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महेश कटारे सुगम की ग़ज़लें

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ग़ज़ल

अब हमारा और चुप रहना नहीं आसान है
पेट खाली जिस्म पर चड्डी फ़टी बनियान है

हम कतारों में खड़े देते रहे हैं अर्ज़ियाँ
अनसुना करने की आदत आपकी पहचान है

एक जंगल राज का क़ानून लागू है यहां
पास में ताकत है जिसके बस वही भगवान है

लोग गुस्साए खड़े हैं हर गली हर मोड़ पर
बोलने लग जाएँ हल्ला बस यही अरमान है

आदमी में आदमी सा कुछ नहीं दिखता यहां
खो चुका जो आदमी की शर्त है ,पहचान है

हर तरफ चोरी ,डकैती ,लूट ,हत्या अपहरण
वर्दियों में भेड़िये ,खादी हुई बेईमान है

पी रहे मंहगी शराबें कोठियों में बैठकर
लोग सब खुश हाल हैं कहना बहुत आसान है

मैं अकेला ही नहीं हूँ इस व्यवस्था के खिलाफ
अब सुगम के साथ में सम्पूर्ण हिंदुस्तान है

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ग़ज़ल

हर तरफ फरेब की मुहिम उछाल दी गयी
ज़िंदगी की नाक में नकेल डाल दी गयी

नफ़रतें मुहब्बतें अलग अलग न दिख सकें
दाल कंकड़ों के साथ में उबाल दी गयी

इश्तहार बन गयी इबादतें सभी यहां
मज़हबों की रूह जिस्म से निकल दी गयी

फुर्सतें न मिल सकीं उन्हें हमारे वास्ते
देखते ही देखते सदी निकाल दी गयी

रहनुमाओं ने सुगम अंधेरों का सफर दिया
हाथ में बुझी हुई हमें मशाल दी गयी

 

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ग़ज़ल

सभी की फ़िक्र -ए-दिल भूख प्यास लिख देना
हरेक शख्स का चेहरा उदास लिख देना

किसी की कैद में रहकर सिसक रहे सपने
हमारी नस्ल का ये भी कयास लिख देना

सने हैं धूल,पसीने से सभी मेहनतकश
हरामखोरों का उजला लिबास लिख देना

शहर में जितने हैं कानून तोड़ने वाले
सभी वो लोग सियासत के खास लिख देना

अँधेरी रात का साया तो हट गया लेकिन
अभी है सामने धुंधला उजास लिख देना

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एक ताज़ा ग़ज़ल

बड़े अजीब तुम्हारे ये कैदखाने हैं
तुम्हारी धूप तुम्हारे ही शामियाने हैं

ख़ुशी के रंग चमकते तुम्हारी आँखों में
हमारे सामने फैले कबाड़खाने हैं

तुम्हारे पास तो रानाइयां हैं दौलत की
हमारे पास मुसीबत के वारदाने हैं

तुम्हारी कोई भी मर्ज़ी नहीं चलेगी अब
समय की धार में वो बह चुके ज़माने हैं

हमारे प्यार का मैदान अब करो खाली
सुगम कपोत यहीं से हमें उड़ाने हैं

 

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एक मोबाईल ग़ज़ल

हैलो अज़मत मियां बोलो तुम्हारे हाल कैसे हैं
वो अपने दोस्तों के आजकल आमाल कैसे हैं

हैलो हाँ सुन रहा हूँ तुम सियासत कर रहे हो अब
तो अपने सब उसूलों के कहो सुरताल कैसे हैं

रहेगा याद वर्षों तक वो पिछले साल का सूखा
हैलो गेहूं ,चना ,सरसों ,मटर इस साल कैसे हैं

हैलो भाभी तुम्हारी को हुई जो फूल सी बेटी
बताओ शक्ल कैसी है कि उसके बाल कैसे हैं

हैलो बीना गए थे डॉक्टर को मर्ज़ दिखलाने
हुआ था क्या उन्हें आखिर चचा इकवाल कैसे हैं

हाँ दारू कि दुकां लेकर वबंडर मच रहा था जो
जिन्हें मारा था गुंडों ने वो देवीलाल कैसे हैं

 

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ग़ज़ल

कूक नहीं है चीख रही है कोयल बैठी डाल पर
कोस रही है इस मौसम को उसके खस्ता हiल पर

धरती की चमड़ी दरकी है पेड़ों की काया सूखी
बादल भी हँसते रहते हैं इस सूखा की साल पर

मैंने जब कह दिया तुम्हारा ईश्वर अत्याचारी है
तो उसने इक चांटा मारा कसकर मेरे गाल पर

आज़ादी के इन वर्षों में हमको क्या उपहार मिला
खिन्न हुई बेशर्म व्यवस्था मेरे isi सवाल पर

मेहनत की छाती पर चढ़कर पूँजी ने आकाश छुआ
मुफ़लिस का तो ध्यान टिका है अब भी रोटी दाल पर

टुकड़ खोर इस दुरभि संधि का हश्र सामने ये आया
कहीं किसी का खून नहीं आता है कभी उबाल पर

ठोंक ठोंक कर बैठा दी है सबके मन में बात यही
सुख की रेखा नहीं लिखी है सुगम तुम्हारे भाल पर

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ग़ज़ल

इस नपुंसक ज्ञान के चिंतन मनन को क्या कहें
आँख से अब आंसुओं के आचमन को क्या कहें

ढूढ़ता कचरे के ढेरों में जो अपनी ज़िंदगी
भूख में उलझे हुए इस व्याकरन को क्या कहें

ज़िंदगी जो जी रहे कीड़े मकोड़ों की तरह
इस घिसटती नस्ल के जीवन मरण को क्या कहें

कौन हैं क्या हैं समझने की ज़रूरत भी नहीं
पूजने के भाव ,अंधे अनुकरण को क्या कहें

मैंने लिख दी है ग़ज़ल और आपने कर दी है wah
पर बदल पाये नहीं जड़ आचरन को क्या कहें

खुद पतित होने का ढंग स्वीकार हमने कर लिया
गर्त में डूबे हुए ऐसे पतन को क्या कहें

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महेश कटारे सुगम के फ़ेसबुक पृष्ठों (https://www.facebook.com/maheshkatare.sugam) से साभार.

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