ पेज की दो लाख तीस हजार कापी बन जाती और जो कि पचास हजार बच्चों के काम आती आदि !

लेकिन गंगू की सबसे बड़ी चिंता तो उन बेरोजगारों के लिये है जो कि हताश है , नौकरी न मिल पाने से निराशा के गर्त में जी रहे है , घर बाहर सब जगह तिरस्कृत हो रहे है उनका आत्मविश्वास लौटाना सबसे बडा़ काम होगा। वह व्यक्ति ज्यादा सुखी है जिसने कि खेती बाड़ी या किसी धंधे या हुनर में अपने को लगा लिया है। वह कम से कम इस भेड़चाल से मुक्त है , खुद्दारी की जिंदगी तो जी सकता है यहां चपरासी की नौकरी में तो पानी चाय ही पिलाना पड़ेगी और अफसर की डांट फटकार चाहे जब अलग से सुनना पड़ेगी

sudarshan kumar soni 

  D-37 , Char Imli , bhopal 

  462016 , mob. 9425638352  

Email: sudarshanksoni2004@yahoo.co.in

Blog: meethadank.blogspot.in

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