बुधवार, 14 अक्तूबर 2015

हरीश कुमार का व्यंग्य - चंदू भाई और पुरस्कार त्याग

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चंदू भाई अभी भी पेशोपेश में हैं,ले दे के दो दर्जन किताबों का संपादन किया और अपने छात्रों को शोध करवाने के एवज में घुड़कियाँ देकर पंद्रह पुस्तकें अनुवाद करवा ली । थोड़ी बहुत जान पहचान हुई तो जुगाड़ लगा के प्रसिद्ध क्रांतिकारियों पर अपना अधिपत्य जमा लिया । नेशनल से ले के इंटरनेशनल बागियों विद्रोहियों पर अपनी भक्ति प्रस्तुत की । तब जाके एक पुरस्कार पा सके


ये अलग बात थी कि उन्होंने इस काम के लिए दिवंगत/शहीद हो चुकी विभूतियों को चुना । अब वे प्रोफेसर होने के साथ साथ अनुवादक और किताबी क्रान्तिकारी कामरेड बन गए । उन्हें अख़बारों पत्रिकाओं में छापने का जुनून था ,और नहीं तो संपादक को पत्र वाले कॉलम में उन्होंने कीर्तिमान बनाये थे और पत्र लेखक संगठन का गठन कर चुके थे ।


सेवानिवृत्ति से पहले पहले सरकारी अनुदान पर विदेश यात्रा का भी आनन्द ले लिया । इसी बीच वे कई पुरस्कार पाने में सफल रहे । अनुवादक और पुस्तकों के संपादक होने के बाद उन्हें यात्रा साहित्य लिखकर जुगाड़ू पुरस्कार पाने की इच्छा फिर हुई ।


उन्होंने अपनी विदेश यात्रा के संस्मरणों में तीसरी दुनिया के रणबांकुरों के बारे में खूब लिखा और किताब के कवर पर काले रंग के बच्चे की फोटो लगाने की कल्पना की । यहाँ तक कि वो अक्सर कभी अपना सर मुंडवा लेते कभी फ्रेंच कट दाढ़ी रख लेते तो कभी विदेशी लेखकों के स्टाइल वाली टोपी लगाते । सिगार उन्होंने ट्राय नहीं किया क्योंकि वे दमे के मरीज थे बस रात को नीट का पेग मार कर एक ही आदमी पर एक और किताब लिखने लग जाते ।


नायपाल,मोदियानो और अमर्त्य सेन की तस्वीरों के साथ साथ उन्होंने अब ची ग्वेरा की भी फोटो अपने कमरे में चस्पा ली । अभी वे यात्रा साहित्य पर भी कोई अकादमी या कम से कम नोबल लेने का स्वप्न ले ही रहे थे कि इस बीच न जाने क्या हुआ सभी और पुरस्कार लौटाओ लहर चल पड़ी ।

 


पहले एक ने क्रांति की तो दूसरे ने दिल्लगी में पुरस्कार लौट दिया । फिर सब बौराने लगे । चंदू भाई सुबह का अखबार उलटते तो उनका दिल धक् से रह जाता । एक दो और पुरस्कारों के लौटाए जाने की खबर फ्रंट पेज पर छपी होती । टीवी खोलते तो वहाँ भी ब्रेकिंग न्यूज पुरस्कार लौटाने की होती । सभी सोशल साइट्स पर भी लोग बाग़ लौटाया लौटाया खेल रहे थे ।
बड़ी ही विकट परिस्थिति थी ये चंदू भाई के लिए ।


"सारी उम्र निकल गयी चिरौरी करते आँखे फोड़ते,क्या इसी दिन के लिए कोई पुरस्कार लेता हैं । न जाने कितनी बेकार किताबों के अनुवाद करने पड़े । संस्थाओं के आगे नाक रगड़नी पड़ी तब जाके कही पुरस्कार मिलते है । लिखने वालों की तो भीड़ लगी है । पत्र पत्रिकाओं की आजीवन सदस्यता के एवज में तो अपनी रचनायें छपवायी थी ताकि छपने का कोई भरम न फैले लोगों में ,तब जाकर मिला पुरस्कार । इन लोगों ने लौटाकर नया खेल तमाशा रच लिया हैं ।"


कहानी,कविता,उपन्यास सब क्षेत्रों से पुरस्कार लौटाए जाने के समाचार छप चुके थे। शोले-कालीन लेखक जिन्हें नयी पीढ़ी भूल रही थी पुरस्कार लौटाकर खूब प्रसार और प्रचार पा रहे थे ।
चंदू भाई ने अपने मन की सभी बांछों को नियंत्रित करने की कोशिश की । पर वे भी अखबार और समाचारों में चंदू भैया माने डा चंदू लाल का नाम देख कर खिलने को जोर मार रही थी ।
अनुवाद और संपादन के क्षेत्र में उनका धुंधला पड़ता नाम नयी चमक पा सकता था । वे साड़ी रात करवट लेते रहे और लगभग एक महीना की उधेड़बुन और करवट के बाद उन्होंने भी "लौटाओ लौटाओ "आंदोलन में भाग लेने का निश्चय किया । अपनी शीशे की अलमारी में पड़े धूल धूसरित पुरस्कार को निकाला,भरे मन से झाड़ा ।

क्रांतिकारियों पर इतनी किताबें लिखने के बाद भी उनके भीतर क्रांति करने की कोई ललक पैदा नहीं हुयी थी सो वे झिझकते हुए एक साफ़ कागज पर अपने पुरस्कार लौटाने की द्रवित उद्घोषणा करने लगे । उन्होंने उसमें सभी सर्वहारा शब्दों का सुरुचिपूर्ण प्रयोग किया । तत्पश्चात अपना लैपटॉप आन किया और ट्विटर से लेकर फेसबुक तक तथा सभी समाचार पत्रों के संपादकों को अपना एलान नाम भेज चिपकाया । अगले दिन की सुबह का और समाचार पत्र के फ्रंट पेज पर अपनी फ्रेंच कट वाली फोटो देखने का स्वप्न लेते हुए नीट का पेग लिया और सोने का प्रयास करने लगे ।

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हरीश कुमार

गोबिंद कालोनी गली न - २

बरनाला ,पंजाब

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